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नलुओं का वृत्तान्त

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८९

औरंगज़ेब को पैगाम देने के उद्देश्य से सुन्दरसाथ उसके दरबारियों के घर जा-जाकर बात करने लगे ।

रिज़वी खान के घर दस-बीस दिन तक, शेख निज़ाम के घर एक मास तक, शेख वाजिद नामक फकीर के पास दस बार, सागर मल्ल के घर दस बार, बख्तावर के घर, और भी अनेक विशिष्ट व्यक्तियों के घर बार-बार चक्कर लगाए, परन्तु किसी ने भी रुचि नहीं दिखाई । एक परब्रह्म के प्रति ईमान और अंकुर के बिना वे कर भी क्या सकते थे ?

अब सब बैठकर विचार करने लगे कि किसी भी प्रकार से हमें कयामत और इमाम महदी (श्री जी साहिब जी) के आने का पैगाम पहुंचाने का कर्त्तव्य पूरा करना है । फिर जो भी ईमान लाएगा, वह स्वतः सुन्दरसाथ (निजानन्द) में शामिल हो जाएगा ।

श्री जी सराय रोहिल्ला खान में चार मास रहे । फिर वहां से चांदनी चौक आ गए । वहां से चलकर दुलीचन्द की हवेली में ठहरे, परन्तु कुछ लोगों के विरोध के कारण वह स्थान छोड़ना पड़ा । अन्ततः श्री जी को एकान्त स्थान पर जाना पड़ा ।

श्री जी ने पांच नलुए (पत्र) तैयार करवाए, जिसमें कयामत की हकीकत, इमाम महदी की पहचान, हज़रत ईसा रूह अल्लाह (धनी श्री देवचन्द्र जी) के आने की सूचना, एक सत्य धर्म (निजानन्द) की हकीकत, इस्राफील और जिब्रील के आने के प्रमाण, दज्जाल की लड़ाई, आजूज-माजूज के जाहिर होने की साक्षी, मगरब (पश्चिम) से सूर्य उदय होने का गुह्य अर्थ, दाभ-तुल-अर्ज जानवर के प्रकट होने के निशान, आदि बातों को कुरान-हदीसों के प्रमाण के साथ लिखा गया । इसका उद्देश्य एक सत्य धर्म को स्थापित करना था । यह भी लिख दिया गया कि जो इस बात से मुनकर होता है (स्वीकार नहीं करता है), वह काफर कहलाएगा ।

कान्हजी भाई को सन्देशवाहक बनाकर पांचों नलुए पहुंचाने के लिए भेजा गया । उनके साथ सुरक्षा के लिए कुछ और सुन्दरसाथ भी भेज दिए गए ।

यह नलुए शेख इस्लाम (सबसे बड़ा काज़ी), रिज़वी खान (दीवान), शेख निज़ाम (औरंगज़ेब का उस्ताद), आकिल खान (कुरान का विद्वान), और सिद्दीक फौलाद (कोतवाल) को भेजे गए ।

कान्हजी भाई ने सबके पास जाकर नलुआ दिया और एक ही बात कही- "पहाड़ पर बैठे एक फकीर सैय्यद मुहम्मद इबन इस्लाम ने मुझे यह पैगाम पहुंचाने के लिए भेजा है । मुझे इसका उत्तर लिखकर दे दीजिए ।"

पूरी बात जानने के बाद, सबने यही प्रश्न पूछा- "यह सिर्फ मेरे लिए भेजा है या किसी और के लिए भी है ?"

जब कान्हजी भाई उन्हें चार अन्य लोगों के नाम बताते, ते वे यही कहते- "ठीक है, तुम पहले उन चारों का जवाब ले आओ । तब मैं उत्तर दूंगा ।"

आकिल खान ने नलुआ लेने से ही मना कर दिया । उसने बहाना बनाया- "इस पर मेरा नाम नहीं लिखा है, तो मैं इसे क्यों लूं ?"

अपने ज्ञान के अहंकार में आकिल खान ने इमाम महदी और कयामत की दावत को इन्कार कर दिया । कुरान में ऐसे लोगों पर ही लानत लिखी है ।

चार लोगों तक पैगाम पहुंचाने के बाद कान्हजी भाई वापस सुन्दरसाथ के बीच आ गए । तब श्री जी के समक्ष उन्होंने अपनी सारी बीतक सुनाई ।

अगले दिन प्रातः कान्हजी भाई एक-एक कर सबके घर गए, परन्तु सबका एक ही उत्तर था कि पहले दूसरों से जवाब लेकर आओ । इस प्रकार कान्हजी भाई पन्द्रह दिन तक उत्तर मांगने के लिए जाते रहे ।

एक दिन शेख निज़ाम ने कान्हजी भाई की विनम्रता देखकर उत्तर दिया- "यह काम जल्दबाजी का नहीं है । तुम तो इमामत का दावा लाए हो । यह तो सुल्तान का काम है । हम इसका क्या जवाब दे सकते हैं ? इसके लिए तो सब लोगों को मिलकर, विचार करके, जवाब देना होगा । यह काम जल्दी नहीं हो सकता ।"

इसी तरह काज़ी शेख इस्लाम ने भी उत्तर दिया- "यह काम मेरे अकेले के बस का नहीं है । तुम तो कयामत का मुकदमा लाए हो, जो बहुत बड़ी बात है । इसे पढ़-पढ़कर मैं परेशान हो गया हूं । हम पांचों मिलकर ही इसका उत्तर देंगे ।"

इसके बाद सिद्दीक फौलाद के घर जाकर कान्हजी भाई ने कहा- "मुझे उस पैगाम का जवाब दे दीजिए, तभी वह फकीर मुझे मेहनताना (पारिश्रमिक) देंगे ।"

सिद्दीक फौलाद ने उत्तर दिया- "यह तो काज़ी-मुल्ला का काम है । मैं कुरान और दीन इस्लाम के बारे में क्या जानूं ?"

कान्हजी ने पुनः कहा- "आप सुल्तान को इसकी खबर दे दो । वे अपने आप जवाब देंगे, उन्हें तो कुरान की पूरी जानकारी है ।"

यह सुनकर सिद्दीक फौलाद ने कहा- "यह बात सुल्तान से कहने की मुझमें हिम्मत नहीं है । अगर मुझसे कोई भूल-चूक हो गई, तो बहुत दुःख झेलना पड़ेगा ।"

इसके बाद कान्हजी भाई ने रिज़वी खान के यहां जाकर कहा- "कृपया मुझे इसका कुछ तो जवाब दे दीजिए । मैं तो आपके लिए खुशखबरी लाया हूं ।"

यह सुनकर रिज़वी खान ने कहा- "मैं किस बात की खुशी मनाऊं ? तुम आज ही कयामत लाकर मुझे मारना चाहते हो । अभी तो मेरे दिल में दुनिया की कितनी उम्मीदें बाकी हैं । कयामत आ गई तो मेरे बीवी, बच्चे और घर का सुख खत्म हो जाएगा ।"

कान्हजी भाई ने कहा- "आप सिर्फ दो शब्द ही लिखकर दे दीजिए, तो मुझे फकीर से मेहनताना मिल जाएगा ।"

रिज़वी खान ने कहा- "यह दीन इस्लाम का बड़ा मुकदमा है, मेरे अकेले का काम नहीं है । इसके लिए पांचों को मिलकर ही जवाब देना होगा ।"

यह सत्य है कि परमधाम की आत्माओं (खास मोमिन) के अतिरिक्त अन्य किसी में भी एक परब्रह्म के प्रति ईमान नहीं होता ।

जब दो मास तक किसी से उत्तर नहीं मिला, तो हारकर कान्हजी भाई ने श्री जी को अपनी व्यथा सुनाई ।

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