रुक्का प्रसंग
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९१
बाग में मंत्रणा करके सब लोग सन्ध्या समय तक वापस अपने घर आ गए ।
फिर रात्रि में कुछ सुन्दरसाथ मिलकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ गए और सनन्ध की चौपाइयों का गायन करने लगे । वे इतने जोश में थे कि उन्होंने नमाज पढ़ने के लिए आने वाली आम खलक (जीवसृष्टि) को देखा ही नहीं ।
वे लोग नित्य वहां जाकर सनन्ध का गायन करने लगे । उनके दिल में कोई संशय या डर नहीं था और सब कुछ अपनी इच्छानुसार कर रहे थे अर्थात् उन्हें किसी की परवाह नहीं थी । उनके सिर पर धनी का जोश था और संसार उन्हें दिखता ही नहीं था ।
जामा मस्जिद में घड़ियाल बजाने का कार्य नन्दलाल करते थे । वे अपने पूरे परिवार के साथ सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । उन्हें श्री जी के स्वरूप की पहचान हो गई और वे सदैव सेवा में खड़े रहते ।
राजाराम अपने बेटे शिवराम के साथ प्रतिदिन श्री जी का दर्शन करने आते थे और उन्हें चर्चा सुनकर बहुत शान्ति मिलती थी ।
दोनों भाइयों ने मिलकर विचार किया कि यदि रुक्का लिखकर मस्जिद के गुसलखाने (स्नान घर) के द्वार पर चिपका दिया जाए, तो यह सन्देश औरंगज़ेब तक अवश्य पहुंच जाएगा ।
श्री जी ने एक रुक्का लिखकर नन्दलाल को दिया, जिसमें लिखा था- "जो कोई मुसलमान है, वह हमारी बात पर ईमान लाए । रूह अल्लाह (श्यामा जी), गाज़ी मोमिन (आत्माएं), रसूल मुहम्मद (अक्षर), इस्राफील (जाग्रत बुद्धि का फरिश्ता) और जिब्रील (जोश का फरिश्ता) अपने वादे के अनुसार अर्श अजीम (अखण्ड धाम) से उतरकर आ चुके हैं । इसे पढ़कर सावधान हो जाओ, भूल मत करो । रसूल मुहम्मद ने जो फरदा रोज़ कयामत में आने का वादा किया था, वह समय आ चुका है । इस रुक्के को पढ़े बिना जो इस दरबार (मस्जिद) में बैठेगा, उसे खुदा की लानत लगेगी और वह परवरदिगार (परब्रह्म) तक नहीं पहुंच सकेगा । आपको पैगाम देकर हम अपने सिर का फर्ज उतार रहे हैं । जिसे गर्ज हो, वह हमें ढूंढ ले ।"
नन्दलाल ने श्री जी के हुक्म को सिर चढ़ाया और रात में चुपके से उस रुक्के को गुसलखाने के दरवाजे पर चिपका दिया । जब प्रातः लोगों ने मस्जिद में आना शुरु किया, तो नौ बजे तक बहुत लोगों ने उसे पढ़ लिया ।
औरंगज़ेब के दरबार में इस बात का शोर मच गया और सुल्तान को भी खबर मिल गई । तब उसने रुक्का मंगवाकर पढ़ा और वह समझ गया कि इमाम महदी आ गए हैं ।
लोगों की फरियाद (अर्जी) सुल्तान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी शेख सुलेमान की थी, इसलिए सुल्तान उस पर क्रोधित हो गया । सुल्तान समझ गया कि जब उसने फरियाद नहीं सुनी, तभी तो उन्हें रुक्का इस तरह चिपकाना पड़ा । अतः बादशाह ने शेख सुलेमान को पद से मुक्त कर दिया और उसके स्थान पर शेख निज़ाम के पुत्र अब्दुल्ला को नियुक्त कर दिया । बादशाह ने अब्दुल्ला को रुक्का चिपकाने वालों का पता लगाने के लिए कहा ।
अब्दुल्ला ने बुरी नीयत से शहर में यह ढिंढोरा फिरवा दिया- "जब बादशाह जुम्मे (शुक्रवार) की नमाज पढ़ने जामा मस्जिद जाएंगे, तब जो फरियादी हैं, वे उनसे मिल सकते हैं ।"
जब बादशाह जुम्मे की नमाज के लिए निकला, तो अब्दुल्ला खड़ा होकर सब फरियादियों के रुक्के लेता गया । वहां फरियादियों की भीड़ लग गई, जिनके बीच में लालदास और निर्मलदास भी अपना रुक्का लेकर गए । अब्दुल्ला ने लालदास का रुक्का पढ़कर फाड़ दिया और अपनी जेब में रख लिया । वह मोमिनों की बात को छिपाना चाहता था ।
लालदास और निर्मलदास ने बहुत पुकारा- "सुल्तान तो हमारे लिए ही खड़ा है, फिर तुम हमारी बात क्यों नहीं सुनते ? हमने ही गुसलखाने पर रुक्का चिपकाया था । तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ? क्या तुम्हें खुदा से डर नहीं लगता ?"
अब्दुल्ला ने उनकी एक न सुनी । जिसके दिल और आंखों पर मोहोर है, उसे कभी भी अक्ल नहीं आ सकती ।
तभी सुल्तान चल पड़ा । मोमिन आधा कि.मी. तक उसके घोड़े के पीछे दौड़े, परन्तु उस तक पहुंच नहीं सके ।
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