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विषय-सूची

जीव

आध्यात्मिक सिद्धान्तों का मूल आधार यह है कि संसार के हर प्राणी के शरीर में एक चेतना कार्य करती है, जिसे लोग जीव या जीवात्मा कहते हैं । सामान्यतः जीव को आत्मा का पर्यायवाची समझा जाता है, परन्तु दोनों में बहुत अन्तर है ।

परिचय

जीव के अन्तर्गत संसार के समस्त प्राणियों की चेतना को समझना चाहिए, शरीर को जीव नहीं कहा जा सकता ।

यह (आदि नारायण का अंश जीव) सभी स्थिर और चलायमान प्राणियों में व्यापक है ।1

उत्पत्ति

जीव की उत्पत्ति क्षर पुरुष (आदिनारायण) से होती है । आदिनारायण से उत्पन्न समस्त प्राणी जीव कहलाते हैं, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी शामिल हैं । जन्म लेने की प्रवृत्ति के कारण जीव को गर्भ में रहने का कष्ट भी झेलना पड़ता है ।

निवास

जीव का निवास नश्वर क्षर ब्रह्माण्ड है ।

लीला

जीव और नश्वर प्रकृति के बीच द्वैत का खेल चलता रहता है । वस्तुतः जीव के कर्मों को लीला कहना अनुचित होगा । कर्म-भाग्य, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, पाप-पुण्य, आदि के चक्र में जीव फंसा रहता है । जीव को भिन्न-भिन्न योनि, लिंग, प्रान्त, आदि में शरीर धारण करना पड़ता है । मोह, अज्ञान और तृष्णा के कारण वह इस आनन्दविहीन संसार में ही उलझा रहता है ।

संसार में जीव की स्थिति

यह दुनिया (जीव) दिल से अंधी (अज्ञानी) और दीवानी (मोहासक्त) है और इसकी प्रत्येक सन्धि (क्रिया) (माया से) बंधी हुई है ।2

जीव टेढ़ी-सकड़ी गलियों (योनियों) में बार-बार फिरता है । उसके गुण, पक्ष, अन्तःकरण और इन्द्रियां उसके अन्धकार (अज्ञानता) को और बढ़ा देते हैं ।3

चेतन (जीव) विस्तृत (प्रकृति के प्राणियों के शरीर) में व्यापक है । वह बार-बार आता (जन्म) और जाता (मृत्यु) रहता है । वही जड़ (शरीर) को चेतन करता है और चेतन को मृतप्राय बना देता है ।4

सब इसी (ब्रह्माण्ड) में अटक कर रह गए हैं, जिसके बीच में गोल इण्ड है और चारों तरफ मोह तत्व का आवरण है । कोई आगे का सेर भर शब्द (ज्ञान) भी नहीं पाता ।5

कोई जीव भक्ति या तप करके आगे बढ़ना चाहे तो भी वह आत्मा नहीं बन सकता, न ही कभी क्षर ब्रह्माण्ड को पार करके धाम जा सकता है ।

इस स्वप्नमयी संसार के सभी प्राणी नींद (निराकार) तक सीमित हैं और नींद ही उनका आधार है । यदि वे इससे आगे जाने के लिए बल लगाते हैं, तो निराकार में गल जाते हैं ।6

जो लोग बड़ी बुद्धि वाले कहलाते हैं, वे भी इस प्रकार ठण्डे पड़ गए । उन्हें छल (संसार) और वतन (धाम) की पहचान न हो सकी, सो वे शून्य (निराकार) में गल गए ।7

परब्रह्म के ज्ञान का लाभ

अब सब सीधे मार्ग (धाम के मार्ग) पर चलेंगे, सबको सत्य दिख गया है । प्रकाश (श्री कुलजम सरूप के ज्ञान) से स्वप्न की जाहेरी सृष्टि (जीव सृष्टि) को भी पहचान हो गई है ।8

अन्त

किसी प्राणी के शरीर की मृत्यु से जीव की मृत्यु नहीं होती, अपितु वह एक शरीर को त्यागकर पुनः दूसरा शरीर धारण कर लेता है । जीव का अन्त तब होता है जब प्रलय आती है, तब सभी जीव अपने मूल में समा जाते हैं ।



(1) कलस हिन्दुस्तानी 17/25 (2) कलस हि. 4/10 (3) कलस हि. 1/25 (4) कलस हि. 2/18 (5) कलस हि. 2/34 (6) कलस हि. 2/36 (7) कलस हि. 2/38 (8) कलस हि. 21/11