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श्री जी से बड़े अभियान के लिए आज्ञा मिली

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९२

सुन्दरसाथ ने श्री जी साहिब जी को पत्र लिखकर सारी घटना की सूचना दी ।

उसी पत्र में आगे लिखा- "हमने पैगाम पहुंचाने में कोई कमी नहीं करी, परन्तु हम क्या करें ? दज्जाल के वश में होने के कारण, ये लोग हमारी बात ही नहीं सुनते । अब हम इनको नहीं छोड़ेंगे । आप साक्षात् अक्षरातीत हमारे सिर पर खड़े हैं । अब आप हमारी लड़ाई देखिएगा । आपके हुक्म से हम पैगाम पहुंचाने का कार्य अवश्य करेंगे । अब हम लड़ने जा रहे हैं । आप सावधान रहिएगा । ये लोग हमारा क्या कर लेंगे, जब हमने आपके चरणों को दिल में बसा लिया है । अब हम इनके मन की अज्ञानता को मार देंगे और हमारे कदम पीछे नहीं हटेंगे ।"

जब कान्हजी भाई ने सुन्दरसाथ का यह पत्र श्री जी के हाथ में दिया, तो उन्होंने तुरन्त इसका उत्तर लिखकर भेजा- "आप व्याकुल मत होइए, मैं शीघ्र आ रहा हूं। मुझसे मिलने के बाद ही आप यह काम करना ।"

दूसरे दिन श्री जी साहिब जी चांदनी चौक में क्षत्रिय की हवेली में पहुंचे । उसी हवेली में लालबाई रहती थीं । वहीं पर श्री जी और सुन्दरसाथ की बैठक हुई ।

सुन्दरसाथ ने श्री जी से कहा- "इस कार्य को पूरा करने के लिए हम टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे । हमारे मन में किसी बात की चिन्ता नहीं है । जिन्हें इस बात से डर लगता है, वे एक तरफ हो जाएं । हमको सिर्फ आपके हुक्म की आवश्यकता है । आप धाम धनी के बिना हम कोई और बात नहीं जानते । हम अपने तन को निजानन्द के ऊपर न्यौछावर कर देंगे । औरंगज़ेब को सन्देश देने के अतिरिक्त हमें और कुछ नहीं दिख रहा है ।"

सुन्दरसाथ का जोश देखकर श्री जी बहुत खुश हुए और उन्होंने सुन्दरसाथ को बहुत दिलासा दिया । एक सत्य धर्म का आशिक होना भी धाम धनी की मेहेर से ही सम्भव है ।

सुन्दरसाथ ने अपने हाथ से भोजन बनाकर बहुत भाव से श्री जी को आरोगाया । इस समय लालदास जी की पुत्री श्याम बाई और उसके पति राम राए ने श्री जी के चरणों में प्रणाम किया । अब सुन्दरसाथ बहुत खुश होकर प्रेम से श्री जी को मिठाई व अन्य वस्तुएं खिलाने लगे । श्री जी ने प्रसन्न होकर सुन्दरसाथ को इस अभियान के लिए स्वीकृति दे दी ।

सुन्दरसाथ ने श्री जी से कहा- "आप किसी एकान्त स्थान पर चले जाइए और अब हमारा कार्य देखिए ।"

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