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बारह मोमिन

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९३

श्री जी के जाने के बाद सुन्दरसाथ विचार करने लगे कि अब अपने आप को बलिदान किए बिना यह कार्य नहीं हो सकता ।

सुन्दरसाथ में कुछ ऐसे भी थे, जिनके दिल में खोट था और जो मन-ही-मन इस कार्य से डरे हुए थे । कुछ ऐसे आशिक थे, जो अपने कदम हमेशा आगे रखते थे । और कुछ आशिक ऐसे थे, जो श्री जी साहिब जी पर कुर्बानी की बात सुनकर अपना तन-मन वारने के लिए तैयार थे ।

जिन १२ मोमिनों ने अपने जीवन की परवाह किए बिना शरीयत से लोहा लिया, अब उनके नाम लिखे जाते हैं ।

सबसे पहले लालदास और शेखबदल थे, जिन्हें औरंगज़ेब तक सन्देश पहुंचाने की बहुत जल्दी थी । वे धाम धनी पर पूरी तरह समर्पित थे ।

मुल्ला कायम को श्री जी के स्वरूप की ऊपरी पहचान थी । वह नानिया फिरके (सूफी) से था और फारसी-हिन्दी अनुवाद का कार्य धन के बदले करता था ।

सूरत के भीम भाई भी इस मण्डली में थे । वे अपने परिवार को त्यागकर श्री जी की शरण में आए थे और निजानन्द पर पूरी तरह फिदा थे ।

सोमजी भाई खम्भात से आए थे और वे भी इस कार्य के लिए बलिदान देने को तैयार हो गए ।

सूरत के नागजी भाई अपना परिवार छोड़कर आए थे । इनके दिल में धाम धनी के बिना और कोई आस नहीं थी ।

बुन्देलखण्ड के खिमाई भाई भी ईमान लेकर आए थे । इन्हें श्री जी के वास्तविक स्वरूप की पूरी पहचान थी और इन्होंने तन-मन-धन से सेवा करी ।

दिल्ली के दयाराम भी इस मण्डली में थे । उनके अन्दर पूरा ईमान और जोश था । वे सदैव सेवा में रहते थे, कभी भी उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ा ।

ठट्ठानगर के चिन्तामणि भी श्री जी पर ईमान लाए थे । उन्हें श्री जी के स्वरूप की पूरी पहचान थी और उन्होंने तन-मन-धन से सेवा करी ।

दिल्ली के चंचल भी पूरे ईमान से सेवा में तत्पर रहते थे । अपने परिवार की झूठी आस छोड़कर, वे धाम धनी की शरण में आ गए थे ।

गंगाराम की दिल्ली में निजी दुकान थी । इन्हें भी श्री जी पर अटूट आस्था थी और सेवा में लगे रहते थे ।

बनारसी दास कुछ ही समय पहले सुन्दरसाथ में शामिल हुए थे । श्री जी के स्वरूप की पहचान करके, वे सेवा में समर्पित हो गए । वे जागनी कार्य के लिए धन एकत्रित करते थे ।

इन १२ मोमिनों के अतिरिक्त और बहुत से सुन्दरसाथ थे, जिन्होंने श्री जी का पैगाम औरंगज़ेब तक पहुंचाने में सहयोग दिया ।

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