अवज्ञाकारियों पर रोष
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९६
जब श्री जी साहिब जी को कान्हजी भाई से इस घटना की सूचना मिली, तो वे क्रोधित होकर बोले- "मैंने अपना पैगाम देकर मोमिनों को सुल्तान के पास भेजा था । इन लोगों ने मेरे सुन्दरसाथ को कसाला देकर अपने ऊपर गुनाह लिया है । अब उन्हें इस कार्य का दण्ड पाने से कोई नहीं बचा सकता ।"
पैगम्बर को कष्ट देने पर जो गुनाह लगता है, वही गुनाह उनके दोस्तों (साथियों) को कष्ट देने पर लगता है ।
इबलीस ने अल्लाह तआला के नाम पर सारी जमीन पर सिजदा किया, पर अल्लाह के हुक्म के बावजूद आदम पर सिजदा नहीं किया, इसलिए उसके द्वारा पहले किए गए सारे सिजदे रद्द हो गए । इबलीस ने आदम के बाह्य मानवीय रूप को ही देखा, उसके अन्दर बैठी अल्लाह तआला की रूह को नहीं पहचाना, जिस कारण उस पर लानत लगी ।
अब विचार करके देखो कि यहां कौन आदम है और कौन इबलीस है ? अल्लाह (परब्रह्म) का पैगाम लेकर आने वाले इमाम महदी (श्री जी साहिब जी) ही आदम हैं, जिनके अन्दर अल्लाह की रूह विराजमान है । इबलीस सबके दिलों पर राज करता है । जिन लोगों ने इमाम महदी और उनके साथियों को हिन्दू तन में होने के कारण नहीं पहचाना, उन पर सिजदा नहीं किया, और उनके पैगाम को नहीं माना, वही इबलीस का स्वरूप हैं ।
जब मोमिनों ने शरीयत को मानने वाले इन कट्टरपंथी लोगों को इमाम महदी (श्री जी साहिब जी) का पैगाम देना चाहा, तो इन लोगों ने इमाम की महिमा को ढक दिया । ऐसे लोगों पर खुदा (परब्रह्म) की लानत है । कयामत के समय, इन्हें मोमिनों (ब्रह्मसृष्टियों), फरिश्तों और संसार के सभी लोगों की लानत लग गई ।
कुरान के दूसरे सिपारे (सयकूल) में लिखा है कि दज्जाल लोगों के दिल में बैठकर उन्हें इस्लाम (निजानन्द) के मार्ग पर चलने नहीं देता ।
अगर इन लोगों ने इमाम महदी के पैगाम को न ठुकराया होता, तो सभी लोगों को श्री जी साहिब जी के रूप में खुदा (परब्रह्म) का साक्षात्कार हो जाता और उन्हें अर्श (परमधाम) की राह मिल जाती । अपने को इल्मी (ज्ञानी) समझने वाले लोगों ने इस काम को बिगाड़ दिया ।
कुरान में ऐसे लोगों को कानों से बहरा कहा गया है, तभी वे इमाम महदी के महत्वपूर्ण सन्देश को बार-बार अनसुना करते रहे । उनकी आंखों पर मोहोर कही गई है, अर्थात् वे दिल के अंधे हैं ।
मोमिनों ने उन्हें पैगाम पहुंचाकर अपना फर्ज उतार दिया । कयामत के सात निशान जाहेर हो गए । मगरब (पश्चिम) से सूर्य उदय हो गया, अर्थात् इमाम मुहम्मद महदी हिन्दुओं में जाहिर हो गए । तब भी वे लोग देख नहीं सके । उनके दिल में बैठे दज्जाल ने उन्हें विचार ही नहीं करने दिया कि वे किस अनमोल न्यामत (अल्लाह) को खो रहे हैं ।
औरंगज़ेब को बैतुल्लाह (मक्का) से चार वसीयतनामें आए कि इमाम महदी जाहिर हो गए हैं, तो भी वे लोग सावधान नहीं हुए और उन वसीयतनामों को दरकिनार कर दिया ।
शरीयत पर चलने वाले इन लोगों ने अपने लौकिक स्वार्थ के लिए इस्लाम को छोड़ दिया । सांसारिक सुख और सत्ता के लिए इन्होंने पैगम्बर (श्री जी साहिब जी) को पीठ कर दी । यही नहीं, इन्होंने मोमिनों को कष्ट भी दिए ।
इन लोगों के लिए दोजख तैयार की जा रही है और मोमिनों (सुन्दरसाथ) के ऊपर हादी की मेहेर है ।
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