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श्री जी द्वारा मोमिनों को पत्री

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९७

जब बारह मोमिन कैद में थे, तब श्री जी साहिब जी ने उन्हें दिलासा और सिखापन देने के लिए अपने हाथों से हस्ताक्षर करके पाती भेजी ।

श्री जी ने लिखा-

"मेरे प्राण के प्रियतम, मेरे सिरदार सुन्दरसाथ ! आप मेरी आत्मा के आधार और जीव के जीवन हो ।

"प्रेम में डूबे मेरे साथ जी, मेरे सच्चे सूरधीर ! आपने धर्म के मार्ग पर स्वयं चलकर अन्य रूहों को दिखाया है । आप तो हक (अक्षरातीत) के निकट विराजमान हैं ।

"जिस लज्जा ने पूरे संसार को बांध रखा था, आपने उस लज्जा का सिर कुचल दिया । आपने सब साथ का सिर ऊंचा कर दिया और आपको प्रियतम अक्षरातीत के स्वरूप की पहचान हो चुकी है ।

"आपने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया, जिसके लिए आप शोभा के योग्य हैं । आप एक-दूसरे से शिरोमणि हैं तथा इस महान कार्य के लिए अपने कदम को आगे बढ़ाते रहे हैं ।

"हे लक्ष्मण भाई (लालदास), भीम भाई, नागजी भाई, चिन्तामणि, दयाराम, चंचल, गंगाराम, बनारसी भाई, सोम भाई और खिमाई भाई, आप दसों ब्रह्मसृष्टियों में शामिल हैं । हे अनन्त राम भाई, तुम सच्चे शूरधीर हो । हे लालबाई, श्यामबाई और रामराए, तुम सब धाम धनी के निकट हो । समस्त शूरधीर सुन्दरसाथ, जो इस समय धर्म के लिए लड़ रहे हैं या लड़ने की आशा रखते हैं, मैं उन सबको सम्बोधित कर रहा हूं ।

"ऐसे सभी सुन्दरसाथ श्री राज के चरण तले स्वस्थ और आनन्द-मंगल से रहें । आपके ऊपर श्री राज की कृपा-दृष्टि है । मैं, इंद्रावती की आत्मा, आपको करोड़ों बार प्रणाम करती हूं । आप मेरे प्रणाम को स्वीकार करिए तथा धनी की ओट में रहिए । जब श्री राज की दया से सुन्दरसाथ एकजुट हो जायेंगे, तब सबको सुख और आनन्द की अनुभूति होगी ।

"मुझे यह इच्छा थी कि पाती के माध्यम से आपके कुशलक्षेम की जानकारी मिल जाए, सो शेख बदल ने आपकी सारी हकीकत बता दी । मुझे सब कुछ पता चला कि आपने शुरु से किस प्रकार दज्जाल से बड़ा युद्ध किया ।

"इस घटना की भविष्यवाणी मुहम्मद साहिब ने कुरान-हदीसों में इशारों में लिखवा दी थी । कयामत के विषय में जैसा उन्होंने लिखवाया था, वैसा ही यह युद्ध हुआ और आगे भी होएगा, और अन्त में आपका बोल-बाला होगा ।

"आप इस हकीकत को समझिए कि जब हम माया के व्यवधानों से दुःखी हो जाते हैं, तो सोचते हैं कि यह महान कार्य सफल क्यों नहीं होता और सब इसे स्वीकार क्यों नहीं करते, परन्तु आप समझने का प्रयास करिए कि यह बहुत बड़ा कार्य है । कोई कार्य जिस दिन और जिस प्रकार से होना लिखा है, उसी दिन और उसी प्रकार से होगा ।

"आपने जो वीरतापूर्ण कार्य किया है, उसे अपने द्वारा किया हुआ न समझना । श्री राज के हुक्म के बिना यह कार्य नहीं हो सकता था । यह तो धाम धनी ने आपको शोभा दी है ।

"आपको इस बात का आभास नहीं है कि आपके माध्यम से कितना बड़ा कार्य हुआ है । आज तक संसार के लोग इमाम महदी का नाम लेने से भी डरते थे कि ऐसा करने पर कट्टरपंथी मुसलमान हमें मार डालेंगे । हम लोग भी छिप-छिपकर रहते थे, परन्तु अब आप जाहिर हो गए हैं, सो कयामत की बात खुलकर प्रचारित करो ।

"अब आप इनके जैसे होकर इनके बीच बैठे हैं और आपने इमाम महदी का थाना उनके घर में स्थापित कर दिया है । जब आपने इनके सामने जाहिर कर दिया कि आप इमाम महदी के साथी हैं, तो अब यह बात गांव-गांव, शहर-शहर, थाने-थाने तक पहुंच जाएगी । अब आपके ज्ञान का तेज दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा, और दज्जाल की शक्ति तब तक प्रतिदिन-प्रतिपल घटती रहेगी जब तक स्वाप्निक बुद्धि समाप्त नहीं हो जाती ।

"दज्जाल रूपी मनुष्यों की दृष्टि बहिर्मुखी है, जबकि आपके पास अन्तर्दृष्टि है । आपके लिए इस्राफील फरिश्ता हकीकत का ज्ञान लेकर प्रकट हुआ है । आप इनसे ज्ञान-युद्ध करते रहना क्योंकि धाम धनी ने आपको अनन्त नेत्र प्रदान किए हैं, जबकि दज्जाल (अज्ञानी मनुष्यों) के पास तो एकमात्र बहिर्मुखी नेत्र है जिसका आखिर में अन्त होगा ।

"एक बात और समझ लीजिए कि आपने जो अच्छी तरह से दज्जाल से युद्ध किया, वह सब अक्षरातीत के हुक्म से सम्भव हुआ है । दज्जाल से वैसे ही लड़ना चाहिए, जैसे सुअर से लड़ा जाता है । सुअर से सीधे न टकराकर, पहले उसके प्रहार से अपना बचाव किया जाता है, बाद में उसकी पीठ पर प्रहार किया जाता है क्योंकि वह अपनी गर्दन नहीं मोड़ सकता अर्थात् वह हक (परब्रह्म) की तरफ अंधा है । आपने दज्जाल के सीधे प्रहार से तो बचाव कर लिया, अब वे आपके कदमों में लोट-पोट होंगे । आप धाम धनी की ओट लेकर सावधानी से व्यवहार करना ।

"मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दाभ-तुल-अर्ज जानवर का वर्णन किया है, जिसकी छाती शेर की होगी, पहाड़ी बैल के सींग होंगे, और पीठ गीदड़ की होगी । यह कोई जानवर नहीं है, अपितु मनुष्य की प्रवृत्ति बुद्धिहीन पशुओं जैसी हो गई है । आपको ऐसे ही लोगों से लड़ना पड़ेगा, इसलिए मैंने सावधान करने के लिए लिखा है ।

"अतः आप इनसे युक्तिपूर्वक युद्ध करना । जाग्रत बुद्धि के बिना उन्हें पराजित करना सम्भव नहीं है । उनसे विनम्र और मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना । आपके समझने के लिए कुछ बातें संकेत में लिखी हैं, नहीं तो आप तो बुद्धिमान हैं । हर बात का स्पष्ट उत्तर देना, मैं सदैव आपके संग हूं ।

"बादशाह की तरफ से फकीरों को जो खैरात (दान) मिलती है, उसी पर गुजारा करना । यदि वे आपको कुछ वस्तु देने की इच्छा प्रकट करें, तो अपने रहने के लिए एक अलग हवेली मांग लेना । अपनी भूख के अनुकूल ही भोजन लेना ।

"रसूल मुहम्मद द्वारा लाई गई कुरान तथा हदीसों को पुस्तकालय से मंगवा लेना । कुरान-हदीस की शिक्षा के लिए मौलवी की मांग करना । यदि वे लोग आपकी मांग को स्वीकार न करें, तो भी आप विनम्रता नहीं छोड़ना । उनसे पुनः अर्ज करना कि बादशाह औरंगज़ेब से एकान्त में बात करने दें । किसी अल्पबुद्धि वाले व्यक्ति की संगति में नहीं रहना ।

"उनसे कहना कि वे हिन्दुओं को डराकर मुसलमान बनाने का प्रयास मत करें । यदि वे लोग हिन्दुओं को जबरन गोश्त खिलाने का प्रयास करेंगे, तो कोई भी उनके निकट नहीं आएगा और उन पर बहुत गुनाह भी लगेगा ।

"जब हिन्दुओं को रसूल मुहम्मद के वास्तविक स्वरूप की पहचान हो जाएगी, तो वे सब उन पर ईमान ले आएंगे । तब सभी एक खुदा (अक्षरातीत) के हुक्म की ओट में आ जाएंगे ।

"यदि ये लोग पहले ही रसूल मुहम्मद की बात को सिर चढ़ाते, और कयामत तथा इमाम महदी का सत्य स्वीकार कर लेते, तो सब तरफ ज्ञान का उजाला फैल जाता और अनेक ब्रह्मसृष्टियां दौड़कर साथ में शामिल हो जातीं ।

"अब भी यदि काज़ी शेख इस्लाम आपकी भेंट बादशाह से करवाता है, तो उसे अपनी युक्तिनुसार समझाने का प्रयास करना जिससे उसे सत्य की पहचान हो जाए । बादशाह से यह भी कहना कि वह हिन्दुओं पर मुसलमान बनने के लिए जोर-जुल्म न करे क्योंकि इस प्रकार कोई भी कलमे को दिल से स्वीकार नहीं करेगा । कुरान-हदीसों में भी ऐसा करने से मना किया गया है । वास्तविकता यह है कि उन्हें हिन्दुओं को बातचीत द्वारा कुरान के ज्ञान से समझाना चाहिए ।

"उनसे कहना कि जो कार्य हमारे फकीर इमाम महदी कर रहे हैं, उसके लिए हक सुभान (अक्षरातीत) की शक्ति चाहिए । वे अपने आत्म-बल से सबको एक सत्य धर्म में अवश्य ले आयेंगे ।

"जब आपको किसी को बुलाना पड़े, तो इतने प्रेम से बुलाना जैसे अपने पुत्र को बुलाया जाता है । फिर उसे अपनी बुद्धिनुसार समझाना । किसी को एक बार में ही बहुत ज्ञान मत देना, थोड़ा-थोड़ा करके कहना ।

"मेरी इच्छा थी कि आप लोग अपनी हिन्दू वेशभूषा में ही बादशाह से मिलें, परन्तु भेष त्याग कर भी बादशाह तक पहुंच जाना बहुत बड़ी बात है । यह भी सत्य है कि हिन्दू भेष में जाने पर वे लोग कभी विश्वास नहीं करते, न ही ज्ञान की कोई बात सुनते ।

"अतः आप उन लोगों के साथ विनम्रतापूर्वक मित्रवत् व्यवहार करना, तभी वे खुलकर आपसे बात करेंगे और धनी की पहचान कर सकेंगे । उन्हें एक सत्य धर्म में लाने का कार्य बहुत धीरे-धीरे होगा ।

"इस बात के लिए कभी शर्म न करना कि आपने हिन्दू भेष को त्याग दिया है । धर्म के मार्ग पर लोक-लाज को तो छोड़ना ही पड़ता है । यदि कोई इस बात के लिए आपको शर्मिन्दा करता है, तो उसे शास्त्रों से करारा जवाब देना । उन्हें वेद, वेदान्त, गीता, वल्लभाचार्य मत, शंकराचार्य मत, आदित्य पुराण, भागवत, आदि के दृष्टान्तों से समझाना । उनसे कहना कि इन ग्रन्थों के साथ-साथ कुरान-हदीसों के ज्ञान को तोलकर चिन्तन करने की जरूरत है । जब आप ऐसे लोगों को 'सनंध नबी नारायन की' सुनाएंगे, तब वे सब शर्मिन्दा होंगे ।

"हिन्दू और मुसलमान अपनी अलग-अलग रस्मों (कर्मकाण्ड) और अहंकार के कारण लड़ते हैं । जब अक्षरातीत ने तारतम ज्ञान लाकर सभी धर्मग्रन्थों के गुह्य रहस्य खोल दिए, तब किसी का अहंकार नहीं रहेगा और वे सब लज्जित होंगे । उनके दिल पर शैतान का कब्जा है, जिसके कारण वे लोग अज्ञान और अहंकार को पकड़कर बैठे हैं । जब तारतम ज्ञान के प्रकाश से शैतान नष्ट हो जाएगा, तब सभी सिर नीचा करके भेड़ों की भांति एक परब्रह्म की शरण में आयेंगे ।

"एक सत्य धर्म के दरवाजे की कुंजी तारतम ज्ञान है, जो हक अक्षरातीत ने मेहेर करके आपको दी है । आप सदैव अपना सिर गर्व से ऊंचा रखिएगा । यदि कोई आप पर किसी तरह का दोष लगाता है, तो भी आप ब्रह्मसृष्टि का दावा लेकर ईमान पर खड़े रहना ।

"गोविन्द भेड़ा का दृष्टान्त तो आपने सुना ही है । आपके ऊपर धनी की ऐसी कृपा है कि ऐसा कोई भी प्रलोभन आपको फंसा नहीं सकता । आप एक-दूसरे से बढ़कर शिरोमणि सुन्दरसाथ हैं और धनी ने आपको पहले ही माया की शक्ति से परिचित करा दिया है ।

"अभी तो आपकी संख्या बारह है । आगे बारह हजार आकर सुन्दरसाथ में शामिल होंगे । वे सब आपके आदर्शों का अनुसरण करेंगे । आप उन सबमें सिरदार हो । अब आप तारतम ज्ञान के वचनों को जाहिर कर दो । आपको ब्रह्ममुनि मानकर गांव-गांव और देश-देश के हिन्दू और मुसलमान आपके चरणों की पूजा करेंगे ।

"अब आप लक्ष्य पर अपनी दृष्टि केन्द्रित रखिए । यदि आपको ऐसा लगता है कि मुझे यहां नहीं रहना चाहिए, तो मैं किसी अन्य स्थान पर जाकर जागनी करता हूं और दोबारा लौटकर दज्जाल से युद्ध करूंगा । किन्तु यह सब विचार करने की आवश्यकता तो तब पड़ेगी, जब ये लोग आपके साथ दुर्व्यवहार करें । एक दिन सभी मुसलमान आपके चरणों की वन्दना करेंगे ।

"जब अक्षरातीत परब्रह्म की तरफ मोड़ने वाली आपकी प्रेममयी वाणी को सुनेंगे, तब सारा संसार आपको धन्य-धन्य कहेगा । जब लोग आपके ईमान के जोश को देखेंगे, तब वे बिना मारे ही मर जाएंगे । आप वहीं रहिए, जब तक सुल्तान आपकी बातों को अपने दिल में नहीं बसा लेता ।

"सुल्तान औरंगज़ेब ने अब तक आपकी बातों पर ध्यान इसलिए नहीं दिया, क्योंकि एक तो उसकी दृष्टि बहिर्मुखी है अर्थात् वह शरीयत (कर्मकाण्ड) में फंसा हुआ है । दूसरा, उसे अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान नहीं है । तीसरा, सुल्तान यह सोचता है कि यदि इमाम महदी जाहिर हो गए तो शरा-तोरा का शासन समाप्त हो जाएगा । उसके मन में यह शंका भी बैठ गई है कि कहीं ये मोमिन उसके यश को मिटाने तो नहीं आए हैं ?

"ये मुसलमान लोग समझते हैं कि जब इमाम महदी, ईसा रूह अल्लाह, और दज्जाल आयेंगे, तो तलवारों से भयंकर युद्ध होगा । मोमिन सत्तर हजार काफिरों का वध करेंगे । पूरे संसार में रक्त और हाथियों के शव बिखरे होंगे । खाने के लिए दाना, पानी या घास भी नहीं रहेगी । वे लोग इसका बाह्य अर्थ लेते हैं, इसीलिए कयामत के नाम से भी डरते हैं । वे इसके पीछे छिपे गुह्य आध्यात्मिक सन्देश को समझ नहीं पाते ।

"अक्षरातीत परब्रह्म ने मेरे स्वरूप पर ऐसा जादू कर रखा है कि वे लोग मुझे साधारण मनुष्य समझते हैं । जब वे मुझे अन्य मनुष्यों के समान समझेंगे, तो मेरे प्रति ईमान कैसे लायेंगे और उनके संशय कैसे समाप्त होंगे ?

"सुल्तान औरंगज़ेब तक सन्देश पहुंचाने की जिम्मेदारी आपने अपने सिर ली है और दृढ़ संकल्प से ज्ञान का पसारा किया है । जिस उत्साह से आप जामा मस्जिद गए थे, अब पुनः उसी उत्साह से प्रयास करिए ।

"मैंने पत्र लिखकर आपको इसलिए सावधान किया है कि आप बादशाह तक इन बातों को पहुंचाने का पुनः प्रयास करना । आपके तारतम ज्ञान के सामने बड़े-बड़े धर्माधिकारी भी नतमस्तक हो जाएंगे और आपसे आध्यात्मिक शिक्षा लेंगे, इसलिए आप किसी बात की चिन्ता मत करना ।

"अपनी दृष्टि धाम धनी के चरणों में रखना और बैठक बन्द मत करना । कयामत और इमाम महदी के प्रकटन की बात को अब कोई छिपा नहीं सकता । आप जैसे महान कार्य पर गए हो, वैसा ही आत्म-बल दिखाना, नहीं तो इन लोगों को आप पर संशय हो जाएगा । मैं आपके सिर पर एक पांव से खड़ा हूं । आप अपना हिन्दू रहन-सहन बनाए रखना ।

"यदि आपके ज्ञान से प्रभावित होकर कोई मेरे अलौकिक स्वरूप को स्वीकार करे अथवा मेरे आत्मिक बल के प्रभाव से आपको मोमिन मान ले, तो अवश्य लिखना । आप दुःखी मत होना, सब भला होगा । प्रियतम अक्षरातीत की कृपा से धैर्य द्वारा आप इस धर्म-युद्ध को लड़ने में सफल हुए हैं ।

"आप अपने दिल में जरा भी संशय मत लाना । यह ज्ञान की लड़ाई है, जिसे ईमान (श्रद्धा) से ही जीता जा सकता है । आपके त्याग और प्रयास से शीघ्र ही सत्य का प्रकाश फैलेगा, किन्तु यह कार्य जल्दबाजी से नहीं होगा ।

"यह माया छल रूप है और इसे छल से ही जीता जा सकता है । भगवान विष्णु के अन्दर बहुत बल है, फिर भी असुरों से जीतने के लिए उन्हें छल (युक्ति) का सहारा लेना पड़ता है । यह बात तो आप जानते हैं कि मैंने हरजी व्यास से कैसे ज्ञान-युद्ध किया था ? वे एक वचन कहते थे तो मैं दस बार उनके चरण पकड़ता था, परन्तु जब अवसर आया तो मैंने उन्हें नतमस्तक कर दिया । अन्ततः उन्होंने मेरे चरण पकड़ लिए ।

"इस ज्ञान-युद्ध की जिम्मेदारी मैंने आप बारह सुन्दरसाथ को सौंप दी है । जैसा बाजा बजे वैसा ही नृत्य करना, अर्थात् परिस्थितियों के अनुसार उचित व्यवहार करना । सबसे बड़ी बात तो यह है कि आप सब मिलकर एकरस होकर रहना । बाद में आपको सब रहस्य खुल जाएंगे । यह कार्य धीरे-धीरे होएगा और आवश्यकतानुसार धाम धनी आपको सब कुछ बताते जाएंगे ।

"यदि कोई आपसे ज्ञान सुनने आता है, तो उसे इतने प्रेम से चर्चा सुनाना कि आपके वचन उसके हृदय में चुभ जाएं । तब उसका हृदय घायल हो जाएगा और उसमें करुणा पैदा होगी । फिर अनेक लोग आपसे मिलने आयेंगे । आपके वचनों से उनके संशय मिट जाएंगे । जिसके अन्दर तारतम ज्ञान का प्रकाश होगा, वह स्वयं ही जाग्रत हो जाएगा ।

"आप उतावले होकर किसी से उलझ न जाना क्योंकि सब कार्य धैर्य से पूर्ण होते हैं । उतावलेपन में किए गए काम शैतान के होते हैं, और धैर्यपूर्वक किए गए काम अक्षरातीत की कृपा से होते हैं ।

"मैंने शेख बदल और कान्हजी भाई को आपके पास भेजा है । मेरे पत्र पर अच्छी तरह विचार करना और कान्हजी भाई को अपने पास रख लेना । यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जागनी के लिए बाहर निकलूं, अन्यथा मैं यहीं तक सीमित रहूंगा । मैं उलझन में हूं कि न तो आपकी कोई सहायता कर सकता हूं, न ही अपना पालन कर पा रहा हूं । ऐसे में कार्य कैसे होगा ?

"मेरी यह इच्छा है कि किसी अन्य राजा को जाग्रत करके दूसरा मोर्चा खड़ा करूं । ऐसा राजा ही औरंगज़ेब को समझाएगा कि जिस फकीर ने मोमिनों को भेजा है, वही इमाम महदी हैं और उन्हें अल्लाह (अक्षरातीत) के कलाम (वाणी) उतरते हैं ।

"इसके पश्चात् जैसा आप पत्र में लिखेंगे, मैं उसके अनुसार ही कार्य करूंगा । यदि मैं जागनी करने के लिए बाहर जाता हूं, तो उससे आपको सहायता मिलेगी । आपको जो कुछ कहना हो, मुझे सन्देश भेज सकते हैं या मिलने भी आ सकते हैं ।

"आप उन लोगों से कहना कि उन पर मेहेर करके अल्लाह (परब्रह्म) ने सनंध किताब भेजी थी, परन्तु इस्लाम पर ईमान रखने का दावा करने पर भी उन्होंने उस पाक किताब को नकार दिया ।

"वास्तव में इस्लाम (सत्य धर्म) की राह पर तो आप सुन्दरसाथ खड़े हैं, परन्तु आप कर भी क्या सकते हैं, जब तक रसूल मुहम्मद द्वारा फुरमाया हुआ दिन नहीं आता, तब तक इन लोगों को ईमान नहीं आएगा । इसीलिए इन लोगों ने आपके सन्देश को अनसुना कर दिया ।

"अब रसूल मुहम्मद के कहे अनुसार, मैं किसी अन्य राजा को जाग्रत करके इनके पास भेजूंगा । प्रियतम अक्षरातीत ने जिसे इस शोभा के लिए चुना है, मुझे खींचकर उसी के पास ले जाएंगे ।

"आपके मन में शुरु से इच्छा थी कि आप औरंगज़ेब तक कयामत का सन्देश पहुंचायें इसलिए मैंने आपको वहां भेजा, परन्तु होता वही है जो अक्षरातीत चाहते हैं । ऐसे कठिन समय में आपको छोड़कर मुझे कहीं जाना तो नहीं चाहिए, परन्तु धाम धनी की यही प्रेरणा हो रही है और उनकी इच्छा के आगे मेरा वश नहीं चलता ।

"आपको कुछ भी कहना हो, तो आपस में विचार करके मुझे पत्र लिखना ।"

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