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मोमिनों की काज़ी शेख इस्लाम से वार्ता

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९८

जब मोमिनों की काज़ी शेख इस्लाम से बात हुई, तब उन्होंने पूछा- "क्या हमारे पैगम्बर एवं कुरान-हदीसों ने ऐसा कहा है कि जो खुदा और रसूल पर ईमान लाए, उसे यातना देनी चाहिए ? न हमने किसी का धन लिया, न कोई चरित्रहीनता का कार्य किया, न हमने चोरी करी, तो हमारे साथ ऐसा घृणास्पद व्यवहार क्यों किया गया ? अब हम बादशाह से मिलने उनके घर नहीं जाएंगे । अब हम आपके साथ रहेंगे, आप ही हमारी बात सुनिए ।"

यह सुनकर काज़ी शेख इस्लाम रो पड़ा । पैगम्बर का नाम सुनकर उसने मोमिनों को कोतवाल से मुक्त करवाकर दीन की चर्चा करने के लिए अपने पास रख लिया ।

काज़ी ने सुन्दरसाथ से कुरान की इन्ना इन्जुलना सूरत का अर्थ पूछा । जब सुन्दरसाथ ने उसका गुह्य अर्थ बता दिया, तो वह बहुत खुश हुआ ।

तब काज़ी ने सुल्तान औरंगज़ेब से अर्ज करी- "मैं इन मोमिनों की खिदमत (सेवा) करना चाहता हूं ।"

सुल्तान ने तुरन्त हुक्म दिया- "तुम इन्हें अपने पास ले जाओ और इनकी खिदमत करना । इन्हें मलीदे (स्वादिष्ट व्यंजन) मंगवाकर खिलाना । हमारी तरफ से इन्हें कोई दुःख नहीं पहुंचना चाहिए ।"

अब काज़ी सुन्दरसाथ को अपने घर ले गया । बादशाह के कुछ सैनिक बाहर पहरा देने लगे, जिन्हें देखकर लोग तरह-तरह की बातें करने लगे ।

दूसरे दिन सुन्दरसाथ को बुलाकर काज़ी ने बात की । वह कयामत और इमाम महदी के बारे में पूछने लगा, जिसका सुन्दरसाथ ने स्पष्ट उत्तर दिया ।

इसके बाद सब सुन्दरसाथ काज़ी के भाई के घर गए । वहां बात करते समय शेखबदल को ऐसा जोश चढ़ा कि उनका तेज देखकर काज़ी का भाई अपने घर से भाग गया ।

फिर तीसरे दिन जब काज़ी ने सुन्दरसाथ को अपने पास बुलाया, तो सुन्दरसाथ ने काज़ी को एक हदीस (इस्लामिक ग्रन्थ) दी जिसमें कुछ खास बातें लिखी थीं ।

काज़ी कहने लगा- "ऐसा लगता है कि यह किताब आप लोगों ने बनाई है, क्योंकि इसमें वही बातें लिखी हैं जैसी आप बताते हैं ।"

मोमिनों ने उत्तर दिया- "हम ऐसा काम नहीं कर सकते । हम इस हदीस को उर्दू बाजार से खरीदकर लाए हैं । आप चाहें तो उस दुकानदार से पूछ सकते हैं ।"

तब काज़ी मौन हो गया ।

फिर सुन्दरसाथ को एकान्त में ले जाकर, उसने दो सनंधे सुनी- "सनंध बिना एक महम्मद की" और "सनंध दोजख की" । उन्हें सुनकर काज़ी बहुत खुश हुआ और सुन्दरसाथ से बार-बार गाने का निवेदन करने लगा ।

वहीं पास में कोषाधिकारी खड़ा था, जो नागर जाति का था । काज़ी ने उससे कहा- "इसे सुनो । देखो तुम्हारे धर्म के लोग कैसा ईमान लाए हैं ।"

यह सुनकर अधिकारी बोला- "मेरे सामने ऐसा अनर्थ हो रहा है, मैं इन लोगों से क्या कहूं ?"

ऐसा कहकर वह वहां से ऐसा भागा, जैसे अभी धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए । वह बहुत दुःखी होकर सीधा अपने घर चला गया । इस घटना के कारण वहां बहुत शोर मच गया ।

अब काज़ी ने सुन्दरसाथ से पूछा- "ऐसा कहां लिखा है कि दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं सदी में कयामत आएगी ?"

सुन्दरसाथ ने उत्तर दिया- "यह बात सत्य है और कुरान में अलग-अलग पारों में संकेत में यह बात लिखी है । तेरहवीं सदी में कुरान के गुह्य रहस्य सिद्ध हो जाएंगे । हमारे हादी आखरूल इमाम मुहम्मद महदी ने इसकी सारी हकीकत खोलकर जाहिर कर दी है ।"

तब वहां बैठे सभी लोग एक-दूसरे को देखने लगे और उनके मन में एक ही बात थी कि मोमिनों द्वारा कयामत और इमाम महदी के जाहेर होने का दावा करना तो बहुत बड़ी बात है ।

तब एक आदमी ने पूछा- "आप लोगों को इस्लाम पर ईमान लाए इतने दिन हो गए, फिर भी आपने कभी नमाज क्यों नहीं अदा करी ?"

मोमिनों ने उत्तर दिया- "हमारी नमाज कभी बन्द नहीं होती । अगर हम दुनिया का कोई काम करते, तब तो हमारी नमाज बन्द होती । हम तो परवरदिगार और दीन इस्लाम के काम में ही लगे रहते हैं । इसलिए हमारा बैठना, उठना, चलना और बात करना, सब कुछ नमाज ही है ।"

तब वे लोग एक-दूसरे से कहने लगे कि इनका जवाब दो, परन्तु किसी को भी कोई उत्तर नहीं सूझा ।

फिर अगले दिन काज़ी ने मोमिनों को बुलाकर कहा- "आप मुझे कोई सनंध सुनाइए, जिससे मुझे अपने स्वरूप की पहचान हो जाए ।"

लालदास और भीम भाई ने उसे इमाम के मिलाप की सनंध सुनाई, परन्तु जिनके पास अन्दर की आंखें ही नहीं हैं, वे सत्य को देख नहीं पाते ।

जब श्री इन्द्रावती जी की आत्मा का मिलन अपने प्रियतम अक्षरातीत से हुआ, तब उन्हें महदी या महामति की शोभा मिली ।

इस बात को सुनकर काज़ी ने किताब रखने को कहा और तद्पश्चात् लगातार तीन बार इस सनंध का तात्पर्य पूछा ।

अन्त में काज़ी बोला- "यह बात सत्य है कि इमाम से महदी का मिलाप हुआ । इसमें कोई शक नहीं कि हम भी उनसे मिलने की उम्मीद रखते हैं, परन्तु अभी आप इस बात को छिपाए रखो और उनकी पहचान जाहिर मत करो । जब वे स्वयं जाहिर होएंगे, तब हम भी ईमान लेकर उनके कदम पकड़ लेंगे ।"

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