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महामती | Mahaamati

वह स्वरूप जिसके अन्दर बेहद के पांच स्वरूपों ने विराजमान होकर लीला करी, उसे महामति, महामत या महामती कहते हैं । यह शोभा श्री इन्द्रावती की आत्मा को प्राप्त है ।

(श्री राज ने) हाथ पकड़कर मुझे बैठाया और मेरे अंग में अपना आवेश (शक्ति स्वरूप) दे दिया ।1

श्री धनी जी (श्री राज) का जोश, दुल्हन (श्यामा जी) की आत्मा, नूर (अक्षर), हुकम (श्री राज का आवेश) और मूल वतन की बुद्धि (जाग्रत बुद्धि) - इन पांचों के मिलने से मैं महामती बन गई । वेद (हिन्दू ग्रन्थों) और कतेब (इस्लामिक ज्ञान) में वर्णित सरत (कसौटी) पहुंच गई ।2

जब मुझे प्रियतम की पहचान हुई, तब उन्होंने मेरा नाम महामती रखा । मैंने वतन श्री धाम का दर्शन किया और अब (महामती के रूप में) जाहिर हो गई हूं ।3

महामती जी द्वारा जागनी

मुझ पर प्रियतम का आवेश है, जिससे मैं सुहागिनों को एकत्रित करूंगी । सब सुहागिन मिल कर मूल वतन (धाम) का सुख लेंगी ।4

अब मैं साथ को अकेला नहीं छोड़ूंगी और साथ भी मुझे नहीं छोड़ेंगे । साथ मेरी बात (वाणी) का उल्लंघन नहीं करते और जैसा साथ कहते हैं मैं वैसा करती हूं ।5

साथ (के मन) में कालमाया का अंश है, जिससे उनके अन्दर विकार बढ़ गए हैं । सो उसे मैं अपनी शीतल (प्रेममयी) नजरों और तारतम (ज्ञान) रूपी साबुन से गला दूंगी ।6

दया का विस्तार करके उनके विकारों को पूरी तरह निकाल दूंगी । उनके संशय इस प्रकार मिटा दूंगी कि (धनी की राह पर चलने में) उनके शरीर को आलस्य न आए ।7

गुण (सत, रज, तम), पक्ष, अंग (अन्तःकरण), इन्द्रियां (कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियां) उल्टे (माया की तरफ) चलते हैं और सब जोर लगाते हैं । इन सब टेढ़े चलने वालों को सुधारकर सीधी दौड़ में (प्रियतम की तरफ) लगा दूंगी ।8

कोई भला उत्सव रच कर मूल वतन (धाम) के सुख दूंगी । उनके मन वांछित मनोरथ को पूरा करके (आत्मा के) सभी अंगों को सुख दूंगी ।9

माया की इच्छाओं के बढ़ने से मोह बढ़ता है । यही मोह रूपी निद्रा ही सभी विकारों का मूल है । मैं आपके विचारों को ऐसा कर दूंगी कि आपको अपने (आत्मा के) सभी अंगों की सुध हो जाएगी (सभी अंग जाग्रत हो जाएंगे) ।10

जब तक विकार न निकाल दूं, तब तक आप जाग्रत कैसे होंगे ? जाग्रत हुए बिना इस (जागनी) रास के निज सुख किसी के द्वारा नहीं लिए जा सकते ।11

मैं सब सैयों को आवेश का हिस्सा देऊंगी, जिससे उनके मनोरथ पूर्ण हो जाएंगे और सब मिलकर हर्ष से घर (धाम) में जाग्रत होंगी ।12



(1) कलस हिन्दुस्तानी 9/4 (2) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/101 (3) कलस हि. 9/5 (4) कलस हि. 21/13 (5) कलस हि. 21/17 (6) कलस हि. 21/18 (7) कलस हि. 21/19 (8) कलस हि. 21/24 (9) कलस हि. 21/20 (10) कलस हि. 21/21 (11) कलस हि. 21/22 (12) कलस हि. 21/16