छोटी पत्री
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९९
श्री जी साहिब जी और बारह मोमिनों के बीच हुए पत्राचार के बचे हुए अंश यहां लिखे जा रहे हैं ।
श्री जी ने लिखा-
"मैंने जो पाती लिखकर शेख बदल के हाथ भिजवाई थी, अब उन्ही बातों पर पुनः प्रकाश डालता हूं ।
"मैंने सकुमार बाई (औरंगज़ेब की आत्मा) के विषय में विचार किया । उसकी तो साहेबी बहुत बड़ी है । उसकी सम्पत्ति और शक्ति का कोई शुमार नहीं है । कोई भी उसके सामने आध्यात्मिक चर्चा नहीं कर सकता और केवल सन्देश देने से वह हमारी बात समझेगा नहीं । जब तक आमने-सामने बैठकर चित्त बांधकर उसे तारतम ज्ञान की चर्चा न सुनाई जाए, तब तक उसकी आत्मा जाग्रत नहीं हो सकती ।
"जिस प्रकार कर्मकाण्डी ब्राह्मण शूद्र को गायत्री मन्त्र नहीं सुनाते, उसी प्रकार शरीयतपन्थी मुसलमान हिन्दुओं को कुरान की बात नहीं सुनाते और न ही इस विषय में उनकी कोई बात सुनते हैं । ऐसी स्थिति में इन्हें इमाम महदी की पहचान कैसे हो सकती है ?
"जाति और ऊपरी भेष को आप गोविन्द भेड़ा के बन्धन के समान समझना । सभी शास्त्र, वेदान्त और साधुओं की वाणी में इसका खण्डन किया गया है ।"
बारह सुन्दरसाथ ने लिखा-
"जब हमने कुरान में देखा कि इसमें तो रसूल मुहम्मद ने हमारे घर (परमधाम) की ही बातें संकेत में वर्णन की हैं, तो फिर हम जाति और भेष का सिर क्यों न कुचल दें ? फिर हम हिन्दू भेष को त्यागकर मुस्लिम भेष धारण करने पर संकोच क्यों करें ?
"यही सोचकर हम बारह सुन्दरसाथ मुस्लिम भेष में औरंगज़ेब के दरबार में गए और उसे आध्यात्मिक सन्देश दिया । दरबार में सबने हमको धन्य-धन्य कहा । बाद में कुछ लोगों के मन में यह शक पैदा हो गया कि ये लोग हिन्दू होते हुए भी मुसलमान के भेष में क्यों आए और इन्हें किसने भेजा है ? इसी कारण हमें कोतवाल के हवाले कर दिया गया ।
"हमसे गहन पूछताछ के बाद कोतवाल ने सुल्तान को सूचना दी कि ये लोग झूठे या बेईमान नहीं हैं, अपितु खास मोमिन हैं जो खुदा पर ईमान लाए हैं । तब हमारे ऊपर से सिपाहियों का पहरा हटा दिया गया और हमें एक हवेली में ठहराया गया । सुल्तान के मन का संशय चला गया है ।
"अब सुल्तान औरंगज़ेब जिस सनंध से समझेगा, उसे हम उसी सनंध से समझायेंगे । काज़ी शेख इस्लाम से भी हमारी बातचीत हो गई है । सुल्तान ने कोतवाल से हमारा साहित्य मंगवाकर अपने पास जमा करवा लिया है । जब सुल्तान उसे पढ़कर किसी से कहेगा, तब यह बात सब लोगों में जाहिर हो जाएगी ।
"अभी आप कहीं एकान्त में चले जाइए । जब बादशाह हमसे कोई बात जानने की इच्छा जाहिर करेगा, तब हम आपको लिखेंगे । अभी तो हम 'इमाम के लश्कर' के रूप में यहां प्रसिद्ध हो गए हैं ।
"इतने दिन तक हम छिपकर काम करते थे, परन्तु अब तो हम उनके घर में थाना (ज्ञान केन्द्र) बनाकर बैठे हैं । इसलिए हम एक ही लक्ष्य की तरफ ध्यान देंगे और आवश्यकता पड़ने पर आपको दिल्ली का समाचार भेजेंगे ।"
श्री जी ने लिखा-
"जब तक सुन्दरसाथ को चर्चा का रस मिलता है, तब तक उनका मन संशय से मुक्त रहता है । धाम धनी के हुक्म से, मैंने ऐसे दिलासा भरे पत्र और साहित्य अन्य सुन्दरसाथ को भी भेजे हैं । इससे सुन्दरसाथ के मन में विकार या दुःख के विचार नहीं आयेंगे और उनका चित्त परब्रह्म में लगा रहेगा ।
"आप भी निस्संकोच होकर उनको पाती लिखकर भेजिए । आप सब सुन्दरसाथ में शिरोमणि हैं । आपने धर्मयुद्ध में सबसे आगे रहकर दिखाया है और बड़े-बड़े पदाधिकारियों को अपने सामने झुकाया है । इसलिए सब साथ को पूरे घटनाक्रम की जानकारी भेजिए और अक्षरातीत के हुक्म से जागनी के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कीजिए ।
"इसमें कोई शक नहीं है कि आपने अपना सब कुछ प्रियतम के कार्य के लिए न्यौछावर कर दिया है । इसका फल आपको अवश्य मिलेगा । धनी ने आपका हाथ पकड़ रखा है। दज्जाल के घाव आपको मुख और सिर पर लगे हैं । हम लोग दज्जाल से मोमिनों के जिस युद्ध की बात कहते थे, आपने वही युद्ध किया है ।
"परमधाम की ब्रह्मसृष्टियों का जैसा वर्णन बताया गया है, आप वैसे ही हैं । इसलिए अपनी गरिमा के अनुसार ही कार्य करना । अक्षरातीत ने मेरे तन को धारण करके मुझे आपके बीच बैठा रखा है । यदि इस युद्ध में आप ऐसा त्याग और साहस न दिखाते, तो मेरी गरिमा चली जाती । आगे भी आप मर्यादा का पालन करके मेरी लाज रखना ।
"अब आप एक-दूसरे से श्रेष्ठ व्यवहार करना । अपने मन को वश में रखना । आप एक महान कार्य में लगे हैं । जब कोई नया व्यक्ति सुन्दरसाथ में शामिल होने के लिए आएगा, तो सबसे पहले आपकी वाणी और आचरण को देखेगा, इसलिए सदैव गरिमामयी आचरण करना ।
"आप समस्त साथ में शिरोमणि हैं, जाग्रत बुद्धि के स्वामी हैं, और आपके पास तारतम ज्ञान रूपी श्रेष्ठ वस्तु है । अज्ञानी को लिखना पड़ता है, परन्तु आपको मैं बार-बार क्या लिखूं ? कुछ दिन तक हम प्रत्यक्ष भेंट नहीं कर सकते, इसलिए पत्राचार करना पड़ रहा है ।
"मुझे जागनी कार्य के लिए कुछ दिन बाहर जाना पड़ सकता है, इसलिए कुछ शब्द आपको लिख भेजे । ऐसा लगता है कि किसी विशेष कार्य हेतु यह कारण बनाया गया है, नहीं तो इन परिस्थितियों में मैं कहीं न जाता ।
"आप नवतनपुरी, खम्भालिया, पोरबन्दर, मण्डई, ठट्ठानगर, सूरत, खम्भात, अहमदाबाद, भरूच, सिद्धपुर, उदयपुर, मेड़ता के सभी सुन्दरसाथ को पाती लिखते रहना ।
"आप पाती में प्रसन्नता के साथ अपनी उपलब्धि का वर्णन करना । यह लिखना कि हमें रसूल मुहम्मद, ईसा और इमाम के वास्तविक स्वरूप की पहचान हो गई है । सुन्दरसाथ को इस ज्ञान का महत्व दर्शाना । इसके बाद खण्डनी के वचन लिखना । यह सब रोते हुए नहीं लिखना, अपितु तीखे शब्दों में लिखना ।
"यदि कोई आपको वहां दुःख देता है, तो मैं उसका अभिमान नष्ट करके आपको सुख दूंगा । यदि कोई सुन्दरसाथ भी आपको मानसिक कष्ट देता है, तो आप मुझे लिखकर सूचित करना । मैं उस साथ को अपने पास बुलाकर करारा उत्तर दूंगा ।
"आप सभी सुन्दरसाथ को पाती में लिखना कि हम मुस्लिम भेष धारण करके औरंगज़ेब के दरबार में इसलिए आए कि धर्म के सच्चे मार्ग से भटके लोगों को परब्रह्म के मार्ग की तरफ मोड़ सकें । हमने किसी डर से ऐसा नहीं किया । हम मुसलमानों से तो तब डरें, जब श्री देवचन्द्र जी ने किसी मुसलमान को तारतम न दिया हो । हम सभी जानते हैं कि उन्होंने खोजी बाई नामक मुस्लिम महिला के अन्दर रई बाई की आत्मा को पहचाना था ।
"उन्हें लिखना कि आप लोग जिस जाति और भेष को इतना महत्व देते हैं, श्री देवचन्द्र जी ने तो उसका सिर कुचल दिया था । अगर हम हिन्दू भेष में ही रहते तो इमाम महदी और कयामत की बात जाहिर न कर पाते, किन्तु अब मुसलमानों के ७२ फिरकों तक यह सन्देश पहुंच जाएगा ।
"सुन्दरसाथ को लिखना कि हमने श्री राज की आज्ञा से चौदह लोकों में यह बात फैला दी है । इससे समस्त विश्व (सभी पक्षों) के विकार और संशय नष्ट हो जाएंगे ।
"अपनी पाती द्वारा आप सुन्दरसाथ को जागनी की राह पर उठाकर खड़ा कर दो । जहां जैसी जरूरत हो, वहां वैसे ही शब्द लिखना । ऐसी ही पाती लिखकर बिहारी जी, नागजी भाई और अखई भाई को नवतनपुरी में भेजना, देखें वे क्या उत्तर लिखते हैं ।
"धर्म के क्षेत्र में अब आप केशरी सिंह की भांति शक्तिशाली हो । आपने ईमान (श्रद्धा) का कवच धारण कर रखा है । अब आप किसी की खुशामद मत करना, किन्तु सुन्दरसाथ से पत्र व्यवहार निरन्तर बनाए रखना । पत्राचार से उनके मन की बात पता चल जाएगी । जो सुन्दरसाथ जैसा है, उसे वैसे ही शब्द लिखना । आपके शब्दों से उनका मन ऐसे पिघल जाना चाहिए, जैसे अग्नि के आगे मोम पिघल जाती है ।
"दयाराम के भाइयों का कहना है कि जो दयाराम को मार डालेगा उसे वे चार हजार रुपये देंगे, क्योंकि दयाराम के मुसलमान बन जाने से उनका सम्मान नष्ट हो गया है । ये लोग अपने स्वार्थ और लोक-लज्जा के लिए सगे भाई को भी मरवा सकते हैं । गोविन्द भेड़ा (माया लोक) का सम्बन्ध ऐसा ही होता है ।
"आप सुन्दरसाथ में शिरोमणि हो । आशा है कि आप मेरी बातों को भूलेंगे नहीं और उन्हें आचरण में अवश्य लाएंगे । आपको सुन्दरसाथ में सिरदार मानकर मैंने खुले दिल से सब बातें कही हैं ।
"आपने कर्मकाण्ड व लोक-मर्यादा के बन्धन को तोड़ दिया और शरीयतपन्थियों के बीच बैठकर उनका मोर्चा ढहाया है । अभी आप इन लोगों के बीच ही रहो क्योंकि यदि इस समय आप यहां से चले गए तो आपकी बदनामी होगी, नहीं तो बाद में कहोगे कि मैंने सावधान नहीं किया था । जब उचित समय आएगा, तब मैं आप लोगों को अपने पास बुला लूंगा, या मेरी आवश्यकता हो तो मुझे बुला लेना ।
"एक-दूसरे से परमधाम का सम्बन्ध मानकर, आपस में विचार-विमर्श करके ही कोई कार्य करना । मुझे विश्वास है कि आप प्रसन्नतापूर्वक जागनी के लिए कमर कसोगे । अपने मन को दृढ़ करके इस उत्तरदायित्व को निभाइए ।
"मैं आपकी पाती पर विचार करूंगा । जब आप मेरी पाती का उत्तर लिखेंगे (स्वीकृति देंगे), तब मैं जागनी के लिए बाहर निकलूंगा ।
"श्री राज की प्रेरणा से मुझे दो दिन के लिए बाहर जाना पड़ सकता है । आप उदयपुर में भीम भाई को पाती लिखकर उनका समाचार पूछ लेना । वे अभी तक नहीं समझे, उनका मैं क्या करूं ? पाती से भी वे क्या समझेंगे, वे माया की गहरी नींद में हैं ।
"यह माया श्री राज के हुक्म से बनी है, तो उसे उनकी कृपा के बिना कोई कैसे हरा सकता है ? इसलिए यह संसार हांसी का ठौर है । यहां श्री राज के हुक्म के बिना कोई जाग्रत नहीं हो सकता । इस संसार रूपी मोहजल में तरह-तरह की नई-नई तरंगें (विकार, इच्छाएं) उठती रहती हैं । कोई ब्रह्मसृष्टि ही इसमें सावचेत रह पाती है ।
"आपने इस समय मेरे लिए इस कठिन कार्य को मोल लिया है, इसलिए आपकी आत्मा से मेरी आत्मा जुदा नहीं हो सकती । आप विश्वास करिए कि आपके सिर पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, जिसे आपको जरूर संभालना है ।
"यहां की सारी बातें आपको शेख बदल बता देंगे । जब शेख बदल आपकी पाती लेकर आए, तो मुझे बहुत सुख हुआ । जब हम मिलेंगे, तब हंसकर वियोग के दुःख को मिटा लेंगे । आपके कार्य से मैं बहुत प्रसन्न हूं । आप सभी सुख में रहें । जागनी के दिन निकट आ गए हैं । हे लालबाई ! आप धन्य हैं ।
"आप सभी शूरधीर हैं । आपने कदम बढ़ाकर महान कार्य किया है । अब शेख बदल के पहुंचने पर आपकी आत्मा को सुख मिलेगा । अपने आनन्द-मंगल का समाचार पाती में लिखकर भेजते रहना । सब सुन्दरसाथ सहित लालबाई को मेरी आत्मा का प्रणाम ।"
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