हांसी | Haansi
हांसी का अर्थ है उपहास करना ।
हंसी की भूमिका
यहां पर उस प्रसंग का वर्णन है, जब अक्षरातीत ने अपनी सखियों के साथ हांसी की ।
तब हमने जाकर पिया (प्रियतम) से कहा कि हम अक्षर का खेल देखना चाहती हैं । जब यह बात पिया ने सुनी, तब अत्यधिक हांसी (उपहास) करने के उद्देश्य से मना किया ।1
हंसी का कारण
तुम डोरी (अस्तित्व) के बिना (मोह का) जाल बना रहे हो और अपने ही अंग (मन) को बांध रहे हो । अंग (परात्म) के बिना यहां तड़प रहे हो । इस खेल के ऐसे रंग हैं ।5
आपने स्वयं ही अपने को इस अंधकारमय कोहेड़े (अज्ञान) में बांध रखा है । ऐसा लगता है जैसे आपको इस जहर (माया) का नशा चढ़ गया है और आप उसके फेर (मोह) में भटक रहे हो ।6
कैसे समझा जाए कि अमल (नशा) चढ़ा है ? जब कोई फिसलती या गिरती है (जब कोई प्रियतम के प्रति विश्वास खो देती है) । इनमें से कोई जाग कर हाथ से पकड़ कर (प्रेम की) सीढ़ी चढ़ती है ।7
एक सीढ़ी (प्रेम) के अभाव में गिर जाती है । दूसरी उसका हाथ पकड़ कर उसे उठाने (जगाने) जाती है । सो दोनों लड़खड़ाकर गिर जाती हैं । इस प्रकार दोनों पर हांसी होती है ।8
एक को जमीन पर गिरा देखकर (माया में फंसा देखकर), दूसरी उसे उठाने (जगाने) जाती है । वह भी उलटकर गिर पड़ती है । यह खेल इस भांति का है ।9
जो (इन वचनों को) सुन कर (प्रियतम को पाने के लिए) दौड़ी नहीं, तो उन पर हंसी होगी । जिन में जैसा इश्क है, सो अब जाहिर हो जाएगा ।2
यदि किसी ने गफलत (असावधानी) करी और अपना दिल देकर जागी नहीं, सो यहां लोक (जागनी लीला) एवं अलोक (साक्षात्कार, प्रेम व आनन्द) का कुछ भी लाभ नहीं ले सकेगी । (वह सखी) लाभ तो नहीं ले सकेगी, परन्तु (धाम में) सबके सामने उसकी हंसी होगी । हे सुहागन ! अब यह हंसी तो कोई मत कराओ ।3
हांसी का प्रकरण में इस विषय का विस्तृत वर्णन किया गया है ।
हंसी का दुःख
सैयन (सखियों) को इस हंसी का भी दुःख न उपजे । यदि यह दुःख (धाम के) सुखों के बीच में याद आ जाए, तो यह दुःख भी सुहागन के लिए बुरा (लज्जाजनक) होगा । यह (हंसी का) दुःख तो निश्चित रूप से बुरा है और मेरी सैयों से सहा नहीं जाएगा ।4
(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/19 (2) कलस हिन्दुस्तानी 11/26 (3) कलस हि. 11/28,29 (4) कलस हि. 11/30,31 (5) कलस हि. 22/4 (6) कलस हि. 22/5 (7) कलस हि. 22/6 (8) कलस हि. 22/7 (9) कलस हि. 22/8
