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जागनी लीला | Jagni Leela

ब्रज और रास दोनों लीला में तामसियों ने दुःख नहीं देखा । प्रियतम के प्रेम से विमुख नहीं हुईं, तो ये दुःख कैसे देख सकती थीं ।1

हमारे मन में कुछ इच्छा (खेल देखने की) रह गई थी, सो प्रियतम जरा भी रहने नहीं देते । इसी कारण हुक्म से चौदह लोक का यह स्वप्न (का ब्रह्माण्ड) बना ।2

यह जो काल माया का इण्ड उपजा है, इसे सब वही (पुराना) ब्रह्माण्ड समझते हैं । यह तीसरा इण्ड जो अब नया बना है, सब अक्षर की सुरत का है ।3

सबसे पहले अक्षर की सुरताओं द्वारा प्रतिबिम्ब लीला हुई । उसके पश्चात् भगवान विष्णु द्वारा श्री कृष्ण के रूप में अवतारी लीला हुई जिसने गीता का ज्ञान दिया । इसके पश्चात् कलियुग में ब्रह्मसृष्टियों की जागनी लीला प्रारम्भ हुई, जिसका संक्षिप्त वर्णन प्रकट वाणी में कुछ इस प्रकार है-4

अब धाम की जो मूल सखियां (ब्रह्मसृष्टियां) हैं, उन्होंने पुनः आकर यहां देह धारण करी ।

रास खेलते समय वहां इच्छा (अधूरी) रह गई थी, इसलिए सभी ब्रह्मसृष्टियां यहां आई हैं । इनमें सार रूप से श्यामा जी की सुरत (आत्मा) मतू मेहता के घर अवतार लेकर आई ।

इनकी माता का नाम कुंवरबाई था और ग्राम उमरकोट में उत्तम कायस्थ कुल में इनका जन्म हुआ । (बाद में) श्री देवचन्द्र जी नवतनपुरी (जामनगर) आए । इन्होंने सबको सुख देने के लिए देह धारण करी ।

इन्होंने यहां आकर मूल सम्बन्ध के प्रियतम से संयोग (मिलन) करने के लिए बहुत खोज करी । इनके मूल अंग (आत्मा) में यह दृष्टि (विवेक) उपजी । इन्होंने अनेक कष्ट झेलते हुए शास्त्रों के ज्ञान में खोज की ।

(श्री देवचन्द्र जी ने) चौदह वर्ष तक निष्ठाबद्ध होकर सब वचनों (ज्ञान) को पूर्ण रूप से ग्रहण किया । इन्होंने अनेक जप, तप, व्रत और नियम का पालन करते हुए अति प्रेम से प्रियतम के स्वरूप की सेवा की ।

इन्होंने अपने मन को कई तरह की कसनी (साधनाओं) से कसा तथा प्रेम व सेवा को भंग नहीं होने दिया । दुल्हन (श्यामा जी) ने हम सब सखियों के कारण कई कसौटी करी ।

(श्री देवचन्द्र जी ने) प्रियतम को बहुत प्रसन्न किया और उन्होंने तीन बार दर्शन दिए । धाम धनी ने स्वयं इन्हें तारतम (ज्ञान) और धाम की बात कही और सब सुध दी ।

प्रियतम (श्री राज) ने इनका नाम सुन्दर बाई रखा और अपने घर (धाम) का भी दर्शन कराया । प्रियतम ने यहां इनके ऊपर अति दया करी और स्वयं इनके अन्दर आकर बैठ गए ।

धनी ने अपना जोश इन्हें दिया और पूरा दरबार इनके लिए खोल दिया । इन्हें शून्य (निराकार) के पार के पार का दर्शन कराया । ब्रह्मसृष्टियों में सुन्दरबाई ऐसी हैं, जिन्हें धनी ने बढ़ाई (शोभा) दी है ।

(श्यामा जी) सब सखियों में सिरदार (प्रमुख) हैं और हम सब नारी (सखियां) इनके अंग हैं । यह श्री धाम धनी जी की अर्धांगिनी हैं और दोनों मिलकर एक स्वरूप एक अंग हैं ।

श्री धाम की लीला, अखण्ड वैकुण्ठ (अक्षर धाम), ब्रज-रास की लीला के दोनों ब्रह्माण्ड, यह सब (श्री देवचन्द्र के) हृदय में चढ़ आए और इनकी आत्मा में निरन्तर इसका अनुभव होने लगा ।

अब यह कितने प्रकार से कहूं । निजधाम की लीला में नित्य बड़ा विहार होता है । अक्षरातीत किशोर (प्रेम) लीला करते हैं, जिसका बहुत अधिक सुख सखियां लेती हैं ।

धाम की लीला का बहुत विस्तार है । वहां महलों और मन्दिरों (कमरों) का अन्त नहीं है । इस घर (के निवासी) के अतिरिक्त आज तक इस लीला का किसी को ज्ञान नहीं था ।

इस बारे में ब्रह्मसृष्टि के बिना कोई नहीं जानता और यह सृष्टि ब्रह्म से कभी अलग नहीं होती । यह निधि (ज्ञान) ब्रह्मसृष्टि यहां लाई हैं, नहीं तो यह लीला दुनिया में किसे पता थी ।

धनी (श्री देवचन्द्र) यह वाणी (अखण्ड की बातें) मुख से कहते थे, परन्तु यह दुनिया (जीव सृष्टि) उसे कैसे ले सकती थी । इस अवसर पर गांगजी भाई मिले और उन्होंने इन वचनों को चित्त में धारण किया ।

इन (गांगजी भाई) ने भली-भांति इसके अर्थ को लिया और विचार करके कुछ बातें पूछी । जब (श्री देवचन्द्र जी ने) पार की बात समझाई, तब इन्हें (श्री देवचन्द्र के हृदय में विराजमान) धनी की पहचान हो गई ।

इन्होंने (श्री देवचन्द्र को) अपने घर बुला लिया और बहुत चित्त लगाकर सेवा करी । इन्होंने अपने धाम धनी को पहचान कर बहुत प्रेम से उनकी सेवा करी ।

तब प्राणनाथ (श्री देवचन्द्र) ने अपने श्री मुख से कहा कि हमें अपने साथ को ढूंढकर निकालना है । ब्रह्मसृष्टि माया में आई है, इसलिए हम उन्हें बुलाने आए हैं ।

हम ब्रह्मसृष्टि को घर (धाम) ले जाने के काम से ही आए हैं । तब गांगजी भाई के मन में अचरज हुआ कि पार के वचन को कौन मानेगा ?

(गांगजी भाई ने) कहा कि ब्रह्मसृष्टि कैसे मिलेगी और तुम्हारी चाल (रहनी) पर कैसे चलेगी ? मोह (माया) के जल का प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली और इतना तेज है कि अंगुली के नाखून को तोड़कर साथ ले जाए ।

इसकी बड़ी तरंगें मेरु (पर्वत) के समान हैं । इसमें कोई खड़ा (धर्म पर टिका) नहीं रह सकता । यह (माया) घेरकर (तृष्णा रूपी) लहरों पर लहरें मारती है, फिर बीच भंवर (आवागमन के चक्र) में फंसा देती है ।

इस (मोह जल) में आड़े-टेढ़े बहाव हैं । इसके अन्दर भयानक जीव (काम, क्रोध, लालच, मोह, अहंकार, ईर्ष्या) हैं । निश्चित् रूप से यह दुःख रूपी सागर है, जिसमें आसपास कोई किनारा या टापू (ज्ञान का सहारा) नहीं है ।

यह (मोह जल) चारों तरफ ऊंचा, नीचा और गहरा है । अब इतना कठिन समय आ गया है कि हाथ, पैर या सिर भी नहीं सूझता (सत्य-असत्य का बोध नहीं होता) । इस अन्धकार (अज्ञान) से निकला नहीं जाता ।

(ब्रह्मसृष्टियों पर) माया का तीव्र नशा चढ़ा है । छलमयी संसार में वे अपने आप (असल स्वरूप) को भूल गई हैं । न तो उन्हें प्रियतम (श्री राज) की सुध है और न ही उनके पास मूल (धाम) की बुद्धि है । इस मोहजल का ऐसा बल है ।

बेहद (योगमाया) के पार (अक्षर) के पार (अक्षरातीत) के वचनों को हद (क्षर) का संसार कैसे मानेगा ? इस संसार के शास्त्र तो कहते हैं कि त्रैगुण (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) और महाविष्णु भी मोह और अहंकार से बने हैं ।

ब्रह्मसृष्टियों ने भी मोह के शरीर धारण कर रखे हैं, तो वे किस प्रकार यहां आएंगी ? तब श्री धनी जी (देवचन्द्र जी) ने यह वचन कहे कि उन्हें बाहरी दृष्टि से दिखेगा (दर्शन होंगे) ।

उनके लिए अति जोरदार व्यवस्था (तारतम ज्ञान की चर्चा) है, जो रात्रि (अज्ञान) को मिटाकर प्रातः कर देगी । यदि वे इस लीला को चित्त में धारण न कर सके, तो दर्शन के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रमाण मिलेगा ।

साथ के लिए प्रियतम (श्री राज) आएंगे, घर-घर में बहुत सारी वस्तुएं देंगे, और साथ के बीच में यहां भोजन करेंगे । वे तरह-तरह के सुख उपजाएंगे ।

प्रियतम का आंचल पकड़कर साथ एक-दूसरे को दर्शन करवाएंगी और प्रेम सिखाएंगी । इस लीला का विस्तार बढ़ेगा और साथ के हृदय में बहुत प्रसन्नता होगी ।

तब वाणी (चर्चा) पर विचार करेगी और उन्हें सब अर्थ स्पष्ट होंगे । तब ब्रह्मसृष्टि आएगी और अपनी दृष्टि से जाहिरी निशान देखेगी (दर्शन करेगी) ।

यह व्यवस्था उत्तम है, परन्तु धाम की निधि तो तारतम कही गई है जिससे (प्रियतम की) पहचान होती है और (धाम के) सब निशान (पक्ष) दिखाई देते हैं ।

तब (उत्तर सुनकर) गांगजी भाई का मन हर्ष से भर गया । उन्होंने अनेक तरह से परिश्रम करके बहुत प्रेम से सेवा करी । (श्री देवचन्द्र के रूप में) अपने धाम धनी को पहचान कर वे गलित (समर्पित) हो गए ।

(गांगजी भाई ने) साथ से भी अपार प्रेम किया और अपने अवतार (आगमन) को सफल बना लिया । (अब इन्द्रावती जी कहती हैं) मैं सदा श्री सुन्दर बाई के चरणों में रहूं । इनकी कृपा को मुख से कैसे कहूं ।

धाम में एक ब्रह्मसृष्टि है, उसका नाम इन्द्रावती है । (वे कहती हैं) प्रियतम ने मुझ पर प्रसन्न होकर धाम के मूल वचन (श्री कुलजम सरूप) मुझे सौंप दिए ।

आदि से लेकर आज तक द्वार (धाम के रहस्य) कभी नहीं खुले । हमारे बिना ऐसा कोई नहीं हुआ जो उसे खोल सके । सो (प्रियतम ने) मेरे हाथ में कुञ्जी (तारतम ज्ञान) दी है और (कहते हैं) तू अपने साथ के कारण इसे खोल दे ।

हम सबका ताप (दुःख) मिटाने के लिए (प्रियतम ने) मुझे अपने समान बना दिया । मेरी आत्मा को जाग्रत बुद्धि मिल गई और मुझे सपने से जगाकर सुध (पहचान) दे दी ।

श्री धनी जी (श्री राज) का जोश, दुल्हन (श्यामा जी) की आत्मा, नूर (अक्षर), हुकम (श्री राज का आवेश) और मूल वतन की बुद्धि (जाग्रत बुद्धि) - इन पांचों के मिलने से मैं महामति बन गई । वेद (हिन्दू ग्रन्थों) और कतेब (इस्लामिक ज्ञान) में वर्णित समय आ गया है ।

कुरआन या पुराण, यह दोनों प्रमाण ग्रन्थ हैं । इनके गुह्य अर्थ हमारे पास हैं, जो अन्दर बैठकर प्राणनाथ (श्री राज) खोल रहे हैं ।

आपने (देवचन्द्र जी के अन्दर बैठकर) स्वयं दरबार नहीं खोले, सो मुझ से खुलवाकर (श्री कुलजम सरूप के रूप में) विस्तार किया । मुझे तारतम रूपी पतवार दे दी, सो निश्चित रूप से (मेरी नाव) कहीं नहीं अटकेगी ।

सब संशयों का निवारण कर दिया । अब निराकार से परे (धाम) के विषय में कोई संशय नहीं रहा । (श्री राज के) हुकम का पालन करते हुए (तारतम ज्ञान को) प्रकाशित करूंगी तथा ब्रह्मसृष्टि और दुनिया को जगाऊंगी ।

अभी तौबा का द्वार खुला है (एक परब्रह्म को न मानने के लिए प्रायश्चित करने का अवसर है) । बाद में तो सारी दुनिया एकत्रित हो जाएगी । जब तौबा का द्वार बन्द हो जाएगा, तब रात्रि (स्वप्नमयी संसार) समाप्त होकर भोर (योगमाया में न्याय की लीला प्रारम्भ) हो जाएगी ।

जिसने जैसे कर्म किए हैं, भले या बुरे, तब सबकी करनी सामने आ जाएगी ।

तब कोई किसी की सहायता नहीं कर सकेगा । सबको अपने दुःख-सुख (कर्मफल) को स्वयं भुगतना होगा । अब ब्रह्मसृष्टियों को एकत्रित करती हूं । साक्षात् अखण्ड सूर्य (अक्षरातीत) का उदय (प्रकटन) हुआ है ।

उनका दीदार करने के लिए विश्व एकत्रित होगा और संसार में कोई पीछे नहीं रहेगा । ब्रह्मसृष्टि को प्रियतम के संग जो सुख मिला है, उसको मुख से कहा नहीं जा सकता ।

ब्रह्मसृष्टि का ऐसा नूर (महिमा) है कि जो दुनिया अंकूर (बेहद में मूल तन) के बिना थी, उनके लिए नए अंकूर बनाकर उन्हें अपनी कृपादृष्टि से अखण्ड मुक्ति दे देंगी ।

श्री धनी जी (श्री प्राणनाथ) का दीदार करके सारी दुनिया एक (मत) हो जाएगी । कोई किसी को कुछ नहीं कहेगा और किसी के मन में क्रोध या विरोध नहीं रहेगा ।

श्री धनी जी (श्री प्राणनाथ) का ऐसा यश है कि दुनिया अपने आप एकरस हो जाएगी । उनके ज्ञानमय स्वरूप का ऐसा तेज है कि किसी के मन में कोई भी संशय नहीं रहेगा ।

सब जातियां एक स्थान पर (योगमाया में) एकत्रित होंगी । कोई नहीं कहेगा कि उसका परमात्मा अलग है । प्रियतम के विरह से निर्मल होने के पश्चात् सबको अखण्ड सुख (मुक्ति) दिए जायेंगे ।

अतीत में कई इण्ड उपजे हैं और आगे भी कई ब्रह्माण्ड होएंगे । यह ब्रह्मलीला जो यहां (इस ब्रह्माण्ड में) हुई, ऐसी न कभी हुई, न कहीं होगी ।

यह जो तीन ब्रह्माण्ड अब हुए हैं, ऐसे न पहले हुए, न कभी होंगे । इन तीनों में ब्रह्मलीला हुई, जिसे ब्रज, रास और जागनी लीला कहते हैं ।

जैसे नींद (अज्ञान) में सपना देखा जाता है, उसी प्रकार ब्रज का सुख सखियों ने लिया । योगमाया (रास) का जो सपना है, उसे आधी नींद (अल्प ज्ञान) में देखा ।

कुछ नींद कुछ जाग्रति में (सखियों ने) रास का सुख लिया । जागनी (लीला) का सुख जाग्रत अवस्था (पूर्ण ज्ञान) का है । इस लीला के सुख को मुख से कैसे कहूं ।

जागनी में धाम की लीला (का ज्ञान) प्रकट हुई और (ब्रह्मसृष्टियों ने) वहां के निशान (पक्षों) को हृदय में धारण कर लिया । तब नित्य विहार की लीला को नजरों में बसाकर सबको आनन्द और सन्तोष उत्पन्न हुआ ।

(जागनी लीला में ऐसा अनुभव हुआ जैसे) यहीं बैठे अपने धाम में जाग्रत हो गए और सभी मनोरथ व कामनाएं पूर्ण हो गए । (जब) प्रियतम (धाम में) हंसते हुए ताली बजाएंगे (तब खेल समाप्त होगा) और सब साथ (परात्म) हंसते व सुख लेते हुए उठेंगे ।

इस खेल में भगवान जी (अक्षर ब्रह्म) भी आए, जो जाग्रत होने के लिए तत्पर हैं । जब हम अपने घर (धाम) जाएंगे, तो हम सब (अक्षर ब्रह्म और ब्रह्मसृष्टियां) एक साथ (अपनी-अपनी परात्म में) उठेंगे ।5

जो खेल हमने देखा है, वह निश्चित् रूप से (योगमाया में) स्थिर हो जाएगा । यह (जागनी का ब्रह्माण्ड) अन्य सभी में शिरोमणि है, इसलिए यह (पूरा) संसार अखण्ड होगा ।6

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(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/50 (2) प्रकास हि. 37/51 (3) प्रकास हि. 37/52 (4) प्रकास हि. 37/64,66-118 (5) कलस हिन्दुस्तानी 20/34 (6) कलस हि. 20/33