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रास लीला | Raas Leela

ब्रज में 11 वर्ष और 52 दिन के बाद वे (अक्षरातीत) वृन्दावन (योग माया) पहुंच गए ।1

वहां जाकर उन्होंने बांसुरी बजाई और सभी सखियों को बुला लिया । तामसियां और राजसियां चल पड़ीं, जबकि स्वांतसियां शरीर छोड़कर उनसे मिल गईं ।2

बांसुरी सुनकर कुमारका सखियां भी चल पड़ीं और भवसागर के पार उतरीं । इनकी सुरत (आत्मा) सभी सखियों में मिल गई । रास में इनका अलग स्वरूप नहीं था ।3

योगमाया के स्वरूप में कुछ नींद (अज्ञानता) और कुछ जाग्रति थी । योगमाया में जो रास खेली, उससे मन को आनन्द और उल्लास मिला ।4

योगमाया में प्रियतम के जोश के साथ जो खेल खेले, उससे आवेश बढ़ा और दुःख-सुख की लेश मात्र भी सुध नहीं रही ।5

फिर मूल स्वरूप (श्री राज) ने वहां देखा कि यह दोनों (अक्षर और ब्रह्मसृष्टियां) तो खेलने में मग्न हो गए हैं । जब उन्होंने जोश खींच लिया, तब अक्षर का चित्त चौंक गया ।6

यह कौन सा वन है, यह सखियां कौन हैं, मैं कौन हूं ? इस प्रकार चौंक कर (अक्षर की) आत्मा चली गई । रास लीला उनकी जाग्रत बुद्धि में समा गई और उनके हृदय में (प्रेम लीला की) सुध चुभ गई ।7

रास के खेल में अनेक रंग और सुखों का अनुभव हुआ, जो (अक्षर के) हृदय में समा गए । इस प्रकार योगमाया के ब्रह्माण्ड में रास लीला और सभी चर-अचर अखण्ड हो गए ।8

रास लीला

तब यहां (कृष्ण का शरीर) अन्तर्धान हो गया और सब सखियां मृतक समान हो गयीं । प्रियतम से प्रेम-विलास की लीला करने की आशा बंधी होने के कारण उनका जीव नहीं निकला ।9

सखियों ने अति विरह किया । प्रियतम ने अपना आवेश दे दिया और (अक्षर की) सुरत फिर से आ गई । तब सखियों को आनन्द उपजा और सम्पूर्ण विरह का नाश हुआ ।10

वही स्वरूप नया श्रृंगार करके आया । भजनानन्द (अक्षर) ने अपार सुख लिए । दोनों आत्माएं (अक्षर और श्यामा जी व सखियां) प्रेम से खेले और (श्री राज के) जोश ने अनेक भांति के सुख दिए ।11

रात में विरह-विलास की अनेक लीलाएं हुईं और प्रातः तक सबके हृदय आनन्दित हो गए । रास खेल कर सब (धाम) चले गए । सभी साथ का मन अत्यधिक स्नेह से भरा था ।12

योगमाया (रास) का जो सपना है, उसे आधी नींद (अल्प ज्ञान) में देखा । कुछ नींद कुछ जाग्रति में (सखियों ने) रास का सुख लिया ।13

उस स्थान पर (योगमाया में) रास लीला करके हम सब मिलकर घर (धाम) आ गए । इस ब्रह्माण्ड का अन्त करके, फिर उसे अक्षर ब्रह्म के दिल (सबलिक) में अखण्ड कर दिया ।14

ब्रज और रास दोनों ब्रह्माण्ड में हुई ब्रह्म लीला अखण्ड हो गयी । अक्षर के चित्त (सबलिक) में ऐसा हुआ तो उसका नाम सदाशिव कहा गया ।15

रास लीला में अन्तर्धान का रहस्य

जब अक्षरातीत और उनकी आत्माओं का हृदय एक है, सबमें समान प्रेम है और वे सदैव साथ रहते हैं, तो रास लीला में उनके बीच में अन्तर (वियोग) क्यों हुआ ? इस बात में एक आंकड़ी (रहस्य) है, जिसे तारतम ज्ञान के बिना समझा नहीं जा सकता ।16

(रास में ब्रह्मसृष्टियां प्रेम लीला में मग्न थीं) जब अक्षरातीत श्री राज ने उन्हें जगाने के लिए अपना आवेश खींचा, तब उनका (श्री कृष्ण का) शरीर अन्तर्धान हो गया । (ऐसा करने का उद्देश्य) सखियों को विरह दिखाकर उनके चित्त को विलास से सावधान करना था तथा उन्हें घर श्री धाम की याद दिलानी थी ।17

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