कुरान का अनुवाद
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०८
मन्दसौर में इब्राहिम श्री जी का दर्शन करने आया । श्री जी की संगति में उसे इतना अच्छा लगा कि वह दोबारा मिलने आया । बातों-बातों में लालदास जी ने उससे कुरान के एक किस्से का हिन्दी अनुवाद करने का निवेदन किया । तब इब्राहिम ने कुरान की एक सूरत का अनुवाद कर दिया ।
उसकी आयतों को सुनकर श्री जी को बहुत सुख हुआ और वे लालदास से बोले- "इसमें तो सब हमारी बात है । अगर इब्राहिम अन्य सूरतों का भी अनुवाद कर देता है, तो बड़ा काम हो सकता है ।"
जब लालदास जी ने इब्राहिम को धन का कुछ लोभ दिखाया, तो वह कुरान का अनुवाद करने के लिए तैयार हो गया । अगली प्रातः सोलहवें पारे के अनुवाद से कार्य प्रारम्भ हुआ । जब उसके दो प्रकरणों का अनुवाद श्री जी को प्राप्त हुआ, तो उनके मन में अन्य प्रकरणों का विवरण जानने की इच्छा हुई । जब एक मंजिल पूरी हो गई, तब उसमें अपनी बीतक (ब्रज, रास और जागनी लीला का वर्णन) पढ़कर श्री जी का मन बहुत प्रसन्न हुआ ।
रात्रि में बंगले के एक स्थान पर बैठकर लालदास जी इब्राहिम से कुरान का अनुवाद करवा रहे थे और श्री जी पास में लेटे-लेटे सुन रहे थे । तभी एक आयत को पढ़कर इब्राहिम बोला- "यह तो किसी पथभ्रष्ट ने कलम चला दी है ।"
तब श्री जी ने कहा- "उसे फिर से पढ़कर सुनाओ ।"
इब्राहिम बोला- "इसमें लिखा है कि मुहम्मद की उम्मत में जो सुन्नी मुसलमान हैं, उनकी अर्जी अल्लाह के कानों तक नहीं पहुंचती ।"
श्री जी ने निर्देश दिया- "यह मोमिनों (ब्रह्मसृष्टियों) की महिमा का विषय है, जिनके समान कोई सांसारिक व्यक्ति नहीं हो सकता । तुम इसके शब्दों में हेर-फेर मत करो । जैसा लिखा है, वैसा ही अर्थ करो । लिखने वाले का गूढ़ भाव क्या है, यह हम-तुम नहीं समझ सकते ।"
इसके बाद पास के एक चबूतरे पर बैठकर श्री जी कुरान का अनुवाद पढ़ने लगे । उसे पढ़कर वे बहुत खुश हुए, जैसे मन की सब इच्छाएं और कार्य पूर्ण हो गए हों ।
श्री जी ने लालदास से कहा- "अब अपनी बात के प्रमाण सभी पन्थों में मिल गए हैं, सुन्दरसाथ को कुछ परिश्रम नहीं करना पड़ेगा । अब आप सब सुन्दरसाथ को पत्र लिखकर खुशखबरी दे दो कि श्री राज की मेहेर से कुरान में हमारी बातें मिल गई हैं ।"
लालदास जी और इब्राहिम संध्या में कुरान का अनुवाद लिखने बैठते थे, तो सूर्योदय तक लिखते रहते थे । तब इब्राहिम अपने घर जाता था और लालदास जी दातुन आदि नित्य क्रियाओं में लग जाते थे ।
ऐसा करते-करते कुरान के १६, १७, १८ और १९ पारों का अनुवाद हो गया । श्री जी उनके गूढ़ अर्थ पर विचार करने लगे । इसके बाद ३०वें पारे की ३६वीं सूरत का अनुवाद हुआ । फिर पारा १, २, ३ और ४ का अनुवाद हुआ ।
जब पांचवा पारा शुरु हुआ, तब इब्राहिम के दिल में दज्जाल (दुर्भावना) आकर बैठ गया । उसने सोचा कि जब तक इन हिन्दुओं से वह सारा अनुवाद छीन नहीं लेता, तब तक उसे चैन नहीं पड़ेगा । अब वह खटपट करने लगा । मोमिनों का गरीब (सहज) स्वभाव देखकर वह शरीयत का डर दिखाने लगा कि गैर-मुस्लिमों को कुरान रखने का हक नहीं है ।
इब्राहिम ने लालदास जी से अपना किया हुआ अनुवाद मांगा ताकि उसे अपने घर ले जा सके, परन्तु लालदास जी उसकी नीयत समझ गए । श्री जी ने कुरान का अनुवाद देने से मना कर दिया । तब इब्राहिम ने कटु वचन बोलते हुए उपद्रव करने की धमकी दी । उसकी बात सुनकर मोमिनों का मन दुःखी हो गया । मोमिन सोचने लगे कि उसे श्री जी की पहचान नहीं है, परन्तु अब उससे कैसे निपटा जाए ?
जब मुहब्बत खान पठान को पता चला कि किसी ने श्री जी को दुःख पहुंचाया है, तो वह दौड़कर उनके चरणों में आया । उसने अपनी आत्मा को श्री जी के चरणों में अर्पित कर दिया था । जब उसे पूरी बात पता चली, तो वह क्रोध में बोला- "मैं मन्दसौर के बीच में इब्राहिम का सिर कुचल दूंगा ।"
यहां से उठकर पठान एक डण्डा लेकर इब्राहिम के घर गया और गाली देते हुए उसकी पत्नी से इब्राहिम के बारे में पूछा । उसकी पत्नी ने बताया कि वह निकाह (विवाह) सुनाने गया है । तब पठान विवाह स्थल पर पहुंच गया और शोर मचाते हुए चिल्लाने लगा ।
इब्राहिम बाहर आकर बोला- "मैं तो आपका गुलाम हूं । जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूंगा ।"
तब पठान ने कठोर स्वर में पूछा- "तूने मेरे हादी को दुःख क्यों दिया ? ऐसा झूठा व्यवहार तुझसे ही हो सकता है । पहले तो तू मेरे आगे कहता था कि वे तेरे मुरब्बी (पूज्य) हैं और तू उनका गुलाम है । अब तेरी नीयत कैसे पलट गई ? रसूल की कसम, मैं तुझे अभी मार डालूंगा ।"
तब इब्राहिम ने गीदड़ की तरह पठान के चरण पकड़ लिए ।
पठान ने कहा- "जाकर मोमिनों के कदम पकड़ और उनको खुश कर । अगर उनका दिल खुश नहीं हुआ, तो मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा ।"
अगली प्रातः उठकर इब्राहिम वहां आया और श्री जी के चरणों में सिर रख दिया । वह अपना सिर उठाने को तैयार ही नहीं था ।
तब नूर मुहम्मद बोला- "उठ खड़ा हो मुरदार । मेरा बस चले तो अभी तेरे पेट में कटारी मारकर तेरा काम पूरा कर दूं, परन्तु हादी का हुक्म नहीं है, नहीं तो इतनी बेअदबी (बुरा व्यवहार) करने के बाद तू यहां से जिन्दा नहीं जाता ।"
इब्राहिम ने श्री जी से कहा- "मैं आपका गुलाम हूं । मुझसे भूल हो गई । अब आप माफ कर दीजिए । मैंने आपके कदमों को पकड़ लिया है, जिसे कभी नहीं छोड़ूंगा ।"
फिर उसने सब मोमिनों के चरण पकड़कर क्षमा मांगी, तब उसे क्षमा कर दिया । उसके बाद इब्राहिम के भाई ने पारा ५ का अनुवाद करवाया । इस समय दज्जाल ने ऐसा शोर मचाया कि औरंगज़ेब के सैनिक सुन्दरसाथ के पीछे पड़ गए ।
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