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शुक्राना

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११८

आकोट में श्री जी साहिब जी के साथ रहने वाले सुन्दरसाथ जागनी लीला के कष्टों से विचलित होने लगे । उन्हें दिलासा देने के लिए यहां समझाया गया है कि किस प्रकार अक्षरातीत श्री राज पल-पल सुन्दरसाथ पर कृपा करते रहे हैं ।

इस संसार में आज तक अनेक लोग वेद-कतेब के आधार पर परब्रह्म को खोजते रहे, परन्तु कोई अक्षर के मूल स्थान को नहीं खोज सका । ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी असफल हो गए ।

आज तक किसी को अक्षर और अक्षरातीत की पहचान नहीं थी, परन्तु धाम धनी ने सुन्दरसाथ को सब कुछ बता दिया और उनका ईमान दृढ़ कर दिया ।

अक्षर को जाग्रत अवस्था में भी अक्षरातीत के परमधाम में होने वाली लीला की जानकारी नहीं है । अक्षरातीत ने कृपा करके सुन्दरसाथ को, जाग्रत बुद्धि और तारतम ज्ञान के माध्यम से, इस नश्वर जगत में ही परमधाम की सारी हकीकत बता दी ।

जो ज्ञान अक्षर के पास नहीं है, तो ब्रह्मा, विष्णु, शिव के पास कैसे हो सकता है ? ऐसा अमूल्य ज्ञान ब्रह्मसृष्टियों के आने के कारण स्वप्नमयी संसार के जीवों को मिल गया । यह सब हक की मोमिनों पर मेहेर ही है । परमधाम के ज्ञान का "श्री कुलजम सरूप" के रूप में अवतरण ही फरदा रोज कयामत है ।

इस प्रकार धाम धनी ने मोमिनों पर अपार मेहेर की है, जिसे इस जिह्वा से कहां तक कहा जाए । उन्होंने अलौकिक ज्ञान से परमधाम के द्वार को खोल दिया है ।

कुरान में ११०० वर्ष पहले ही परमधाम का वर्णन कर दिया गया था, परन्तु सारी सृष्टि उस रहस्य को समझ न सकी । अब अक्षरातीत श्री राज ने इस्लाम का सारा अधिकार मोमिनों के हाथ में सौंप दिया है । उन्हें ही हकीकत और मारफत के भेद खुले हैं । अब जो इनके हुक्म तले आएगा, उसका ही इस्लाम में आना माना जाएगा ।

यह तो रूहों (ब्रह्मसृष्टियों) पर होने वाली बातूनी (आन्तरिक) मेहेर है । अब उनके ऊपर होने वाली जाहिरी (ऊपरी) मेहेर को देखते हैं ।

सबसे पहले, ब्रज में गोपियों के रूप में लीला करने वाली ब्रह्मसृष्टियों पर अनेक संकट आए, जिन्हें अक्षरातीत श्री राज ने दूर कर दिया । उनकी कृपा से आज तक ब्रह्माण्ड के लोग ब्रज-धूलि की पूजा करते हैं ।

फिर दूसरे दिन सब ब्रह्मसृष्टियां रास में आयीं । यह लीला योगमाया के अखण्ड ब्रह्माण्ड में हुई, जिसका वर्णन सुनने की ताकत ब्रह्मा, विष्णु और शिव में भी नहीं है । उसे जानने की इच्छा सभी रखते हैं, परन्तु जान नहीं पाते, मात्र अनुमान लगाते रहते हैं । इस लीला की वास्तविकता सिर्फ ब्रह्मसृष्टियों को पता है ।

रास लीला खेलकर अक्षर अरब में रसूल मुहम्मद के रूप में आए । उनके आने का मुख्य उद्देश्य मोमिनों को साक्षी देने के लिए कुरान का ज्ञान देना था । इस तीसरे दिन की लीला में उन्होंने अनेक चमत्कार दिखाए, और ११०० वर्ष बाद की भविष्यवाणी भी कही, परन्तु कोई उसका अर्थ नहीं समझ सका ।

चौथे दिन की लीला में रूह अल्लाह (श्यामा जी) ने पहला कदम रखा और सुन्दरसाथ को तारतम का सन्देश दिया, परन्तु कोई आत्मा जाग्रत नहीं हुई । उनकी हकीकत १०० वर्षों तक छिपी रही । तब उन्होंने अपना दूसरा कदम (इन्द्रावती जी के तन से) रखा और आत्माओं की दृष्टि परमधाम तक पहुंचा दी ।

पांचवा दिन इमाम की इमामत का है । इमाम महदी श्री जी साहिब जी ने फरदा रोज कयामत के समय परमधाम का दरवाजा खोल दिया, अर्थात् खिलवत, परिकरमा, सागर और सिनगार के माध्यम से परमधाम का ज्ञान दे दिया ।

मुहम्मद की इन तीन सूरतों (रसूल मुहम्मद, श्री देवचन्द्र, श्री महामति) को पहचानिए, जिन्होंने अक्षरातीत श्री राज का सन्देश पहुंचाकर मोमिनों का ही काम किया है । उनके द्वारा होने वाले चमत्कार देखकर भी कोई उन्हें पहचान नहीं सका ।

अब छठा दिन जुम्मे का चल रहा है, जिसमें मोमिन (सुन्दरसाथ) जमा हो रहे हैं । उनके लिए ही जिब्रील द्वारा तारतम ज्ञान का प्रचार किया जा रहा है । मोमिन सभी पांच दिनों की लीला का चमत्कार देख रहे हैं और सारे अलौकिक ज्ञान के वारिस (उत्तराधिकारी) भी वही हैं ।

सबसे पहले मोमिन ईमान लायेंगे, बाद में जीवों को वह ज्ञान मिलेगा । आखिरी मुहम्मद श्री जी साहिब जी की आन्तरिक मेहेर को मोमिन जानते हैं और बाह्य चमत्कारों को आम जीव देखते हैं ।

कुछ काफिरों (मुगल दरबारियों) ने श्री जी का पैगाम नहीं माना, तो उनकी सत्ता को मिटाकर इस्लाम (निजानन्द) को जाहिर कर दिया गया । जो श्री जी से जिस भांति मिलता है, वे उससे उसी विधि से मिलते हैं । श्री जी अन्दर से मेहेर से भरे हैं, परन्तु ऊपर से कठोर शब्दों से सबको झकझोरते हैं ।

किसी को पता नहीं चला कि श्री मेहेराज के तन में बैठकर स्वयं अक्षरातीत श्री राज लीला कर रहे हैं । जो लोग ईमान नहीं ला सके, वे उनसे लड़ने के लिए खड़े हो गए, किन्तु जब उन्हें तारतम ज्ञान की सुगन्धि मिली, तो वही लोग सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । ऐसे लोगों की संख्या और विश्वास बढ़ता गया । तब आम लोग भी सुन्दरसाथ में शामिल हो गए और श्री जी के लिए पूरी श्रद्धा के साथ काफिरों (शरीयतपन्थियों) से लड़े ।

रसूल मुहम्मद द्वारा चलाया गया इस्लाम ११०० वर्ष तक बढ़ता रहा । उन्होंने वादा किया था कि कयामत के समय वे दोबारा आयेंगे ।

अक्षरातीत श्री राज ने मोमिनों से कहा- "इस खेल में मेरी तीन सूरतों को अब तुम पहचानो- बसरी (रसूल मुहम्मद), मलकी (श्री देवचन्द्र जी), हकी (श्री जी साहिब जी) ।"

इन तीन स्वरूपों ने मूल मिलावा में पहुंचकर अक्षरातीत श्री राज का दर्शन किया है, जहां तक कोई फरिश्ता भी नहीं जा सकता । अतः इन तीन स्वरूपों पर तुम ईमान लाना ।

रसूल मुहम्मद ने कहा था- "जब रब की गिरोह (आत्माएं) उतरेंगी, तब मैं भी उनके लिए आऊंगा । तुम उनके दीदार की उम्मीद रखना और मुझे पहचान लेना ।"

यह कुरान और कुलजम स्वरूप का ज्ञान मोमिनों के लिए आया है । इनका गुह्य अर्थ वही ले सकता है, जिसका दिल रोशन हो, जिसका असल तन परमधाम में हो, और जिसे धाम धनी ने ईमान दिया हो ।

श्री कुलजम सरूप के माध्यम से मोमिनों के लिए हकीकत और मारफत का दरबार खोल दिया गया है । उनकी रहनी देखकर संसार के लोग चकित होते हैं, परन्तु कोई भी उनके समान परब्रह्म तक पहुंच नहीं पाता ।

कयामत के सातों निशान कुरान में गुप्त रूप से लिखे हैं और उसे मोमिन ही समझ पाते हैं क्योंकि उनका दिल तारतम ज्ञान से प्रकाशित है ।

हज़रत ईसा (श्री देवचन्द्र जी) तारतम ज्ञान रूपी ऐसी किल्ली (चाबी) लेकर आए, जिससे सभी धर्मग्रन्थों के रहस्य खुल गए । तब मोमिनों (सुन्दरसाथ) को परमधाम और अक्षरातीत की पहचान हो गई और वे इस्लाम (निजानन्द) में आ गए ।

श्री देवचन्द्र जी दसवीं सदी में आए और उन्होंने परमधाम की बातें जाहिर कीं । वे ७४ वर्ष तक रहे, परन्तु उनके शरीर को देखकर कोई उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सका । उनके द्वारा कई चमत्कारिक लीलाएं भी हुयीं । वे अखण्ड का ज्ञान लाए, फिर भी कोई उन्हें नहीं पहचान सका ।

फिर वे दूसरे तन में इमाम (श्री जी) के अन्दर विराजमान हो गए । जब उस स्वरूप से श्री कुलजम सरूप का ज्ञान उतरने लगा, तब दज्जाल (माया) समझ गया कि इस ज्ञान से उसका अन्त हो जाएगा और मोमिन उसके जाल से मुक्त होकर परब्रह्म तक पहुंच जाएंगे । अतः वह श्री जी से लड़ने को तैयार हो गया ।

जब श्री जी साहिब जी के सामने दज्जाल का जोर नहीं चला, तो उसने चार सेनाएं तैयार करके मोमिनों पर छोड़ दीं- एक बेईमान औरत, दूसरा संगीत और नाटक दिखाने वाले, तीसरे इल्म पढ़ने वाले, और चौथे चतुर जादूगर (तन्त्र-मन्त्र व सिद्धियों से चमत्कार करने वाले) । ये चारों आकर्षण मोमिनों को अपनी तरफ खींचते हैं, परन्तु जिनमें परमधाम का ईमान होता है, वे कभी उसके जाल में नहीं फंसते ।

हिजरी १०९० (वि.सं. १७३५) से इस्राफील (जाग्रत बुद्धि का फरिश्ता) सूर फूंकने लगता है, अर्थात् श्री कुलजम सरूप का ज्ञान तेजी से उतरने लगता है । उसे सुनकर परमधाम की आत्माएं दौड़-दौड़ कर आने लगीं । काफिरों के दिल में बैठकर दज्जाल ने बहुत शोर (विरोध) किया, परन्तु परमधाम से उतरे मोमिनों के चित्त को नहीं डिगा सका ।

परिवार और रिश्तेदार सब दज्जाल की सेना हैं । जाग्रत बुद्धि के ज्ञान ने इन सबसे छुड़ाकर मोमिनों की सुरता को परमधाम पहुंचा दिया । जिब्रील फरिश्ता आत्माओं की सुरक्षा करता है, उनके सभी अंगों को साफ रखता है, और उनके दिल को ज्ञान से प्रकाशित रखता है ।

जब मोमिन कयामत का सन्देश लेकर औरंगज़ेब के पास गए, तब दज्जाल समझ गया कि इमाम उसे मार डालेंगे । उसने लड़ने के लिए कमर कस ली और बहुत शोर किया । बादशाह का ईमान छुड़वाने के लिए, दज्जाल ने दरबारियों के दिल में बैठकर बादशाह के मन में शक पैदा कर दिया ।

इस युद्ध के समय परब्रह्म ने शरीयत के केन्द्र मक्का से चार वसीयतनामे लिखवाकर औरंगज़ेब को भिजवाए । उसमें कयामत के आने की सूचना दी गई थी, परन्तु दिल्ली में बैठे काफिरों ने उस पर भी विचार नहीं किया क्योंकि दज्जाल उन सबके दिल पर दुश्मन बनकर बैठा था ।

इस समय श्री जी ने मेड़ता से जसवन्त सिंह राठौड़ को सन्देश भेजा, परन्तु उसने सन्देश पर ध्यान नहीं दिया । ईमान न होने के कारण वह काल का शिकार हो गया ।

दज्जाल के बार-बार विघ्न डालने पर भी मोमिन पैगाम लेकर बादशाह तक पहुंच गए । तब दज्जाल ने क्रोधित होकर पैगाम को ठुकरा दिया, सुल्तान की दृष्टि फिरा दी, और मोमिनों को कैद करवा दिया ।

जब हक सुभान ने मोमिनों पर अत्याचार होते देखा, तो बादशाह को उसके तख्त (सिंहासन) से गिरा दिया । मोमिनों ने जागनी के लिए बहुत कष्ट सहे, परन्तु अक्षरातीत ने सदैव उन्हें अपनी शरण में लेकर बचा लिया ।

इसके पश्चात् उदयपुर पहुंचकर श्री जी ने राणा को सन्देश भेजा, परन्तु वहां भी दज्जाल (पण्डितों के मन में) बैठा था । उसने यहां भी श्री जी से लड़ाई की और राणा से भेंट नहीं होने दी ।

बाद में सुल्तान ने उदयपुर पर आक्रमण कर दिया । तब भी अक्षरातीत ने मोमिनों को अपने संरक्षण में रखा और मन्दसौर पहुंचा दिया । शेष बचे सुन्दरसाथ को दज्जाल के अत्याचार से बचाने के लिए महामति जी ने हक सुभान से अर्जी की । उनकी अर्ज सुनकर सुभान श्री राज ने जिब्रील के माध्यम से कुरान के दस सिपारों का हिन्दुस्तानी रूपान्तरण विरह की चौपाइयों के रूप में भेज दिया, जिससे सारे कष्ट मिट गए और महामति जी को बहुत प्रसन्नता हुई ।

वहां से उज्जैन और बुढ़ानपुर होते हुए श्री जी औरंगाबाद पहुंचे । भाव सिंह ने अपने अंकुर के अनुसार लाभ लिया । वह श्री जी से परमधाम का दर्शन कराने की हठ करने लगा, परन्तु पात्र न होने के कारण उसका शरीर छूट गया ।

भाव सिंह के देहान्त के बाद दज्जाल ने सुन्दरसाथ को कष्ट देने के लिए बहुत खोज की । तब अक्षरातीत श्री राज ने मोमिनों को अपने संरक्षण में रखा और दज्जाल की मंशा को पूरा नहीं होने दिया ।

जब लालदास बुढ़ानपुर से शेख इस्लाम के पास पैगाम लेकर गए थे, तब उन लोगों की नीयत बिगड़ जाने के कारण लालदास के प्राण संकट में पड़ गए । उस समय भी धाम धनी ने उन्हें वहां से सही समय पर सुरक्षित निकाल लिया ।

मोमिनों की रक्षा की बात कुरान में भी लिखी है- "बनी असराईल की उम्मत को फिरौन नुकसान पहुंचाना चाहता था, तब अल्लाह ने उनकी रक्षा के लिए मूसा पैगम्बर और हारून को भेजा । मूसा पैगम्बर ने फिरौन की फौज को कुल्ज़ुम नदी में गर्क कर दिया ।"

उसी प्रकार, अक्षरातीत ने सुन्दरसाथ के लिए श्री कुलजम सरूप का ज्ञान दिया है, जिसके आने से अज्ञानता रूपी दज्जाल नष्ट हो गया । श्री कुलजम सरूप को पढ़ने से अध्यात्मिक विषय के सारे संशय मिट जाते हैं ।

हे साथ जी ! आप अक्षरातीत श्री राज का शुक्राना बजाओ, अर्थात् उनको धन्यवाद दो कि उन्होंने दज्जाल (माया) से लड़ाई में आपकी हर तरह से रक्षा की है ।

अगला प्रसंग- ब्राह्मण की सुरता अखण्ड धाम पहुंची