पण्डितों से शास्त्रार्थ
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३३
काज़ी के हारने के बाद, बलदीवान ने सोचा कि पण्डितों से भी पूछना चाहिए । कोई आकर इनसे चर्चा करे । तब उसने सुन्दर, वल्लभ, बद्री और अन्य पण्डितों को बुलाकर पूछा कि विजयाभिनन्द बुद्ध की बात कहां तक सत्य है ?
तब श्री जी की तरफ से स्वयं महाराज छत्रसाल ने बद्री को बुलाकर स्पष्ट बात पूछी । भागवत के सवालों पर दोनों ने चित्त देकर लम्बी चर्चा करी । बद्रीदास ने सभी प्रश्नों को ध्यान से सुना ।
जब उसे कोई उत्तर नहीं सूझा, तब उसने स्पष्ट कह दिया- "श्री कृष्ण की इन बातों का स्पष्टीकरण स्वयं भगवान ही कर सकते हैं ।"
बद्रीदास की स्पष्टवादिता पर महाराज छत्रसाल बहुत प्रसन्न हुए । उन दोनों के बीच जो चर्चा हुई, उसका रस इस मुख से वर्णन नहीं किया जा सकता ।
आधी रात के उपरान्त, जब बद्री घर गया, तब सभी पण्डितों ने मिलकर उससे पूछा- "तुमने क्या चर्चा करी और उनके प्रश्नों का क्या उत्तर दिया ?"
बद्रीदास ने विस्तारपूर्वक सारा वार्तालाप सुनाने के बाद अन्त में कहा- "मैंने यथार्थ बोल दिया कि उनके प्रश्नों का उत्तर परमात्मा के अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता और इस झूठे संसार (प्रतिष्ठा) को उड़ा (त्याग) दिया ।"
यह सुनकर सब पण्डितों ने बद्री को फटकारते हुए कहा- "इसी संसार (प्रतिष्ठा) से तुम्हारी जीविका चलती है । हारने की अपेक्षा तुम मर क्यों नहीं गए ? जब तुमने उनकी बात स्वीकार कर ली, तो तुम्हारा क्या महत्व रहा ? अब पुनः वहां जाकर कोई अन्य बात करके उन्हें पराजित करो । हम प्रश्न बनाकर देते हैं । तुम उन्हें लेकर जाओ और पुनः शास्त्रार्थ करो । तुम्हारी सहायता के लिए हम भी आएंगे ।"
रात में उन पण्डितों ने बिना किसी प्रमाण के कुछ प्रश्न बनाए और प्रयाण कर गए कि प्रातः उठकर श्री प्राणनाथ की परीक्षा लेंगे । प्रातः बद्रीदास दरबार आया और बलदीवान को सूचित किया कि वह दोबारा शास्त्रार्थ करना चाहता है ।
जब बद्री ने महाराज छत्रसाल से भेंट करके प्रश्न दिखाए, तब महाराज बोले- "अब तो आप कुछ और ही बात कर रहे हैं । रात में जो बात हुई थी, वह कहां गई ? यह जो भागवत के प्रश्न हैं, उन सबके उत्तर तो मैं जानता हूं, परन्तु आप तो झूठी बातें बनाकर करने लगे हैं ।"
तब महाराज छत्रसाल को बहुत क्रोध आया और उन्होंने आदेश दिया- "आज से कोई भी बुन्देला इन्हें गुरु न बनाए और न ही कोई इन्हें शीश नमाए । अब इनके हाथ से कोई अपने सिर पर पगड़ी न बंधवाए । कोई भी बुन्देला इनके आने पर उठकर खड़ा नहीं होगा ।"
कलियुग में सुन्दर, वल्लभ, बद्री जैसे पण्डित हैं, जो चौदह विद्याओं में निपुण कहलाते हैं, परन्तु एक का भी वास्तविक ज्ञान नहीं रखते ।
फिर बलदीवान के सामने पुनः जोरदार शास्त्रार्थ हुआ । अन्ततः बद्रीदास ने स्वीकार किया कि सभी पण्डितों ने मिलकर उसके चित्त को भ्रमित कर दिया था । इस प्रकार सभी पण्डित पराजित हुए और निजानन्द की विजय हुई । सभी पण्डित अपमानित होकर अपने घर लौट गए ।
पन्ना में ही कुछ वर्षों बाद एक अन्य प्रसंग घटा ।
काशी के महापण्डित भट्टाचार्य शास्त्रार्थ महारथी और दिग्विजयी थे । उन्हें अपनी विद्वता का इतना अहं हो गया कि उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी आरती उतारने को कहा । उनकी पत्नी श्री प्राणनाथ की महिमा जानती थी ।
भट्टाचार्य की पत्नी बोली- "मैं आपकी आरती तभी उतारूंगी, जब आप पन्ना के प्राणनाथ जी को शास्त्रार्थ में पराजित करेंगे ।"
अपने ज्ञान के अहं में भट्टाचार्य तुरन्त पुस्तकों से लदी बैलगाड़ी लेकर पन्ना के लिए निकल पड़े । जब वे पन्ना पहुंचे, तो बंगला जी के बाहर कुछ बालिकाएं श्री कुलजम सरूप की चौपाइयां गा रही थीं ।
उन कन्याओं के मुख से भट्टाचार्य ने सुना- "ना ईस्वर ना मूल प्रकृती, ता दिन की कहूं आपा बीती ।"
यह चौपाई सुनते ही भट्टाचार्य चौंक गए । वे समझ गए कि जहां की बालिकाएं ऐसा ब्रह्मज्ञान जानती हैं, वहां अवश्य कोई दिव्य स्वरूप विराजमान होंगे । उनका अहं तुरन्त समाप्त हो गया और वे श्री जी के चरणों में नतमस्तक होकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए ।
अगला प्रसंग- महाराज छत्रसाल की सेवा भावना
