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विषय-सूची

कुलजम सरूप

सच्चिदानन्द अक्षरातीत स्वरूप श्री प्राणनाथ जी के मुख से उच्चरित ब्रह्मज्ञान "श्री कुलजम सरूप" ग्रन्थ में समाहित है । अलग-अलग परिस्थितियों में जैसे-जैसे श्री जी के मुख से वाणी का प्रकटन होता गया, उसे साथ लिपिबद्ध करते गए । श्री कुलजम सरूप को प्राणनाथ वाणी, तारतम वाणी, श्री मुख वाणी, स्वसं वेद, आदि नामों से भी जाना जाता है ।

मेरे प्रियतम की वाणी (श्री कुलजम सरूप) संसार से अलग है । इसमें निराकार (क्षर) के पार (अक्षर) के भी पार (अक्षरातीत) का वर्णन है ।1

चौदह किताबें

श्री कुलजम सरूप में समाहित चौदह ग्रन्थों के नाम हैं-

  1. रास
  2. प्रकास
  3. खटरूती
  4. कलस
  5. सनंध
  6. किरंतन
  7. खुलासा
  8. खिलवत
  9. परिकरमा
  10. सागर
  11. सिनगार
  12. सिंधी
  13. मारफत सागर
  14. कयामतनामा

भूमिका

आज तक संसार में कहने योग्य ज्ञान ही कहा-सुना जाता है, परन्तु कभी अकथ (शब्दों से परे) ज्ञान नहीं सुना गया । ऐसा ज्ञान (कुलजम सरूप) अब प्रकट हुआ है, जो परब्रह्म अक्षरातीत की आज्ञा से उत्पन्न हुआ है ।2

प्रियतम ने कृपा करके मेरे अन्दर का पर्दा खोल दिया (अज्ञानता को मिटा दिया) । सो मैं कुछ शब्द (कुलजम सरूप) कहकर अपने सन्मन्धियों (धाम की आत्माओं) को सुख देना चाहती हूं ।3

(श्री राज ने इन्द्रावती जी को दर्शन के समय कहा-) तुमने मुख से जो वचन (कुलजम सरूप) कहे हैं, उससे (ज्ञान का) प्रकाश होगा । असत्य रुई के समान उड़ जाएगा और सम्पूर्ण अन्धकार (अज्ञान) का नाश हो जाएगा । तेरे मुख से जो बोल (चौपाइयां) निकले हैं, तू उनके अर्थ को अच्छी तरह से समझना । यदि तुम्हारी आत्मा साक्षी दे, तो उन्हें शिरोधार्य (पालन) करना ।4

विषय वस्तु

श्री कुलजम सरूप का प्रारम्भ श्री कृष्ण जी द्वारा योगमाया में खेली गई रास लीला से होता है और उसका समापन कुरान में लिखी कयामत के विस्तृत वर्णन के साथ होता है । खिलवत, परिकरमा, सागर और सिनगार ग्रन्थों में मुख्यतः धाम के दुर्लभ ज्ञान का विस्तार है । किरन्तन ग्रन्थ में सभी विषयों का समावेश है ।

श्री कुलजम सरूप के प्रारम्भिक ग्रन्थों में इन्द्रावती की छाप है । प्रकास हिन्दुस्तानी से आगे के ग्रन्थों में महामति की छाप है । अन्तिम ग्रन्थ बड़ा कयामतनामा में छत्ता (महाराज छत्रसाल) की छाप है ।

श्री कुलजम सरूप में कुल १४ पुस्तकें, ५२७ प्रकरण और १८७५८ चौपाइयां हैं ।

धाम के ज्ञान से ओत-प्रोत श्री कुलजम सरूप की वाणी का प्रकटन साथ को धाम, युगल स्वरूप और उनके निज स्वरूप का स्मरण दिलाने, तथा उन्हें आनन्दित करने के लिए हुआ ।

कुलजम सरूप किसने कहा है ?

हे साथ ! इस वाणी को चित्त देकर (ध्यान से) सुनना, क्योंकि प्राणनाथ कृपा करके कह रहे हैं । मन में ऐसा मत समझना कि यह कोई कविता है । श्री धनी जी धाम से इन वचनों को लाए हैं ।5

यह जो खसम के शब्द (कुलजम सरूप) है, इसे तुम किसी और का मत समझो (यह खसम ने ही कहा है) । आदि से लेकर अब तक प्रियतम (परब्रह्म) की ठौर (धाम) के विषय में किसी (अन्य) ने नहीं कहा ।6

अवतरण का स्थान

प्रबोधपुरी में सबसे पहले रास का अवतरण हुआ, जिसे ईसाई पन्थ में अंजील कहा जाता है । इसके बाद प्रकास गुजराती की चौपाइयां उतरी, जिसे जंबूर कहा जाता है । तद्पश्चात् खटरूती का अवतरण हुआ, जिसमें विरह और प्रेम का वर्णन है ।

कलस गुजराती का अवतरण प्रबोधपुरी, दीव बन्दर और सूरत में हुआ । कलस को कतेब पक्ष में तौरेत भी कहा जाता है ।

सनंध, प्रकास हिन्दुस्तानी और कलस हिन्दुस्तानी का प्रकटन अनूपशहर में हुआ ।

मार्ग में अलग-अलग स्थानों पर किरंतन की चौपाइयां उतरती गयीं ।

पन्ना में वाणी का बहुत विस्तार हुआ और वहां अनेक ग्रन्थों का अवतरण हुआ, जैसे खुलासा, खिलवत, परिकरमा, सागर, सिनगार, सिंधी, मारफत सागर, छोटा कयामतनामा ।

बड़ा कयामतनामा का अवतरण चित्रकूट में हुआ ।

महिमा

कुलजम सरूप ग्रन्थ में, जो खोजे चित लाए । हद बेहद पर धाम लों, आतम दृष्टि लखाए ॥

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, जो करे नित विचार । आतम जाग्रत होवहीं, खुले धाम के द्वार ॥

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, नित सेवे जो कोए । पूरण प्रेम जो उपजे, सत्वर दरसन होए ॥

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, पढ़े पढ़ावे कोए । धाम रास बृज जागनी, मिले इंछित सुख सोए ॥

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, जो करहीं नित पाठ । अहनिस युगल सरूप सों, खेले सातों घाट ॥

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, सेवे आठों जाम । उन सब सुन्दर साथ को, करूं दण्डवत प्रणाम ॥

(कुलजम सरूप के) प्रकाश को पकड़ा (छिपाया) नहीं जा सकता, इसकी ज्योति बहुत तेज है । जब सब उजाला (धाम का सम्पूर्ण ज्ञान) यहां आ गया, तब रैन गई और भोर हो गया ।7

यह उजाला (खिलवत, परिकरमा, सागर और सिनगार) इस भांति का है कि यदि कभी उसकी किरण निकली तो एक पल में सम्पूर्ण धरती में चारों तरफ फैल जाएगी ।8

यह जो प्रियतम का प्रकाश (ज्ञान) है, अन्दर के संशय मिटा देता है । इसी शब्द (कुलजम सरूप) के प्रसार से सब अज्ञानता उड़ जाएगी ।9



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/3 (2) कलस हिन्दुस्तानी 1/3 (3) कलस हि. 1/4 (4) कलस हि. 9/42,43 (5) प्रकास हि. 37/10 (6) कलस हि. 10/10 (7) कलस हि. 10/14 (8) कलस हि. 10/19 (9) कलस हि. 10/21