श्री देवचन्द्र द्वारा अलौकिक ज्ञान चर्चा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १८
जब श्री देवचन्द्र जी चर्चा करते थे, तो सब सुन्दरसाथ इतना मग्न हो जाते थे कि किसी को भी बीच में बोलने का साहस नहीं होता था । वे राज जी के जोश में चर्चा करते थे और उनके मुख से अत्यन्त प्रेम के भाव झलकते थे, जिसके कारण सुन्दरसाथ बहुत आनन्द में डूब जाते थे ।
अपनी चर्चा में श्री देवचन्द्र जी कभी श्री राज जी के अति सुन्दर स्वरूप का वर्णन करते, तो कभी ब्रज-रास की लीलाओं का मनमोहक वर्णन करते । साथ ही वे शास्त्रों के प्रमाण से अनेक आध्यात्मिक रहस्यों का भी प्रकटीकरण करते रहते थे ।
घर पर चर्चा सुनने के लिए आने वाले सुन्दरसाथ के लिए गांगजी भाई प्रतिदिन रसोई की सेवा करते और बहुत भाव से नित्य नये-नये व्यंजन बनवाते ।
जब कोई नया सुन्दरसाथ श्री राज जी के चरणों में आता, तो देवचन्द्र जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता और उसका सबके बीच में बहुत सम्मान करते । नए साथी को लाने वाले सुन्दरसाथ पर भी वे इतना प्रसन्न होते कि उसे कुछ आध्यात्मिक लाभ देने पर विचार करने लगते ।
श्री देवचन्द्र जी के मन में यह भावना रहती थी- "धाम की आत्माएं माया में आकर भूल गई हैं । श्री राज ने इनका हाथ मुझे पकड़ाया है । आत्माओं को शीघ्र जाग्रत करने के लिए मुझे अलग-अलग स्थानों पर जाकर उन्हें ढूंढना होगा और उन्हें चर्चा सुनाकर धाम की याद दिलानी होगी ।"
इसी भावना से वे चर्चा के माध्यम से बहुत मेहनत करते और सुन्दरसाथ को अधिक से अधिक चर्चा का रस पिलाने का प्रयास करते ।
श्री देवचन्द्र जी धाम की न्यामतें देकर सुन्दरसाथ की सभी इच्छाओं को भी पूर्ण करना चाहते थे । सुन्दरसाथ को सुख देने के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे ।
अनेक सुन्दरसाथ को देवचन्द्र जी की कृपा से श्री राज जी का दर्शन भी हुआ था । उस समय सुन्दरसाथ को दर्शन, चर्चा व समागम के रस से बहुत आनन्द प्राप्त होता था ।
अगला प्रसंग- श्री मेहेराज का लौकिक परिचय
