श्री मेहेराज का लौकिक परिचय
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १९
श्री मेहेराज का जन्म वि.सं. १६७५ में भादो मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रविवार के दिन हुआ था । उनके पिता का नाम केशव ठाकुर और माता का नाम धनबाई था । उनके अन्दर धाम की इन्द्रावती बाई की वासना थी ।
श्री मेहेराज ने अपना तन-मन-धन अपने सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्र जी के चरणों में समर्पित कर दिया । श्री देवचन्द्र जी के बाद श्री मेहेराज के तन में विराजमान होकर श्री राज जी ने लीला की ।
श्री मेहेराज के चार भाई थे- हरिवंश, श्यामल, गोवर्धन, उद्धव । उद्धव को छोड़कर अन्य सभी भाई उनसे आयु में बड़े थे । हरिवंश ठाकुर की पत्नी का नाम मेघबाई था, जिनके अन्दर धाम की हरखबाई की वासना थी । श्यामल की पत्नी का नाम सीताबाई था । श्यामल हब्शा की घटना के बाद श्री जी पर ईमान ला सके । गोवर्धन की पत्नी का नाम पद्मा था ।
श्यामल के दो पुत्र थे- प्रेमजी और विष्णुजी । प्रेमजी को श्री जी के स्वरूप की पहचान हो गई थी । उनकी संगति से उनकी पत्नी सवीरा बाई भी सुन्दरसाथ में शामिल हो गई । विष्णुजी को देवचन्द्र जी के दर्शन का सौभाग्य तो मिला, परन्तु वे सुन्दरसाथ में शामिल नहीं हो सके । विष्णुजी की पत्नी का नाम पूरबाई था । उनके पुत्र का नाम पीताम्बर और पुत्रवधू का नाम रतनबाई था । रतनबाई पन्ना तक श्री जी सेवा करती रहीं और उनके दो पुत्र कानजी और नानजी भी श्री जी पर पूरी तरह समर्पित हो गए ।
श्री मेहेराज की पत्नी का नाम फूलबाई था । उनके अन्दर धाम की अमलावती बाई की वासना थी और वे धाम धनी पर पूर्णतः समर्पित थीं ।
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