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दोनों स्वरूपों का मिलाप

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २०

श्री मेहेराज की बड़ी भाभी मेघबाई थी और गांगजी भाई की पुत्रवधू अजबाई थी । मेघबाई अजबाई की बुआ लगती थी, इसलिए अजबाई उनसे मिलने आया करती थी ।

अजबाई ने अपनी बुआ मेघबाई को अपने घर में होने वाली चमत्कारिक लीलाओं के विषय में बताया । अजबाई अपनी बुआ को नित्य ऐसी बातें सुनाकर उन्हें भी वहां आकर दर्शन करने का निमन्त्रण दिया करती थी ।

तब मेघबाई ने अपने देवर गोवर्धन को सत्य का पता लगाने के लिए कहा । गोवर्धन ने अपनी पत्नी पद्मा को गांगजी भाई के घर भेजा ।

सबसे पहले पद्मा श्री देवचन्द्र जी की शरण में गई । उसने वापस आकर वहां होने वाली अलौकिक लीलाओं का वर्णन सुनाया । उसकी बात सुनकर गोवर्धन वहां गए । देवचन्द्र जी ने गोवर्धन को देखते ही पहचान लिया कि उनके अन्दर गुणवन्ती बाई का आत्मा है ।

गोवर्धन पूरी तरह धनी श्री देवचन्द्र जी के चरणों पर समर्पित हो गए । श्री राज जी के दर्शन के बाद उनकी श्रद्धा दृढ़ हो गई और वे अपने घर पर भी इस विषय पर बात करने लगे ।

उनकी बातें सुनकर श्री मेहेराज के मन में श्री देवचन्द्र जी के दर्शन की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई । उन्होंने गोवर्धन जी से वहां ले चलने का आग्रह किया, परन्तु गोवर्धन जी ने सद्गुरु के आदेश के बिना उन्हें ले जाने से मना कर दिया । इस प्रकार पांच दिन बीत गए ।

छठे दिन श्री मेहेराज गोवर्धन जी के पीछे-पीछे श्री देवचन्द्र जी से मिलने के लिए चल पड़े । गोवर्धन ने उन्हें रोकना चाहा, परन्तु वे रोते-रोते उनके पीछे चलते रहे ।

गन्तव्य पर पहुंचकर गोवर्धन ने धनी श्री देवचन्द्र जी से अर्ज करी- "मेरा छोटा भाई कई दिनों से आपका दर्शन करना चाहता है । आज तो वह रोते-रोते मेरे पीछे आ गया है । यदि आपकी आज्ञा हो तो उसे अन्दर बुला लूं ।"

श्री देवचन्द्र जी ने अनुमति देते हुए कहा- "यदि बाल्यावस्था में ज्ञान मिल जाए, तो लक्ष्य सरलता से प्राप्त हो जाता है । ध्रुव ने पांच वर्ष की आयु में ही भगवान विष्णु के चरण प्राप्त कर लिए थे । इसलिए तुम मेहेराज को अन्दर बुला लाओ ।"

तब गोवर्धन जी अपने साथ श्री मेहेराज को अन्दर ले गये । जब श्री मेहेराज ने धनी श्री देवचन्द्र जी के चरणों में प्रणाम किया, तो उन्होंने श्री मेहेराज के सिर पर अपना हाथ रख दिया । श्री देवचन्द्र जी ने उसी क्षण श्री मेहेराज को जाग्रत बुद्धि प्रदान कर दी ।

वि.सं. १६८७ के मार्गशीर्ष मास की नवमी को दोनों स्वरूपों का मिलन हुआ था । उस समय श्री मेहेराज की आयु १२ वर्ष २ महीने १० दिन थी । धनी श्री देवचन्द्र जी ने उनके अन्दर धाम की इन्द्रावती की आत्मा को पहचान लिया था ।

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