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आड़िका लीलाएं

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २१

गांगजी भाई के घर जहां श्री देवचन्द्र जी विराजमान थे, वहां पर श्री राज जी की आड़िका (चमत्कारिक) लीलाएं हुआ करती थीं ।

श्री राज जी प्रतिदिन दर्शन देते और तीन बार भोजन भी करते । भोजन करते समय अपनी इच्छानुसार वस्तु मांग लेते । यदि कोई वस्तु फीकी या खारी हो, तो उसके विषय में भी कहते । वे कई प्रकार की मिठाइयों का भोग लगाते और पान का बीड़ा भी ग्रहण करते ।

कभी-कभी श्री राज जी सुन्दरसाथ को एकान्त में ले जाकर खलाखल यमुना जल का दर्शन करवाते । एक दिन उन्होंने एक सुन्दरसाथ को सोने की कंसेड़ी दे दी । अपनी इच्छानुसार सुन्दरसाथ को कुछ न कुछ वस्तु भेंट करते रहते । इस प्रकार वे कई तरह की आनन्दमयी लीलाएं करते थे ।

इस प्रकार की अनेक चमत्कारिक लीलाओं के माध्यम से श्री राज जी सुन्दरसाथ को यह जताना चाहते थे कि वे ही देवचन्द्र जी के हृदय में विराजमान हैं ।

इन आड़िका लीलाओं से सुन्दरसाथ आकर्षित तो होते थे, परन्तु न तो किसी को धाम धनी के असल स्वरूप की पहचान होती थी और न ही किसी की आत्मा जाग्रत हो सकी ।

जागनी के लिए धाम के ज्ञान का प्रकट होना आवश्यक था । श्री देवचन्द्र जी को पता चल चुका था कि भविष्य में धाम का ज्ञान उतरेगा और उसके माध्यम से ही ब्रह्मसृष्टियों की वास्तविक जागनी होगी । वे चाहते थे कि जागनी उनके माध्यम से हो ।

इसी उद्देश्य से श्री देवचन्द्र जी ने सब सुन्दरसाथ से कहा- "आप श्री राज जी को पाती लिखो कि जागनी मुझसे करवाएं । जब श्री राज जी दर्शन दें, तब वह पाती उन्हें पकड़ा देना ।"

इस प्रकार अलग-अलग सुन्दरसाथ ने ६९ पातियां लिखकर श्री राज जी को सौंपी, जिसमें से एक श्री मेहेराज ने भी लिखी, परन्तु धाम धनी ने एक भी पाती का उत्तर नहीं दिया ।

एक दिन किसी चुगलखोर ने नगर कोतवाल से श्री देवचन्द्र जी की चुगली कर दी कि एक कायस्थ के घर में स्त्री-पुरुष लम्बे समय तक एकसाथ बैठकर कुछ करते हैं । इसकी जांच होनी चाहिए कि वे लोग क्या करते हैं ?

कोतवाल ने दो सिपाहियों को भेजा- "तुम दोनों वहां जाकर पता लगाओ कि सत्य क्या है और मुझे इसकी सूचना दो ।"

दोनों सिपाही चुगलखोर के साथ चल पड़े । रात्रि का समय था । चुगलखोर ने सिपाहियों को दूर से संकेत करके वह स्थान दिखा दिया, जहां श्री देवचन्द्र जी की चर्चा हो रही थी । उस घर में दीपक जल रहा था । घर दिखाकर चुगलखोर वापस लौट गया ।

दोनों सिपाही गन्तव्य तक पहुंचने के लिए दीपक के पीछे-पीछे चलने लगे । वे लगातार चलते जा रहे थे, परन्तु दीपक और उनके बीच में दूरी कम नहीं हो रही थी ।

एक सिपाही पूरी रात दीपक का पीछा करते हुए एक कुंए के चारों ओर घूमता रहा । दूसरा सिपाही दीपक के पीछे चलते-चलते १२ कोस दूर धरोल गांव पहुंच गया । सारी रात चलने के बाद भी दोनों सिपाही दीपक तक नहीं पहुंच सके ।

रात-भर घर न पहुंचने के कारण उन सिपाहियों के घर में कोलाहल मचा हुआ था । उन दोनों की स्त्रियां एक-दूसरे से अपने पति के बारे में पूछ रही थीं, परन्तु किसी को कुछ पता नहीं था ।

प्रातः दोनों सिपाहियों ने घर लौटकर अपनी बीतक सुनाई कि उस चुगलखोर ने हमारे मन में श्री देवचन्द्र जी के विषय में शंका पैदा करके बहुत परेशान किया है । बाद में पूरा घटनाक्रम कोतवाल को सुनाया और उस चुगलखोर के प्रति अपना रोष भी व्यक्त किया ।

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