कान्हजी भट्ट से शास्त्रार्थ
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २३
श्री गोवर्धन और श्री मेहेराज में धाम और संसार दोनों स्थानों का सम्बन्ध था, इसलिए दोनों भाई बहुत प्रेम से रहते थे । वे दोनों प्रतिदिन एक साथ मिलकर चर्चा सुनने जाते थे तथा साथ ही वापस आते थे । दोनों का चित्त आपस में बंधा हुआ था ।
एक दिन जब वे दोनों चर्चा सुनकर घर लौटे, तो उनके बड़े भाई श्यामल स्नान कर रहे थे । उन दोनों को देखकर वे क्रोधित हो गए और कहने लगे- "तुम दोनों भाई बिगड़ गए हो, कुछ काम-काज नहीं करते । यह सब गांगजी भाई और तुम्हारे गुरु की संगति के कारण हुआ है । मैं उन दोनों को शहर से बाहर निकलवा दूंगा, तब तुम सुधरोगे ।"
यह बात सुनकर गोवर्धन और मेहेराज क्रोधित हो गए, और दोनों मिलकर अपने बड़ा भाई को मारने दौड़े । तब उनकी माता ने श्यामल को घर में छिपाकर उनकी रक्षा की ।
जब उनके पिता केशव ठाकुर ने यह बात सुनी, तो वे बोले- "जिन देवचन्द्र जी की तुम लोग चर्चा सुनते हो, उन्होंने तो श्याम मन्दिर में वर्षों तक कान्हजी भट्ट से भागवत कथा सुनी है । तुम दोनों भी उन्हीं से कथा सुना करो ।"
तब दोनों भाइयों ने उत्तर दिया- "यदि भट्ट जी हमारे प्रश्नों का उत्तर दे दें, तो हम हमेशा उन्हीं से चर्चा सुनेंगे ।"
तब श्री केशव ठाकुर उन्हें श्याम मन्दिर में कान्हजी भट्ट के पास ले गये और उनसे अपने पुत्रों के प्रश्नों का उत्तर देने का निवेदन किया ।
दोनों भाइयों ने पूछा- "कितने गुण हैं ? कितने लोक हैं ? कितने तत्व हैं ? कितनी प्रकार की प्रलय होती हैं ?"
कान्हजी भट्ट ने उत्तर दिया- "गुण तीन हैं- सत्व, रज, तम । तत्व पांच हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश । लोक चौदह हैं- पाताल, रसातल, महातल, तलातल, सुतल, वितल, अतल, भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक । प्रलय चार हैं- नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक, महाप्रलय ।"
अब दोनों भाइयों ने आगे पूछा- "जब महाप्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाता है, तो परब्रह्म कहां रहता है ?"
कान्हजी भट्ट ने कहा- "तब परब्रह्म अंगुष्ट मात्र रूप धारण करके क्षीर सागर के अक्षय वट वृक्ष पर विराजमान रहता है ।"
पुनः दोनों भाइयों ने पूछा- "आपने चौथा गुण नहीं बताया, छठा तत्व नहीं बताया, पन्द्रहवां लोक नहीं बताया, तो फिर वह स्थान कहां है, कृपया स्पष्ट करें ?"
यह सुनकर भट्ट जी बौखला गए और आवेश में कहने लगे- "इसका उत्तर तो ब्रह्मा के पास भी नहीं है ।"
यह सारा वार्तालाप सुनने के बाद श्री केशव ठाकुर ने अपने दोनों पुत्रों को सद्गुरु श्री देवचन्द्र जी के पास जाने की छूट दे दी ।
अगला प्रसंग- श्री मेहेराज द्वारा कसनी
