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श्री मेहेराज द्वारा कसनी

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २४

श्री मेहेराज अपने भ्राता श्री गोवर्धन के साथ धनी श्री देवचन्द्र जी की अलौकिक चर्चा का रस कई वर्षों तक लेते रहे, परन्तु श्री राज जी ने कुछ और ही निर्धारित कर रखा था । जब श्री मेहेराज की आयु २४ वर्ष १० मास ५ दिन थी, तब अचानक श्री गोवर्धन का धामगमन हो गया ।

गोवर्धन जी के देह त्याग के पश्चात् श्री मेहेराज पूरी तरह श्री राज जी और धाम के २५ पक्षों के चिन्तन में डूब गए । सद्गुरु श्री देवचन्द्र जी की चर्चा से उन्हें बहुत आनन्द मिलता था ।

एक दिन श्री मेहेराज के मन में यह विचार उपजा- "जब हम धाम से आये हैं, तो क्या राज जी पर हमारा इतना भी अधिकार नहीं है कि हम धाम का दर्शन कर सकें ? जब सद्गुरु श्री देवचन्द्र जी को धाम दिखता है, तो मुझे क्यों नहीं दिखता ? अवश्य मुझ में कुछ अवगुण हैं, जिन्हें निकाले बिना यह सम्भव नहीं हो सकेगा ।"

अब श्री मेहेराज अपने अवगुणों को ढूंढ-ढूंढकर काढ़ने लगे । उन्होंने श्री देवचन्द्र जी से भी अर्ज करी- "मेरे सब अवगुण मिटा दीजिए ।"

उस समय श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "तुम में कोई अवगुण नहीं है । तुम धाम से आई इन्द्रावती की निर्मल आत्मा हो ।"

अब श्री मेहेराज ने संकल्प किया कि वे अपने सद्गुरु के हर वचन का अनुसरण करेंगे । सद्गुरु महाराज जो चर्चा सुनाते, बाद में श्री मेहेराज उस चर्चा को सुन्दरसाथ के आगे दोहराने लगे ।

सद्गुरु के वचनों को आचरण में उतारने की भावना से वे अपने मन तथा शरीर को कष्ट देने लगे । इसी क्रम में उन्होंने अपना आहार दो पैसे के वजन के बराबर कर दिया, जिससे उनका शरीर सूख गया और इन्द्रियों की शक्ति कम हो गई । जब वे चर्चा सुनते, तो आंखों से आंसू बहते रहते । उनका रंग पीला पड़ गया था और श्री राज जी के चिन्तन के अतिरिक्त उन्हें कोई काम नहीं था ।

अपने अवगुणों को मिटाने की चाह में श्री मेहेराज ने अपनी पत्नी फूलबाई के सभी आभूषण भी सद्गुरु को सौंप दिए, ताकि उनसे कोई आसक्ति न रहे ।

अपने मन की परीक्षा लेने के लिए श्री मेहेराज बाजार के बीच में पैदल चलते, जिससे पता चल सके कि मन में कोई इच्छा तो शेष नहीं है । वे अपने मन को खण्डनी भरे कठोर वचनों से फटकारते कि वह माया से अलग हो जाए ।

यदि मार्ग में कोई मित्र मिल जाता, तो श्री मेहेराज उससे मुंह फिराकर दूसरी तरफ चल देते कि कहीं वह मित्र उनके और राज जी के बीच बाधा न बन जाए ।

इस प्रकार की कठोर साधना करने से श्री मेहेराज का शरीर बहुत दुर्बल हो गया, परन्तु उनकी आत्मा को धाम और परात्म की एक झलक मिल गई ।

श्री मेहेराज की जर्जर अवस्था को देखकर बालबाई ने धनी श्री देवचन्द्र जी से अर्ज करी- "आप कुछ कहते क्यों नहीं ? एक भाई तो पहले चला गया, अब दूसरा भी जाने को तैयार है ।"

तब श्री देवचन्द्र जी ने श्री मेहेराज से पूछा- "आज मुझे बताओ कि तुम्हारे मन में क्या है ?"

श्री मेहेराज ने कहा- "आप मेरे अवगुण निकाल दीजिए ।"

श्री देवचन्द्र जी ने पूछा- "तुम मुझे क्या मानते हो ?"

श्री मेहेराज ने उत्तर दिया- "जब आप धाम की चर्चा करते हैं, तो मेरी आंखों से आंसू झरते हैं ।"

श्री देवचन्द्र जी ने कहा- "यदि तुमने मुझे धाम धनी के रूप में पहचान लिया होता, तो एक पल के लिए भी मुझसे अपनी दृष्टि न हटाते और रात-दिन मेरी प्रदक्षिणा देते । तुम्हारे अन्दर कोई अवगुण नहीं है । सच-सच बताओ कि तुम्हारे मन में क्या है ?"

श्री मेहेराज ने कहा- "जब आपको धाम का दर्शन होता है, तो मुझे क्यों नहीं होता ?"

श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "यह हुक्म की न्यामत है और एक बार में एक ही तन से हुक्म की लीला होती है । यदि तुम्हें जल्दी है, तो मेरा शरीर छुड़वाकर तुम पा लो ।"

ऐसी बात सुनकर श्री मेहेराज की इच्छा भंग हो गई । तब बालबाई के सुझाव पर श्री देवचन्द्र जी ने उन्हें किसी कार्य से अहमदाबाद भेजा, ताकि उनका ध्यान कुछ बंट जाए । यात्रा पर जाने से श्री मेहेराज का कसनी का जोश ठण्डा पड़ गया ।

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