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धनी श्री देवचन्द्र जी का बुलावा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २८

वि.सं. १७१२ में धनी श्री देवचन्द्र जी की सुरता धाम की ओर फिरने लगी, अर्थात् लौकिक तन से लीला को विराम देने का समय आ गया था । वे श्री मेहेराज को बार-बार याद करने लगे और सुन्दरसाथ से उन्हें बुला लाने को कहा ।

धनी श्री देवचन्द्र जी की इच्छा को पूरा करने के लिए बाल बाई धरोल में श्री मेहेराज को बुलाने आयीं । श्री मेहेराज ने उनसे कहा कि वे कार्य से छुट्टी मिलते ही सद्गुरु महाराज के चरणों में आयेंगे ।

जब कुछ दिनों तक श्री मेहेराज नहीं पहुंचे, तो बिहारी जी को उन्हें बुलाने के लिए भेजा गया । बिहारी जी वहां उन्हें बुलाने गये थे, परन्तु उन्होंने इस विषय में कोई बात ही नहीं की । बिहारी जी ने श्री देवचन्द्र जी के लिए अम्बर और कस्तूरी मांगी और उसे लेकर वापस लौट गए ।

श्री मेहेराज अपने धनी श्री देवचन्द्र जी से मिलने के लिए व्याकुल हो रहे थे । वे पूरा प्रयास कर रहे थे कि शीघ्र अति शीघ्र राजकाज की जिम्मेदारी किसी को सौंपकर वहां पहुंचें ।

श्री मेहेराज के न आने पर धनी श्री देवचन्द्र जी ने पुनः बिहारी जी को बुलाकर कहा- "तुम मेहेराज को बुला लाओ, जो मुझे सिन्धी में भजन सुनाया करते थे ।"

बिहारी जी पुनः धरोल गए और इस बार भी श्री मेहेराज से नहीं कहा कि देवचन्द्र जी उन्हें पुकार रहे हैं, अपितु उनके लिए औषधि लेकर वापस लौट गए ।

श्री देवचन्द्र जी का मन व्याकुल होने लगा था । वे बार-बार कह रहे थे- "मेहेराज को बुलाओ ।"

बिहारी जी ने श्री देवचन्द्र जी से कहा- "हम उन्हें बुला-बुलाकर थक गए, परन्तु जब वे आना ही नहीं चाहते तो फिर आप बार-बार क्यों उन्हें याद करते हैं ?"

तब श्री देवचन्द्र जी ने बिहारी जी से कहा- "तुम मेहेराज को यहां बुला लाओ । मैं धाम नहीं जा सकता क्योंकि उसके दरवाजे के आगे खड़ी इन्द्रावती रुदन कर रही है ।"

वास्तव में तो धाम धनी श्री राज जी को इन्द्रावती जी के हृदय में बैठकर आगे की लीला करनी थी, इसलिए उनके हृदय को ही यहां धाम कहा गया है ।

यह सारा घटनाक्रम देखकर बाल बाई ने धरोल पहुंचकर श्री मेहेराज से कहा- "हे मेहेराज ! तुम्हें क्या हो गया है ? श्री देवचन्द्र जी ने तुम्हें इतने बुलावे भेजे, फिर भी तुम नहीं आए । वे तुम्हें बार-बार याद कर रहे हैं और तुमसे मिले बिना वे धाम नहीं जा सकते ।"

श्री मेहेराज ने कहा- "मुझे किसी ने यह बात नहीं बताई । यदि मुझे यह सब पता होता, तो मैं तभी आ जाता ।"

तब श्री मेहेराज ने राजा कला जी को उत्तर दे दिया और कार्यभार से विदा लेकर तुरन्त नवतनपुरी पहुंच गए ।

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