श्री देवचन्द्र जी का अन्तर्धान
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २९
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्री मेहेराज अपने सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्र जी के पास पहुंचे और उनके चरणों में प्रणाम किया ।
श्री देवचन्द्र जी को जब पता चला कि श्री मेहेराज आये हैं, तो वे बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने मुख से दिलासा भरे मधुर शब्द बोले- "मैंने तुम्हें बहुत बार याद किया और कई बार तुम्हें बुलाने के लिए सुन्दरसाथ को भेजा ।"
श्री मेहेराज ने उत्तर दिया- "कुछ लौकिक कार्य था, जो मैं किसी दूसरे के ऊपर डालकर आया हूं । मुझे किसी ने बुलाया ही नहीं । जैसे ही मुझे पूरी बात पता चली, मैं तुरन्त आ गया ।"
श्री देवचन्द्र जी ने पूछा- "अब फिर से लौकिक काम करने तो नहीं जाओगे ? या फिर वापस जाकर पुनः धर्म के कार्य के लिए लौटकर आओगे ? मैंने तुमको इसलिए बार-बार याद किया क्योंकि परमधाम में तुम्हारी (इन्द्रावती की) परात्म रो रही है । उसे रोता देखकर मैं धाम (तुम्हारे हृदय) में नहीं बैठ सकता । तुमने बहुत अच्छा किया जो आ गए, इससे मुझे बहुत सुख उपजा है । अब मैं हुक्म करता हूं कि तुम जागनी के कार्य में लगो ।"
फिर श्री मेहेराज के सामने भोजन का थाल परोसा गया । श्री मेहेराज ने बिहारी जी का सम्मान करने के लिए उन्हें भी साथ बैठकर भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया, परन्तु बिहारी जी ने उनके साथ बैठने से मना कर दिया । श्री मेहेराज ने दोबारा प्रर्थना की, परन्तु वे नहीं माने । तब श्री देवचन्द्र जी के कहने पर बिहारी जी ने श्री मेहेराज के साथ एक थाली में भोजन करना स्वीकार किया ।
इसके बाद श्री मेहेराज का धनी श्री देवचन्द्र जी से वार्तालाप हुआ और श्री मेहेराज ने उन्हें अपनी पूरी आपबीती विस्तार से सुनाई ।
सब कुछ सुनकर धनी श्री देवचन्द्र जी ने कहा- "यह तुमने अच्छा किया, जो माया का काम छोड़कर धनी के हुक्म तले आ गए ।"
श्री मेहेराज के आने के बाद सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्र जी २२ दिन तक सुन्दरसाथ के बीच रहे और श्री मेहेराज से गूढ़ आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते रहे ।
वि.सं. १७१२ में भादो मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बुधवार के दिन धनी श्री देवचन्द्र जी ने अपनी नजर धाम की तरफ कर ली, अर्थात् उनका अन्तर्धान हो गया ।
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