बिहारी जी का गादी अभिषेक
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३०
धनी श्री देवचन्द्र जी के अन्तर्धान के पश्चात् सुन्दरसाथ वापस माया के कार्यों में लग गए क्योंकि उन्हें अक्षरातीत श्री राज जी से अपने परमधाम के आत्मिक सम्बन्ध की पहचान नहीं थी । उनका ईमान (श्रद्धा) तो श्री देवचन्द्र जी द्वारा दिखाई गई आड़िका (चमत्कारिक) लीलाओं पर था ।
धाम धनी श्री राज ने जैसा हुक्म किया था, वैसा ही यहां हो रहा था । अभी सुन्दरसाथ को परमधाम के सम्बन्ध की पहचान देने का समय नहीं आया था ।
कुछ दिन पश्चात् बाल बाई श्री मेहेराज के घर पर आयीं और उनके साथ विचार-विमर्श करने लगीं- "जागनी का कार्य ठप हो चुका है । धनी श्री देवचन्द्र जी के अन्तर्धान के पश्चात् कोई सुन्दरसाथ वहां नहीं आता । ऐसा लगता है जैसे वे अपना सम्बन्ध ही भूल गए हैं । श्री देवचन्द्र जी की गादी की बहुत महिमा है । राज जी के हुक्म से उसका खाली रहना ठीक नहीं है । तो किसे गादी पर बैठाया जाए ? लौकिक नाते से देखा जाए तो सद्गुरु महाराज के पुत्र बिहारी जी ही गादी के सबसे योग्य दिखते हैं ।"
तब श्री मेहेराज ने कहा- "आप ठीक कहती हैं । सब सुन्दरसाथ की सहमति से यह कार्य होना चाहिए । मैं सुन्दरसाथ से इस विषय पर बात करूंगा । पहले बिहारी जी को गादी पर बैठाकर मैं स्वयं उनके चरणों में प्रणाम करूंगा, तब मेरी देखा-देखी सुन्दरसाथ भी उनके चरणों में आने लगेंगे ।"
जैसा कि बाल बाई और श्री मेहेराज के बीच तय हुआ था, उसी योजनानुसार शुभ मुहूर्त देखकर बिहारी जी का गादी अभिषेक कर दिया गया । श्री मेहेराज ने उनके चरणों में प्रणाम किया और वहां पर आनन्द-उत्सव मनाया गया ।
वि.सं. १७१२ के अश्विन मास में श्री मेहेराज ने सब सुन्दरसाथ को पत्र लिखकर सूचित किया कि बिहारी जी महाराज को गादी पर विराजमान किया गया है । जो सुन्दरसाथ बिहारी जी का विरोध करते, श्री मेहेराज उन्हें चर्चा सुनाकर बिहारी जी के चरणों में नतमस्तक होने के लिए विवश कर देते ।
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