श्री मेहेराज द्वारा परमधाम की चर्चा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३१
बिहारी जी को गादीपति बनाये जाने के बाद सुन्दरसाथ वहां आने लगे और बिहारी जी प्रातः-सायं दोनों समय चर्चा करने लगे ।
जब सुन्दरसाथ गादीपति बिहारी जी की चर्चा सुनते, तो उन्हें कुछ भी आनन्द नहीं आता क्योंकि बिहारी जी लौकिक विषयों को ही सुनाया करते थे । फिर भी पहले की भांति उत्सव, कीर्तन और समागम चलने लगा ।
श्री मेहेराज सबसे आगे बैठकर चर्चा सुनते और सुन्दरसाथ को खण्डनी भरे वचन सुनाकर चर्चा में बैठने के लिए मजबूर करते ।
सुन्दरसाथ को आनन्दित करने के लिए, बिहारी जी की चर्चा के पश्चात् किसी एकान्त स्थान पर श्री मेहेराज चर्चा करने लगे । श्री मेहेराज की चर्चा में परमधाम, धाम धनी तथा आत्मिक विषयों के अतिरिक्त कोई बात ही नहीं होती थी ।
इस प्रकार प्रतिदिन चर्चा करते-करते श्री मेहेराज की अन्तर्दृष्टि खुलने लगी और उन्हें परमधाम की सुगन्धि आने लगी । उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा कि यह संसार तो नश्वर खेल है और हमारे मूल तन तो परमधाम में श्री राज के सम्मुख बैठे हैं ।
चर्चा करने से श्री मेहेराज के हृदय में आनन्द की तरंगे उठने लगीं । उन्हें ऐसा लगता जैसे वे हक श्री राज जी की अर्धांगिनी हैं और परमधाम उनके बहुत निकट है । सुन्दरसाथ के सामने गुह्य रहस्य खोलने से उनका हृदय ज्ञान से प्रकाशित होने लगा । वे जितनी अधिक चर्चा करते, सुन्दरसाथ भी उतना अधिक आनन्दित होते ।
श्री मेहेराज को श्री राज जी की कृपा से कुछ किरंतन प्रकट हुए, जिनमें मानव जीवन की महत्ता दर्शायी गई है । वाणी के किरंतन ग्रन्थ में "किरंतन पुराने" शीर्षक के साथ इन प्रकरणों को अन्त में जोड़ा गया है और उसमें मेहेराज की छाप है ।
इसी दौरान श्री मेहेराज की पत्नी श्री फूलबाई का धामगमन हो गया । उनके जाने के बाद तो श्री मेहेराज अधिक समय आध्यात्मिक कार्यों में व्यस्त रहने लगे ।
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