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सुन्दरसाथ की सेवा की इच्छा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३२

श्री मेहेराज के मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि यदि नौकरी करके वे धनोपार्जन करें, तो उससे सुन्दरसाथ की अधिक सेवा हो सकती है । तब गादीपति बिहारी जी से विचार-विमर्श करके उन्होंने जामनगर के वजीर के दीवान का पद ग्रहण कर लिया ।

लौकिक कार्य का बोझ पड़ने के कारण श्री मेहेराज के पास कम समय बचता था, फिर भी वे प्रतिदिन बिहारी जी के दर्शन करने अवश्य जाते थे ।

श्री मेहेराज कठोर दिनचर्या का पालन करने लगे । वे ब्रह्ममुहूर्त में उठकर, तैयार होकर बिहारी जी महाराज के दर्शन करने पहुंच जाते, और उनके मुख से श्री राज जी के सुन्दर स्वरूप की चर्चा सुनकर दरबार जाते ।

दिन भर लौकिक कार्य करके शाम साढ़े चार बजे सुन्दरसाथ के पास आते और सब मिलकर परमधाम की चितवन करते । चितवन के पश्चात् श्री मेहेराज सब सुन्दरसाथ को युगल स्वरूप की शोभा-श्रृंगार का वर्णन करते हुए परमधाम की रसमयी चर्चा सुनाते ।

उनकी इच्छा थी कि वे सभी सुन्दरसाथ को एक स्थान पर एकट्ठा करके रसोई, वस्त्र, आभूषण, आदि से उनकी बहुत सेवा करें क्योंकि परमधाम जाने के बाद सुन्दरसाथ की सेवा का ऐसा अवसर पुनः नहीं मिलेगा । सुन्दरसाथ से अपना परमधाम का अटूट सम्बन्ध जानकर श्री मेहेराज उन सबकी भरपूर सेवा करना चाहते थे ।

अपनी सहायता के लिए श्री मेहेराज ने एक सुन्दरसाथ को अपने पास रख लिया, जो धन खर्च करके सामग्री जमा करता रहे और सुन्दरसाथ की सेवा करे ।

श्री मेहेराज ने बिहारी जी को अति प्रेम भाव से बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण भेंट करे । नाग जी को भी सुन्दर वस्त्र-आभूषण और हथियार बनवाकर दिए । सब सुन्दरसाथ को इकट्ठा करके श्री राज उत्सव करने की भी तैयारी होने लगी । सुन्दरसाथ को निमन्त्रण भेजे गये और उत्सव के लिए मैदा, घी, खांड, वस्त्र, आदि समस्त सामग्री श्री मेहेराज के घर पर जमा की जाने लगी ।

उत्सव की तैयारी पूरे जोर से चल रही थी, परन्तु श्री राज जी को कुछ और ही मंजूर था । उसी समय किसी ने वजीर से चुगली कर दी ।

वजीर ने बिना सोचे-विचारे श्री मेहेराज और उनके भाई श्यामल व उद्धव को अपने घर में नजरबन्द कर दिया, तथा उनके द्वारा जमा की गई सारी सामग्री जब्त करके राजकोष में मिला दी ।

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