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महावजी भाई की जागनी

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४५

श्री जी की रसमयी चर्चा से प्रभावित होकर महावजी भाई ने तारतम ग्रहण कर लिया और सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । उनके अतिरिक्त कई अन्य सुन्दरसाथ ऐसे थे, जिन्हें चर्चा के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता था ।

एक दिन चर्चा में श्री जी ने महावजी भाई की खण्डनी कर दी । यह बात महावजी को अच्छी नहीं लगी क्योंकि अभी तक उन्हें श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पूरी पहचान नहीं थी । अतः वे क्रोध में अपने घर में बैठे रहे और श्री जी से नाराज होकर चर्चा में नहीं आए ।

उसी रात्रि जब महावजी अपनी दुकान में सो रहे थे, तो श्री राज के जोश के स्वरूप ने उन्हें ऐसा तमाचा मारा कि वे भयभीत हो गए । अब महावजी का मन स्वयं को धिक्कारने लगा कि उसे क्रोध नहीं करना चाहिए था और श्री जी के चरणों में जाकर उनकी पहचान करनी चाहिए ।

अगली प्रातः महावजी रोते हुए श्री जी के पास गए और उनके चरणों में गिरकर सारा घटनाक्रम कह सुनाया ।

महावजी कहने लगे- "मैं खण्डनी के शब्द सुनकर दुःखी हो गया था । मैं तो साथ में कच्चा हूं और मैंने परब्रह्म को नहीं पहचाना ।"

इसके बाद महावजी का व्यवहार बदल गया और वे पक्के-प्रवीण होकर चर्चा सुनने लगे और उनके अन्दर विश्वास आ गया । तभी दज्जाल की सेना शोर करने लगी और पूरे जोर से महावजी से लड़ाई करी । महावजी के परिवार के सदस्यों को दज्जाल ने अपना हथियार बनाया और वे सब महावजी से लड़ने लगे कि उन्हें अध्यात्म में इतना अधिक नहीं लगना चाहिए ।

महावजी भाई अपने परिवार के दबाव के सामने जरा भी नहीं डिगे क्योंकि अब श्री राज उनके साथ थे । जिसका हाथ स्वयं धाम धनी पकड़ लेते हैं, उसे कोई कैसे बन्धन में डाल सकता है ? महावजी ने दज्जाल का सिर भान दिया, अर्थात् परिवार के समक्ष हार नहीं मानी ।

मस्कत में जो लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए, उनके नाम हैं- विश्वनाथ, राधा बाई, रूपा बाई, भाटिया प्रधान, खट्टू, हीर जी भाटिया, महावजी, नारायण कायस्थ, राम, जीवा, संगजी, महावजी का पुत्र कान्हजी, गंगा, हीरा, लक्ष्मण, रंगनाथी, मानजी, जीवा, रूपजी कामदार, और बेरसी ।

इन सुन्दरसाथ ने श्री जी के रूप में साक्षात् श्री राज को पहचाना, उनसे चर्चा सुनी, और बहुत आत्मिक सुख लिया ।

एक दरोगा प्रतिदिन आकर पुकार करता था कि यदि अब तक आपका कोई सम्बन्धी बन्धन में है, तो धन देकर उसे छुड़ा लो ।

श्री जी ने उसे स्पष्ट कह दिया- "हमारे ऊपर जो साहिब है, उसके होते हुए हमें किसी बात की चिन्ता नहीं है ।"

ऐसा दृढ़ उत्तर सुनकर दरोगा जेर हो गया । वह बार-बार वही बात कहने के लिए आने लगा । वास्तव में बन्दियों को छुड़ाने की सूचना देने के बहाने वह श्री जी की चर्चा सुनने आता था और चर्चा सुनने के बाद परवरदिगार को शुक्रिया कहता था ।

इस प्रकार समय बीतते-बीतते वि.सं. १७२८ हो गया । लोहाणा क्षत्रियों के अतिरिक्त अन्य सभी जाति के लोगों ने अपने सगे-सम्बन्धियों को छुड़ा लिया था । जब यह बात अब्बास बन्दर (ईरान) में रहने वाले भैरों सेठ ने सुनी, तो उसने प्रतिष्ठा के लोभ में सत्तर हजार लहारी देकर अपनी लोहाणा जाति के सभी लोगों को छुड़वा दिया ।

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