अब्बास बन्दर वृत्तान्त
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४६
जब भैरों सेठ ने श्री तेज कुंवरी सहित सभी लोहाणा क्षत्रियों को छुड़वा दिया, तो अब्बास बन्दर (ईरान) में श्री जी की उससे भेंट हुई । वह श्री जी को अपने घर ले गया और उनका सत्कार किया ।
भैरों सेठ ने श्री जी से उनकी कुशलक्षेम पूछी और भारत का समाचार जाना । इसके बाद उसने श्री जी सहित सभी सुन्दरसाथ को अपने घर के निकट एक भवन में ठहराया और वहां भोजन की भी व्यवस्था कर दी । अब बिना समय नष्ट किए श्री जी चर्चा के कार्य में लग गए ।
भैरों सेठ अपने पूरे परिवार के साथ सबसे आगे चर्चा सुनने बैठ गया । श्री जी ने ब्रज लीला की चर्चा करी, जिसे सुनकर भैरों सेठ को बहुत आनन्द प्राप्त हुआ । चर्चा के रस में किसी को भी काल का बोध नहीं रहा और दोपहर का समय हो गया ।
जब श्री जी भोजन करने बैठे, तब भैरों सेठ अपने घर चला गया । आज उसका मन बहुत प्रसन्न था । श्री जी ने भोजनोपरांत पुनः चर्चा करना प्रारम्भ कर दिया । चर्चा के लोभ में सुन्दरसाथ वहां एकत्रित होने लगे ।
यह चर्चा रात तक चलती रही । फिर सुन्दरसाथ कीर्तन गाने लगे और सभी ब्रज लीलाओं को स्मरण करके उसमें मग्न हो गए । इस कार्यक्रम में बहुत रात बीत गई । भैरों सेठ अपने घर चला गया और सुन्दरसाथ पुनः चर्चा में मग्न हो गए । इस बार चर्चा होते-होते प्रातः हो गया ।
तभी भैरों ठक्कर कुछ लोगों के साथ श्री जी से मिलने आया । भैरों के साथ दो मुलतानी भी आए, जो गुरु नानक के शिष्य थे और योग में कुशल थे । उनके पास कबीर जी की पोथी रहती थी, परन्तु उसका अर्थ नहीं पता था । कबीर जी की साखियों पर उनसे विशेष चर्चा हुई । कुछ दिन श्री जी के मुख से चर्चा सुनकर, वे दोनों उनके चरणों में नतमस्तक हो गए और अपने अंकुर के अनुसार उन्होंने लाभ लिया ।
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