ब्रज लीला | Braj Leela
श्री कुलजम सरूप में श्री कृष्ण द्वारा खेली गई ब्रज लीला के विषय में कुछ रहस्यमयी बातें बताई गई हैं-1
जैसे नींद में सपना देखा जाता है, वैसे ही हम ब्रज की वधुएं बनकर उपजे । उपजते ही मन में तीव्र इच्छा हुई कि हम अपने प्रियतम से कब मिलेंगी ।
जो कोई ब्रह्मसृष्टि हैं, उनमें पूर्ण प्रेम होता है और उनकी दृष्टि प्रियतम (श्री राज) पर लगी रहती है । जहां कंस ने वसुदेव और देवकी को बन्धक बना रखा था, वहां चतुर्भुज (भगवान विष्णु) की सुरत आई ।
भगवान विष्णु की जो चतुर्भुज सुरत (स्वरूप) है, उसने वहां वसुदेव को दर्शन दिया । सारी बात कहकर वे वापस लौट गए । अब दो भुजा वाले की विगत (बीती हुई बात) कहती हूं ।
अक्षर की जो मूल सुरत (आत्मा) है, जिन्हे प्रेम-स्नेह की लीला देखने की चाहना थी, वह सुरत प्रियतम (अक्षरातीत) के आवेश को लेकर नन्द घर में प्रवेश कर गई ।
श्याम (कृष्ण) का जो दो भुजा वाला स्वरूप था, उसमें अक्षर की आत्मा और धाम धनी (अक्षरातीत) का जोश था । यह खेल सभी सखियों ने देखा । हम प्रियतम के साथ बहुत आनन्दपूर्वक खेले ।
उन्होंने बाल स्वरूप होते हुए भी यौवन की लीला की और सखियों को कई प्रकार से प्रेम किया । हमने प्रेम विलास के कई सुख लिए, जिन्हें इस मुख से कहां तक कहूं ।
ब्रज से प्रयाण
ब्रज से चलते समय का वर्णन इस प्रकार है-2
इस काल माया में विलास करते हुए सब पूरी नींद (अज्ञानता) में भूले हुए थे । पूरी नींद का जो सपना होता है, उसी का नाम काल माया रखा गया है ।
तब धाम धनी (श्री राज) ने विचार किया कि यह दोनों नर-नारी (अक्षर और ब्रह्मसृष्टियां) तो खेलने में मग्न हैं । इन्हें मूल वचन (धाम की बात) की सुध नहीं है और यह दोनों सपने की बुद्धि से खेल रहे हैं ।
प्रियतम ने इस बात को चित्त में लेकर उनकी आधी नींद (अज्ञानता) उड़ा दी । 11 वर्ष और 52 दिन के बाद वे वृन्दावन (योग माया) पहुंच गए ।
वहां जाकर उन्होंने बांसुरी बजाई और सभी सखियों को बुला लिया । तामसियां और राजसियां चल पड़ीं, जबकि स्वांतसियां शरीर छोड़कर उनसे मिल गईं ।
और जो कुमारिका सखियां (ईश्वरी सृष्टि) ब्रज वधुओं के साथ रहती थीं, यह सभी अक्षर की सुरताएं थीं । इन्होंने व्रत करके श्याम से (रास में) मिलन किया । इनके मूल शरीर धाम में नही हैं ।
बांसुरी सुनकर कुमारिका सखियां भी चल पड़ीं और भवसागर के पार उतरीं । इनकी सुरत (आत्मा) सभी सखियों में मिल गई । रास में इनका अलग स्वरूप नहीं था ।
इस प्रकार कुमारिका सखियों को (योगमाया में) मुक्ति मिल गई । यह जो 11 वर्ष (ब्रज में) लीला करी, इसके बाद ही कालमाया का त्याग कर दिया ।
(रास लीला के पश्चात्) अक्षर ने ब्रज लीला को याद किया, तो वह उनके चित्त (सबलिक) में अखण्ड हो गई ।3
ब्रज और रास दोनों ब्रह्माण्ड में हुई ब्रह्म लीला अखण्ड हो गयी । अक्षर के चित्त (सबलिक) में ऐसा हुआ तो उसका नाम सदाशिव कहा गया ।4
अखण्ड गोकुल लीला
निराकार से परे अखण्ड योगमाया में ब्रज लीला आज भी निरन्तर हो रही है, जिसका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित है-5
अब (तारतम ज्ञान की) ज्योति ठौर तक पहुंचे बिना बीच में नहीं रुकेगी । इसने (योगमाया में) फैलकर अखण्ड ब्रज दिखा दिया, जो (इस संसार के ब्रज से) अलग है ।
ब्रज में (श्री राज-श्यामा और सखियों ने) ग्यारह वर्ष तक लीला करी, तद्पश्चात् रास खेलकर घर (धाम) आए । जिस स्थान पर ब्रज (अखण्ड रूप से) बसा हुआ है, उसकी सारी विधि बता देती हूं ।
यमुना के तट पर ब्यालीस पुरों (मुहल्लों) के रूप में सुन्दर गोकुल बसा है । उससे लगता हुआ एक पुरा और है । इस लीला का विलास (सुख) अखण्ड है ।
यह बस्ती घाटी में बसी है और ग्राम के तीन कोने हैं । एक पुरा टीले के ऊपर है, जिसमें उपनन्द का घर है ।
दूसरी तरफ सारे पुरे हैं । बीच में गायों के आने-जाने का मार्ग है । यहां नन्द के पुत्र (श्री कृष्ण) ग्वालों के साथ उनके घरों में खेलते हैं ।
दूसरी तरफ शार्दुल पटेल का पुरा बसा है । तीसरी तरफ वृषभान जी का पुरा है । इस प्रकार तीनों कोने बसे हैं ।
नन्द जी के पुरे के सामने पूर्व दिशा में यमुना का तट है । वहां पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर वृक्षों की छाया है । वट के वृक्ष की डालियों से निकली वृद्धि सामने दिखाई देती है ।
इस पूरे वन की छाया बहुत सुन्दर है, जिससे यमुना का किनारा शोभायमान है । इस वन में अनेक रंग की बेलियां, फल और सुगन्धि है । इसमें शीतल वायु बहती है ।
(श्री कृष्ण के) तीन मामा हैं, जो बहुत शूर (वीर) हैं । नन्द जी के पुरे के इर्द-गिर्द उनके तीन पुरे हैं, जो बस्ती में मिलकर ठाट से बसे हैं ।
तीनों मामा के नाम हैं- गांगा, चांपा और जेता । ग्राम को घेरकर दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा में उनके पुरे बसे हैं ।
नन्द जी के घर में आठ मन्दिर (कमरे) हैं तथा बीच में एक आंगन है । इसके पीछे गायों का बाड़ा है, जिसमें सभी पशुधन रहता है ।
आंगन में रेत झलकती है और आगे चरी चूल्हे पर दूध गर्म होता है । आई जी (माता यशोदा) इस स्थान पर अपनी सखियों के साथ मिलकर बैठती हैं ।
तेजपाल मोदी का कमरा इस चरी चूल्हे के पास है । इनका निवास मथुरा में है, परन्तु वे कुछ दिन यहां आकर रहते हैं ।
इस घर में दस लोग भोजन करते हैं । अनेक प्रकार के पकवान-शाक बनते हैं । भागवन्ती बाई अच्छे और विवेकपूर्ण ढंग से रसोई करती है ।
इस घर में लाडले (कृष्ण), नन्द, यशोदा, रोहिणी, उनके बालक बलभद्र, पालक-पुत्र कल्याण जी और उनके पुत्र गोपाल रहते हैं ।
(श्री कृष्ण की) दो बहनें जीवा और रूपा घर में साथ रहती हैं । कल्याण की पत्नी भागवन्ती बाई भी यहीं रहती है ।
वृषभान और उनके भाई लक्ष्मण के पुरे नन्द जी के पुरे की उत्तर दिशा में पूर्ण रूप से बसे हुए हैं ।
(वृषभान जी के घर में) सात लोग भली-भांति से भोजन आरोगते हैं । कल्याण बाई तरह-तरह के बहुत से शाक और अन्न-पकवान रसोई में बनाती हैं ।
इस घर में राधा बाई, उनके पिता वृषभान जी, माता प्रभावती बाई, सुदामा, कल्याण जी, उनसे छोटे भाई कृष्ण जी रहते हैं ।
सुदामा की पत्नी का नाम कल्याण बाई है । वे अपने हृदय में राधा बाई के लिए बहुत सम्मान रखती हैं और उनके साथ कई भांति से हंसी करती हैं, क्योंकि राधा बाई की सगाई श्याम (श्री कृष्ण) के साथ हो चुकी है ।
आंगन के आगे छह कमरे हैं । आंगन में चरी चूल्हे पर दूध भरे मटके चढ़ाए जाते हैं और प्रभावती जी अपनी गोद में श्यामा (राधा बाई) को लेकर खाट पर बैठती हैं ।
राधा बाई (श्यामा जी) से प्राणनाथ (श्री कृष्ण के रूप में श्री राज) की मंगनी हुई थी, परन्तु विवाह नहीं हुआ था । मूल (धाम) के सम्बन्ध से दोनों (श्री राज और श्यामा जी) एक ही अंग हैं, इसलिए वे अपने प्रियतम के साथ विलास (प्रेम लीला) करती हैं ।
गोकुल के घर-घर में प्रेम से गाय के दूध की दही को मथा जाता है । सांवरे (श्री कृष्ण) सभी घरों के अन्दर और बाहर आंगन में खेलते हैं ।
सभी पुरों के बीच में चबूतरे बने हैं, जिन पर बूढ़े गोप भरकर बैठते हैं । वे चारों प्रहर (दिन भर) गोष्ठी करते हैं व घुंघरी (गेहूं की खीर) खाते रहते हैं और हंसते-खेलते दिन बीत जाता है ।
और सभी गायों को चराने के लिए गोप तथा ग्वाल वन जाते हैं । इस प्रकार वे भोर से लेकर सन्ध्या तक ब्रज के वन में ही घूमते रहते हैं ।
जिसे कुछ चाहिए होता है, तेजपाल मोदी उसकी आवश्यकता को पूर्ण करते हैं । वे बड़े-बड़े घरों से घृत खरीदते हैं और विवाह आदि भी करवाते हैं ।
ब्रज में जो व्यापारी व्यापार करने आते हैं, वे वस्तुओं और धन का लेन-देन करके फिर मथुरा जाकर रहते हैं ।
श्याम (श्री कृष्ण) ग्वालों को साथ लेकर यमुना के घाट पर खेलते हैं । हम (गोपियां) जल भरने के लिए इस मार्ग से विनोद में आती-जाती हैं ।
ब्रज की यह बात है कि वहां पिया जी से विलास (प्रेम व्यवहार) होता रहता है । उनके (प्रेम भरे) अटपटे वचन सबके हृदय को बींध देते हैं । दिन-रात यही बातें चलती रहती हैं ।
प्रियतम प्रेम में भीगकर सभी पुरों में खेलते हैं । वे जिसके साथ एक क्षण के लिए खेल लेते हैं, उसे कोई दूसरा या कहीं भी कुछ सूझता नहीं है ।
जब हम यमुना से पानी लेने जाती हैं, तब वे हमारे साथ कई तरह के प्रेम और आनन्द से भरे खेल करते हैं । एक उनकी (सुन्दर) छवि और (मधुर) वाणी आठों प्रहर हमारे हृदय में अटकी रहती है ।
(ब्रज के) घर-घर में आनन्दमय उत्सव मनाए जाते हैं और उल्लास हृदय में समाता नहीं है । प्रियतम के साथ विलास और विनोद करने में ही हमारे दिन-रात बीतते हैं ।
शेष वर्णन कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण 19 में देखें ।
(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/26-31 (2) प्रकास हि. 37/32-38 (3) प्रकास हि. 37/48 (4) प्रकास हि. 37/49 (5) कलस हिन्दुस्तानी 19/10-41
