लालदास जी की माया से निवृत्ति
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५९
भीम भाई (दूसरे) और पीताम्बर भाई ने ठट्ठानगर में लालदास जी के मुख से चर्चा सुनी थी और वे सुन्दरसाथ में शामिल होना चाहते थे । जब वि.सं. १७२७ में लालदास जी सुदामापुर गए, तब उन दोनों ने लालदास जी से तारतम ले लिया ।
इस बात से वल्लभाचार्य पन्थ के अनुयायियों में खलबली मच गई । विट्ठलेश गोसांई से जुड़े लोग लालदास जी की बहुत निंदा करने लगे ।
वे कहने लगे- "यह कौन सा नया मार्ग आ गया है, जिसमें हमारे लोग जा रहे हैं ? हमारा पन्थ तो चारों तरफ फैला हुआ है, किन्तु ये लोग तो हमारे पन्थ को अन्य पन्थों के समान बता रहे हैं ।"
लालदास जी अपनी चर्चा में श्री राज के दर्शन की बात बहुत करते थे, परन्तु वल्लभाचार्य मत के लोगों को यह बात सबसे अधिक अखरती थी ।
तब वल्लभाचार्य मत के लोग ऐसा झूठा प्रचार करने लगे- "यह चूहों का पन्थ है । ये लोग भोग का थाल रखकर पर्दा कर देते हैं और फिर चूहों के पैर में घूंघरी बांधकर छोड़ देते हैं । लोगों को घूंघरी की आवाज सुनाकर कहते हैं कि हमारे घर श्री कृष्ण जी पधारकर भोग ग्रहण करते हैं ।"
इस प्रकार शहर भर के वैष्णव लोग सदैव निंदा करते, परन्तु जब उनसे भागवत के प्रश्न पूछे जाते तो वे निरुत्तर हो जाते ।
कुछ लोगों को लालदास जी के मुख से होने वाली चर्चा सच्ची लगती, तो कुछ लोग चर्चा सुनकर भावुक हो जाते । कुछ अन्य तो उनकी स्तुति भी करते । इस प्रकार रात-दिन चर्चा का क्रम चलता रहता था ।
जैसे-जैसे लोग चर्चा सुनने लगे, कुछ लोग तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए- गोपी, खेमजी जोशी, दामा, सूरचन्द्र, वस्ता, लालदास जी की पत्नी लालबाई, सुदामापुर का प्रधान, मस्कत वाले महावजी का बेटा कान्हजी ।
अनेक नए सुन्दरसाथ आने लगे । परमधाम की चर्चा वही सुनता है, जिसका हाथ धाम धनी ने पकड़ा होता है ।
इस समय लालदास जी को सांसारिक उलझन हो गई । श्री राज उन्हें माया से निकालकर अपने चरणों में लाना चाहते थे । अतः लालदास जी को माया का जोरदार धक्का लगा, जिसमें उनकी सारी धन-सम्पदा नष्ट हो गई ।
जब हाथ में कुछ भी नहीं रहा, तो लालदास जी ने माया छोड़कर श्री राज की तरफ नजर कर ली । उन्होंने प्रण कर लिया कि जब तक वे नवतनपुरी जाकर धाम धनी के दर्शन नहीं कर लेते, तब तक अन्न नहीं ग्रहण करेंगे, सिर्फ फलाहार करेंगे ।
जब लालदास नवतनपुरी के लिए निकले, तो उन्हें मगरोल पाटन से आगे नहीं जाने दिया गया और संयोगवश सूरत की दिशा में भेज दिया गया । तब वे दीव में १५ दिन रहकर घोघा (भावनगर) पहुंचे । फिर घोघा से नाव पर चढ़कर सूरत बन्दर पहुंच गए ।
यह वि.सं. १७२९ का समय था । लालदास जी ने आकर श्री प्राणनाथ के चरणों में प्रणाम किया । लालदास जी से मिलकर श्री जी को बहुत खुशी हुई ।
श्री जी ने उन्हें भोजन ग्रहण करने को कहा, परन्तु लालदास जी ने तो अन्न छोड़ रखा था ।
लालदास जी बोले- "मैंने प्रण किया है कि धाम धनी बिहारी जी के चरणों में प्रणाम करके ही अन्न ग्रहण करूंगा ।"
तब श्री जी ने कहा- "तुम्हारा प्रण पूरा हो गया । कुछ चिन्ता मत करो । तुम ब्रह्मसृष्टियों के मिलावे में पहुंच गए हो ।"
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