कतेब की पूंजी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६३
मेड़ता में एक दिन जब श्री जी साहिब जी मार्ग में खड़े थे, तब मुल्ला ने मस्जिद की मुनार पर चढ़कर बांग दी- "ला इलाह इल्लिल्लाह, मुहम्मद रसूल अल्लाह ।"
उसकी आवाज को सुनकर श्री जी दिल में विचार करने लगे- "यह तो अक्षरातीत श्री राज (अल्लाह) की सूचना दे रहा है । ला का अर्थ है क्षर (नश्वर), इलाह कहा गया है अक्षर (अखण्ड) को, तथा इल्लिल्लाह का अर्थ है अक्षरातीत (अक्षर से परे) । यह तो बहुत बड़ी बात है । श्री देवचन्द्र जी ने कहा था कि आत्माएं जिस परमधाम से आई हैं, वहां अक्षरातीत के स्वरूप के अतिरिक्त कोई नहीं है । फिर मुहम्मद किस प्रकार अपने को अल्लाह का रसूल (सन्देशवाहक) कहते हैं ? इसका अर्थ है कि अक्षर ही मुहम्मद के रूप में हमारे लिए सन्देश लाए हैं । अतः कुरान में अवश्य हमारी बात होगी ।"
मेड़ता तक श्री जी द्वारा तारतम ज्ञान (वेद पक्ष) से जागनी होती रही । अब उनके अन्दर कुरान (कतेब पक्ष) का ज्ञान भी मिल गया । इससे सभी मनुष्यों को एक धर्म में लाने की भूमिका तैयार हो गई ।
श्री जी ने लालदास जी से कहा- "आज मैंने विशेष ज्ञान प्राप्त किया है । कलमे में क्षर, अक्षर और अक्षरातीत की बात है और पैगम्बर मुहम्मद कुरान का ज्ञान सुन्दरसाथ के लिए लाए थे ।"
जब ईसा रूह अल्लाह (श्यामा जी) के तन में मुहम्मद (अक्षर की आत्मा) का प्रवेश हो गया, तब उन्हें अहमद का खिताब मिला । जब ये दोनों स्वरूप महदी (अक्षरातीत श्री राज) से मिल गए, तो तीनों के मिलने पर उस तन को ईमाम का खिताब मिला । यह शोभा सिर्फ श्री प्राणनाथ जी की है क्योंकि उनके तन में ही यह तीनों स्वरूप विराजमान हैं । कुरान में भी लिखा है कि आखिरी ईमाम ही दज्जाल (अज्ञानता) को मारेंगे ।
कतेब पक्ष से साक्षी मिलने से उत्साहित होकर श्री जी ने लालदास जी से कहा- "अब हम औरंगज़ेब को प्रबोधित करने के लिए दिल्ली जाएंगे । श्री देवचन्द्र जी ने कहा था कि जब सकुण्डल और सकुमार की आत्मा जाग्रत हो जाएगी, तब खेल समाप्त करके हम सब वापस मूल स्वरूप श्री राज के पास पहुंच जाएंगे । इसलिए अब हमें उन दोनों को ढूंढकर जाग्रत करना है और कलियुग रूपी दज्जाल (अज्ञानता) को नष्ट करना है । तब सभी परमधाम की आत्माओं को सूचना मिल जाएगी और वे सब आखिर में दौड़कर मिलेंगी ।"
इसी विचार से श्री जी साहिब जी मेड़ता से चले और गोकुल, मथुरा, आगरा होते हुए दिल्ली पहुंच गए ।
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