नीमानुज सम्प्रदाय के आचार्यों से संवाद
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७०
तब श्री प्राणनाथ जी से नीमानुज सम्प्रदाय के आचार्य बोले-
"हम अपने सम्प्रदाय का वेद, इष्ट, जप, धाम, आदि बताते हैं । यदि आप हमारी पद्धति को ग्रहण कर लेंगे, तो आपको बहुत शान्ति मिलेगी ।
"हमारी शाला मथुरा है । हमारा धर्मक्षेत्र गोकुल है । हमारे सुख-विलास का स्थान अखण्ड वृन्दावन है । हमारा धाम द्वारका है । हमारा तीर्थ गोमती नदी है । हमारी इष्ट रुक्मणि हैं । हम यजुर्वेद को मानते हैं और हरि नाम की माला जपते हैं, जिससे भ्रम समाप्त हो जाते हैं ।
"हमारी देवी वृन्दा हैं । हम सारूप्य मुक्ति को मानते हैं । हमारा मन्त्र प्रणव ओंकार (ॐ) है । हमारी सम्प्रदाय प्राचीन है, जिसे सनकादिक ने चलाया था ।
"हम गोपाल वंश गायत्री मन्त्र को मानते हैं । हमारे आचार्य नारद हैं । हमारे ऋषि दुर्वासा हैं । हमारे देवता गरुड़ हैं, जो भगवान विष्णु के वाहन हैं और सदा सन्तों की रक्षा करते हैं । यह नीमानुज सम्प्रदाय की पद्धति है ।"
तब श्री प्राणनाथ जी ने उनसे प्रश्न किया- "क्या आपके अन्दर विचार नहीं है ? आप कुछ बातें तो जगत के परे अखण्ड की करते हैं और कुछ बातें जगत के अन्दर की कहते हैं । आपका ज्ञान स्पष्ट नहीं है । आपने तो सार और असार को एक कर दिया । आपका मत वेदानुकूल नहीं है । बिना सद्गुरु के आपको भवसागर से मुक्ति नहीं मिल सकती ।"
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