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षट् दर्शन की विधि

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७४

तब श्री प्राणनाथ जी से छह दर्शन के आचार्य बोले-

"हमारा मत प्राचीन है । यदि आप इसे समझकर देखेंगे, तो आपको परमात्मा प्राप्त होंगे ।

"ब्रह्मा जी अपने चारों मुखों से नित्य चारों वेदों का अध्ययन करते रहते हैं । वे अपने पूर्व मुख से ऋग्वेद, उत्तर मुख से अथर्ववेद, पश्चिम मुख से यजुर्वेद, और दक्षिण मुख से सामवेद का उच्चारण करते रहते हैं ।

"चारों वेदों के छह अंग हैं, जो दर्शन के रूप में प्रकट हुए । ब्रह्मा जी के पूर्व मुख से न्याय दर्शन प्रकट हुआ । पश्चिम मुख से योग दर्शन, सांख्य दर्शन, और वैशेषिक दर्शन प्रकट हुए । दक्षिण मुख से मीमांसा दर्शन प्रकट हुआ । उत्तर मुख से वेदान्त दर्शन प्रकट हुआ । इस प्रकार छह दर्शनों की उत्पत्ति हुई ।

"इन छह दर्शनों के छह आचार्य हैं । गौतम ऋषि को न्याय दर्शन प्रत्यक्ष हुआ । वेद व्यास के शिष्य जैमिनी ने मीमांसा दर्शन लिखा । कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन लिखा । पतन्जलि ऋषि ने योग दर्शन की रचना की । कणाद मुनि ने वैशेषिक दर्शन लिखा । शिव जी ने वेदान्त (उत्तर मीमांसा) का उपदेश दिया, जिसे वेद व्यास ने लिपिबद्ध किया ।"

इन छह शास्त्रों का भिन्न-भिन्न मत देखकर चतुर लोग आपस में वाद-विवाद करते हैं ।

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