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श्री निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८२

हरिद्वार के महाकुम्भ में सभी आचार्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में श्री प्राणनाथ जी ने अपनी पद्धति विस्तार से बताई-

"हमारे सद्गुरु आनन्दमयी ब्रह्म हैं । अक्षरब्रह्म सूत्र हैं । अक्षर से परे चिद्घन स्वरूप अक्षरातीत हमारी शिखा हैं ।"

श्लोक- ब्रह्मानन्दं परम् सुखदं केवलं ज्ञान मूर्तिम्, द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम् । एको नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षि रूपं, भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥ (स्कन्द पुराणे गुरुगीतायाम्)

अर्थ- परब्रह्म के आनन्दमयी स्वरूप, परम सुख को देने वाले, अलौकिक ज्ञान की मूर्ति, सभी द्वन्द्वों से रहित, आकाश के समान व्यापक हृदय वाले, "तुम ब्रह्म हो" के कथन को दर्शाने वाले, सर्वदा निर्मल स्वरूप वाले, परिवर्तन से रहित एकरस रहने वाले, हमेशा ही सबके साक्षी रूप, मन के भावों से परे रहने वाले, सत्व-रज-तम के बन्धन से रहित, उस एकमात्र सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूं ।

श्लोक- यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् । सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः ॥ (ब्रह्मोपनिषद)

अर्थ- जो अत्यन्त श्रेष्ठ अक्षर ब्रह्म रूपी सूत्र है, उसे धारण करना चाहिए । परब्रह्म के प्रति संकेत करने के कारण उसे सूत्र कहते हैं । उस श्रेष्ठ धाम को ही सूत्र कहा गया है । उस सूत्र को जो जानता है, वही विप्र वेद के रहस्य को जानने वाला कहा जाता है ।

श्लोक- शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम् । ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः ॥ चिदेव पंचभूतानि चिदेव भुवनत्रयम् ॥ (ब्रह्मोपनिषद)

अर्थ- जिसकी शिखा ज्ञानमयी स्वरूप वाली है और यज्ञोपवीत भी ज्ञानमयी स्वरूप वाला है, उसे सब कुछ ब्रह्मरूप दिखाई देता है । इस प्रकार उसे ब्रह्मज्ञानी कहते हैं । उस ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में पांचों तत्व तथा तीनों लोक भी चेतन की तरह ही प्रतीत होते हैं ।

श्लोक- आनन्द विज्ञान घन एवास्मि । तदेव मम् परमधाम तदेव शिखा तदेवोपवीतं च । (परमहंस उपनिषद)

अर्थ- मैं आनन्दमय, विज्ञानमय स्वरूप वाला हूं । वह ही मेरा परमधाम है, वह ही शिखा है और वह ही यज्ञोपवीत है ।

"हमारे आराध्य उत्तम पुरुष (अक्षरातीत) हैं । हमारा गोत्र चिदानन्द है । हमारे इष्ट परम किशोरी (श्यामा जी) हैं । हम पतिव्रत साधन (अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति) को मानते हैं ।"

श्लोक- द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कुटस्थोऽक्षरः उच्यते ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । (गीता १५/१६-१७)

अर्थ- संसार में दो पुरुष क्षर और अक्षर कहे जाते हैं । सभी प्राणी क्षर कहे जाते हैं तथा कूटस्थ पुरुष अक्षर कहा जाता है । उत्तम पुरुष (अक्षरातीत) इनसे परे कोई अलग ही है, जो परमात्मा कहा जाता है ।

श्लोक- अनादिमादिं चिदरूपं चिदानन्दं परं विभुः । वृन्दावनेश्वरं ध्यायेत त्रिगुणस्येक कारणम् ॥ (वाराह संहितायाम् गोत्रस्य साक्षी)

अर्थ- चेतन और आनन्दमय (चिदानन्द), अनादि स्वरूप वाले, मूल से ही चेतन स्वरूप वाले, अति श्रेष्ठ, वृन्दावन के स्वामी का ध्यान करना चाहिए, जो त्रिगुण के कारण हैं ।

श्लोक- सिद्धिरूपासि चाराध्या राधिका जीवनं मम् । ये स्मृत्वा भावयन्ति त्वां तैरहं भावितः सदा ॥ तत्र मेें वास्तवं रूपं यत्र यत्र भवद्दृशः । ममेष्टं च ममात्मा त्वं राधैव राध्यते मया ॥ (पुराण संहिता ६/३६,३८)

अर्थ- श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे राधा ! तुम अलौकिक स्वरूप वाली हो । मेरे द्वारा पूजे जाने योग्य हो । मेरा जीवन हो । जहां-जहां ऐसा होता है, वहां-वहां ही मेरा वास्तविक रूप होता है । तुम मेरी प्रिया हो और मेरी आत्मा हो । मुझसे ही तुम्हारी भी पूर्णता है । (यहां राधा से परम किशोरी श्यामा जी का भाव लेना चाहिए)

श्लोक- नाहं वेदैर्न न तपसा न दानेन न चेज्यया । भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं विधोऽर्जुन ॥ (गीता ११/५३,५४)

अर्थ- न तो मैं वेदों से प्राप्त होता हूं, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से । हे अर्जुन ! मैं केवल अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति से ही प्राप्त होता हूं ।

"हम परब्रह्म के युगल स्वरूप (श्री राज श्यामा जी) का जप करते हैं । हमारा मन्त्र तारतम है । हमारी देवी ब्रह्मविद्या है । हमारी पुरी नवतनपुरी है ।"

श्लोक- राधया सह श्रीकृष्णं युगलं सिंहासने स्थितम् । पूर्वोक्तं रूप लावण्यं दिव्य भूषा श्रंगम्बरम् ॥ (वाराह संहिता)

अर्थ- पहले वर्णन किए हुए रूप एवं लावण्य से युक्त, अलौकिक वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित श्री कृष्ण जी राधा के साथ युगल स्वरूप के रूप में सिंहासन पर विराजमान हैं ।

श्लोक- स्वकृत विचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया, तरतमतश्चकास्स्यनलवत स्वकृतानुकृतिः । अथ वितथास्वमूष्ववितथं तव धाम समं, विरजधियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एक रसम् ॥ (भागवत १०/८७/१९)

अर्थ- हे परमात्मा ! अपने द्वारा बनाई हुई विचित्र प्रकार की योनियों में कार्य कारण रूप से प्रवेश करते हुए आप ही लकड़ी में अग्नि की भांति प्रतिबिम्बित हो रहे हैं, किन्तु इस भेद को तारतम ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है । सदा अविनाशी एवं एकरस रहने वाले आपके धाम को केवल निर्मल बुद्धि वाले मानव ही प्राप्त कर पाते हैं ।

श्लोक- ॐ ब्रह्म विद्यां प्रवक्ष्यामि सर्वज्ञानम् उत्तमम् । यत्रोत्पत्ति लयं चैव ब्रह्माविष्णु महेश्वराः ॥ (ब्रह्म विद्योपनिषद)

अर्थ- अब मैं सभी ज्ञानों में उत्तम उस ब्रह्म विद्या के विषय में कहता हूं, जिसके जानने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवों की उत्पत्ति एवं लय होने का ज्ञान हो जाता है ।

"एक सौ आठ पक्ष की शाखा है । हमारी शाला गौलोक है । सद्गुरु के चरण हमारा क्षेत्र हैं, जिससे सब दुःख समाप्त हो जाते हैं ।

"हमारे सुख-विलास का स्थान नित्य वृन्दावन है । हमारे ऋषि महाविष्णु हैं । हम स्वसं वेद को मानते हैं । हमारा तीर्थ यमुना (परमधाम में स्थित दिव्य यमुना) है ।

"हमारा शास्त्र (प्रमाण ग्रन्थ) श्रीमद्भागवत् है । हम जाग्रत बुद्धि के ज्ञान (श्री कुलजम सरूप) को मानते हैं । हमारा कुल परब्रह्म का आनन्द अंग (श्यामा जी) है । हमारे मत को ग्रहण करने का फल परमधाम की नित्य लीला में विहार करना है ।

"हमारा धाम दिव्य ब्रह्मपुर (अखण्ड परमधाम) है । जहां अक्षरातीत का निवास है (अखण्ड परमधाम), वही हमारा मूल स्थान है । हमारे सम्प्रदाय का नाम निजानन्द है । यह आपके प्रश्नों के उत्तर हैं ।

"धनी श्री देवचन्द्र जी ने निजानन्द सम्प्रदाय प्रारम्भ किया और उनसे ही हमने यह ज्ञान प्राप्त किया । इस ज्ञान के द्वारा ही हमने परमधाम का मार्ग (द्वार) पाया है ।"

हरिद्वार के महाकुम्भ में इस प्रकार की बहुत चर्चा हुई और सभी ग्रन्थों से साक्षियां देकर श्री जी ने अपनी बात समस्त आचार्यों को समझाई ।

धर्मग्रन्थों की भविष्यवाणी के अनुसार, जब विजयाभिनन्द बुद्ध आएंगे, तब आकाश में धूम्रकेतु दिखाई देगा और उस वर्ष एक मास का क्षय होगा अर्थात् उस वर्ष में सिर्फ ११ मास होंगे । यह दोनों संकेत विक्रम सम्वत् १७३५ में प्रकट हो चुके थे ।

श्री प्राणनाथ जी ने सभी सम्प्रदाय के आचार्यों को शास्त्रार्थ में जीत लिया । फिर भी संसार के लोग अज्ञानता की नींद में सोए रहे और श्री जी के स्वरूप की पहचान न कर सके । सब धर्मग्रन्थों में यह भी लिखा है कि जब विजयाभिनन्द बुद्ध स्वरूप प्रकट होंगे, तब बुद्ध जी का शाका प्रारम्भ होगा । सब लोग इसे पढ़ते तो हैं, परन्तु कोई उनकी शरण में आकर लाभ न ले सका ।

हरिद्वार में श्री जी के मुख से वेदान्त के बहुत किरंतन प्रकट हुए । उनके साथ-साथ कुछ अन्य किरंतन भी उतरे- सतगुर मेरा स्याम जी, धनी जी ध्यान तुमारे रे, हो साथ जी वेगे ने वेगे, भई नई रे नवों खंडों आरती, कृपा निध सुन्दरवर स्यामा ।

हरिद्वार में चार मास रहने के पश्चात् श्री जी दिल्ली आ गए ।

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