सनन्ध का अवतरण
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८५
इस प्रकार जागनी कार्य को स्थगित करके, अगली प्रातः श्री जी साहिब जी अनूपशहर (बुलन्दशहर) के लिए निकल पड़े । वह आषाढ़ का मास था और मूसलाधार वर्षा हो रही थी । मार्ग में श्री जी को बहुत दस्त लग गए । माणिक भाई ने उन्हें औषधि दी ।
श्री जी को अत्यन्त कष्ट में देखकर लालबाई रोने लगीं । तब श्री जी ने उन्हें दिलासा दिया- "डरो मत, अभी मेरी सुरता फिरने का समय नहीं हुआ है ।"
उस समय जिब्रील ने बहुत जोर किया और श्री राज के आवेश से चौपाइयां उतरने लगीं । धाम धनी की कृपा से तीस सनन्धें उतरीं (सनन्ध या तौरेत के तीस प्रकरण उतरे), जिसमें कुरान के तीस पारों का गुह्य भेद खोल दिया गया ।
धीरे-धीरे पूरी सनन्ध वाणी का अवतरण हो गया । सनन्ध ग्रन्थ के लिपिबद्ध होने के बाद श्री जी विचार करने लगे- "इस वाणी को सुनकर मोमिन कभी पीछे नहीं हटेंगे । अब सुल्तान को पैगाम देने का माध्यम मिल गया है । यदि यह वाणी उस तक पहुंच जाए, तो सकुमार की आत्मा अवश्य जाग्रत हो जाएगी ।"
उस समय अनूपशहर के चौधरी पाठक के दिल में संशय पैदा हो गया कि ये लोग कुरान की बात क्यों करते हैं ? जब उसने श्री जी को आदरपूर्वक अपने घर पधराया, तब श्री जी ने उसे अपनी पूरी बीतक सुनाई । सब कुछ सुनकर वह बहुत खुश हुआ और अपनी लौकिक इच्छा पूरी करने की अर्ज करने लगा ।
पाठक के घर से श्री जी उस हवेली में आ गए, जहां सुन्दरसाथ ठहरे थे ।
श्री जी ने अनूपशहर में प्रकास गुजराती और कलस गुजराती को हिन्दुस्तानी भाषी में रूपांतरित किया, जिससे सभी सुन्दरसाथ उसका लाभ ले सकें ।
अब श्री जी साहिब जी ने शेख बदल को हुक्म दिया- "तुम सुल्तान के पास जाओ और उसे कयामत की खुशखबरी दो ।"
शेख बदल सुल्तान को सन्देश देने के लिए अनूपशहर से विदा हुए । उनके सिर पर सनन्ध वाणी थी और दिल में श्री जी के प्रति सच्चा ईमान था ।
जब शेख बदल दिल्ली पहुंचे, तब जुम्मे की नमाज का समय था । वे सीधे ईदगाह गए और वहां सनन्ध वाणी बांचने लगे । वहां बहुत लोग थे, परन्तु किसी का भी चित्त शान्त नहीं था ।
शेख बदल ने बहुत पुकारा, परन्तु कोई भी उनसे प्रभावित नहीं हुआ । लोगों का कहना था-
"ये शब्द तो हिन्दी में है ।"
"बात तो सत्य है, परन्तु शरीयत हमें इसकी इजाजत नहीं देती ।"
उन लोगों की ऐसी बातें सुनकर, शेख बदल वापस अपने स्थान पर लौट आए ।
उसके बाद शेख बदल गनीबेग की हवेली में गए और "बिना एक महम्मद की" सनन्ध बांचने लगे ।
तब एक सैय्यद जिद करके बोला- "तुम ऐसा झूठ क्यों बोलते हो कि सिर्फ एक मुहम्मद है ? इतने पैगम्बर हो गए हैं, उनमें से किसी का भी नाम क्यों नहीं है ?"
उस व्यक्ति से शेख बदल का झगड़ा हो गया और तद्पश्चात् वे अपने घर वापस आ गए ।
दो-चार दिन बाद अनूपशहर से श्री जी दिल्ली आ गए और उन्होंने शेख बदल से पैगाम के विषय में पूछा ।
तब शेख बदल ने अपनी पूरी बीतक सुनाई- "मैंने तो बहुत पुकारा, परन्तु इन मुसलमानों ने तो हक की तरफ पीठ कर ली है । किसी को शक होता है कि ये कलाम हिन्दी में क्यों हैं ? किसी के दिल में कुफ्र है । कोई कहता है कि यह तो बहुत बड़ी बात है ।"
फिर श्री जी के साथ बैठकर कुछ सुन्दरसाथ विचार करने लगे कि इन लोगों ने तो सनन्ध की महत्वपूर्ण बात को भी अनसुना कर दिया । तब श्री जी ने लालदास और गोवर्धन भाई को पुनः शेख सुलेमान के पास भेजा ।
तब उन दोनों ने शेख सुलेमान से मिलकर कयामत और इमाम महदी के आने की सूचना दी । शेख सुलेमान दो मास तक बहानेबाजी करता रहा, परन्तु सुल्तान से नहीं मिलवाया । उसने यह भी कहा कि हिन्दू भेष के लोगों से सुल्तान नहीं मिलते, पहले अपना भेष बदलो । अन्त में हारकर सुन्दरसाथ ने उसके पास जाना छोड़ दिया ।
अगला प्रसंग- फारसी भाषा में पत्र तैयार किए
