बाग में मंत्रणा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९०
दिल्ली में रामचन्द्र वकील के यहां सुन्दरसाथ कई दिन तक जाते रहे । उसे बहुत चर्चा सुनाई, परन्तु उसमें परमधाम का अंकुर नहीं दिखा ।
गंगाराम के बड़े भाई उद्धव दास गोड़िया ने दो दिन तक श्री जी की सेवा करके सन्तोष प्राप्त किया ।
सुन्दरी नाम की एक सन्यासिनी थी । वह श्री जी को यमुना के किनारे मिली । श्री जी का दर्शन करके वह लौट गई, उनके स्वरूप की कुछ पहचान न कर सकी ।
दिल्ली से दूर एक बाग में बैठकर श्री जी और सुन्दरसाथ विचार-विमर्श करने लगे कि कैसे औरंगज़ेब तक सन्देश पहुंचाया जाए ?
श्री जी साहिब जी ने कहा-
"आप अपनी बीतक याद करिए । ब्रज-रास के बाद आप जागनी के ब्रह्माण्ड में आए हैं । धाम धनी ने आपके लिए श्री देवचन्द्र जी (श्यामा जी) को भेजा । मुहम्मद साहिब (अक्षर) भी आपके लिए हक के कलाम (कुरान) लेकर आए ।
"आप सुन्दरसाथ के अतिरिक्त कोई भी अक्षरातीत की बात नहीं करता । यह अक्षरातीत की मेहेर है कि कुरान के रहस्य जो किसी को समझ नहीं आते, वे आपको खुलते हैं । औरंगज़ेब को पैगाम पहुंचाने पर वे लोग आपका क्या बिगाड़ लेंगे ?
"यदि इसके लिए आपको हिन्दू भेष बदलना पड़े, तो भी हमें डरना नहीं चाहिए । अगर वे लोग हमें मार डालेंगे, तो हमें मरने का भी डर नहीं है, क्योंकि हमारा मूल तन तो परमधाम में सुरक्षित है ।
"इन बातों पर विचार करके, अपने मन में दृढ़ कर लीजिए । यदि किसी के मन में कोई बात है, तो अभी कहिए ।
"यह कार्य तो मूल स्वरूप श्री राज के हुक्म से हो रहा है । यह भी निश्चित है कि वे कभी मोमिनों (ब्रह्मसृष्टियों) का बुरा नहीं कर सकते । दूसरी बात यह है कि हमारा सकुमार (औरंगज़ेब) से धाम का नाता है, इसलिए वह हमारे ऊपर अत्याचार नहीं कर सकता ।"
श्री जी के निर्णय को सब सुन्दरसाथ ने एकमत होकर स्वीकार किया और औरंगज़ेब को पैगाम पहुंचाने के लिए कमर कस ली ।
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