संसार
यह संसार नश्वर है और क्षर के अन्तर्गत आता है । इसे मोह सागर, चौदह लोक, खेल, स्वप्न, विराट, तीन लोक, ब्रह्माण्ड या भव सागर भी कहते हैं ।
मण्डप के समान बनाया गया यह महल (संसार) अंतरिक्ष में अटका हुआ है । कई विद्वान इसके विषय में चिन्तन करते-करते हार गए, परन्तु कोई इसकी रीति (विधि) को समझ नहीं सका ।1
इस इण्ड (ब्रह्माण्ड) की रचना जल, धरती, अग्नि, वायु और आकाश (पांच तत्वों) से हुई है । इस चौदह तबक (लोक) में चारों तरफ भयंकर प्रपञ्च (छल) खड़ा है ।2
यह तीनों लोक अन्धकार (निराकार) से बने हैं और तीनों को अन्धकार (अज्ञानता) ने ही घेर रखा है । मैंने अच्छी तरह परख लिया है कि किसी को भी इससे परे का थोड़ा भी ज्ञान नहीं है ।3
यह सभी (विद्वान) वैराट के लिए खरगोश का सींग, बांझ का पुत्र, आकाश का फूल, आदि नाम रख कर उसके अस्तित्व को नकार देते हैं ।4
यह जो पांच तत्व दिखाई देते हैं, इनमें कोई भी स्थायी नहीं है । एक पल में चर-अचर वैराट का प्रलय (नाश) हो जाएगा ।5
यह खेल (संसार) तो एक क्षण का है, परन्तु लोग इसे अनादि और अनन्त समझते हैं ।6
संसार की उत्पत्ति कैसे होती है?
अक्षर की लीला बाल स्वभाव वाली है और उनकी (संसार को उत्पन्न करने की) इच्छा ही मूल प्रकृति है ।7
उनके नैन के इशारे से चौथाई पल में कई करोड़ ब्रह्माण्ड उत्पन्न और नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तीन लोकों वाला यह खेल पैदा होता है ।8
यहां अक्षर के मन का विलास हुआ । पांच तत्वों से चौहद भवन (लोक) बने । यहां (अक्षर के) मन से महाविष्णु उत्पन्न हुए, उन (महाविष्णु) के मन से त्रिगुण (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की उत्पत्ति हुई, और त्रिगुण से सभी चर-अचर प्राणियों की उत्पत्ति हुई ।9
क्या संसार से कोई छूट पाता है?
यह काली रात (अज्ञानता) का ऐसा कोहरा है, जिसमें कोई भी उसके मूल को ढूंढ नहीं पा रहा है । जब इसके कष्टों से छूटने का द्वार ही नहीं मिलता, तो किल्ली, ताला और खोलने की कला कैसे मिल सकते हैं ?10
सब इसी (ब्रह्माण्ड) में अटक कर रह गए हैं, जिसके बीच में गोल इण्ड है और चारों तरफ मोह तत्व का आवरण है । कोई आगे का सेर भर शब्द (ज्ञान) भी नहीं पाता ।11
यह इस भांति की अंधेरी (अज्ञानता) है कि किसी को भी मोह सागर से छूटने का मार्ग नहीं मिल रहा है । कई महापुरुष बल लगा-लगा कर चले गए, परन्तु यह सुध किसी को नहीं हुई ।12
यहां छूत (तृष्णा) का कोई ऐसा रोग रचा गया है कि संसार को देखते ही दुःख में फंस जाते हैं और किसी तरह से भी छूट नहीं पाते । यह संसार देखने योग्य नहीं है ।13
जीव टेढ़ी-सकड़ी गलियों (योनियों) में बार-बार फिरता है । उसके गुण, पक्ष, अन्तःकरण और इन्द्रियां उसके अन्धकार (अज्ञानता) को और बढ़ा देते हैं ।14
यहां कई सूरमाओं (ज्ञानियों) ने टोप (ज्ञान), शस्त्र (साधना) और कवच (संयम) धारण करके माया से युद्ध किया । रण में बड़े वचन बोल कर वे भी अन्त में हार गए ।15
यह मण्डल बिना मूल (आधार) का है और यह अखण्ड नहीं है । न कोई इससे निकल पाता है, न ही इसका अन्त मिलता है ।16
दसों दिशाओं में अग्नि (तृष्णा) है, जिससे सभी दिशाएं जल रही हैं । ऐसी लाल ज्वालाएं चलती हैं, जो इंड (संसार) में नहीं समाती हैं । वह ज्वालाएं आकाश को फोड़कर शिखर (निराकार) तक पहुंचती हैं । इस (ब्रह्माण्ड) को उलंघकर खसम (प्रियतम) संग मिलन कर लो ।17
परब्रह्म ही संसार के बन्धन से मुक्ति दिला सकते हैं
जिसने यह बन्धन बांधे हैं, वही खोल सकते हैं । उन (परब्रह्म) के खोले बिना यह बन्धन छूट नहीं सकते ।18
परब्रह्म अक्षरातीत का आज्ञा से ही निज बुद्धि (धाम की बुद्धि) आती है । उसके बिना मोह नहीं छूट सकता । आत्मा तो अन्धकार (संसार) में है, तो निज बुद्धि के बिना यहां उसका बल नहीं चल सकता ।19
(1) कलस हिन्दुस्तानी 1/11 (2) कलस हि. 1/12 (3) कलस हि. 1/21 (4) कलस हि. 2/31 (5) कलस हि. 1/26 (6) कलस हि. 1/32 (7) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/15 (8) प्रकास हि. 37/16 (9) प्रकास हि. 37/24 (10) कलस हि. 1/20 (11) कलस हि. 2/34 (12) कलस हि. 1/22 (13) कलस हि. 1/24 (14) कलस हि. 1/25 (15) कलस हि. 1/31 (16) कलस हि. 1/28 (17) कलस हि. 3/4 (18) कलस हि. 1/35 (19) कलस हि. 1/36
