निज बुद्धि | Nij Buddhi
धाम की बुद्धि को निज बुद्धि कहते हैं । यह सिर्फ परब्रह्म और उनकी आत्माओं को ही प्राप्त है ।
(प्रियतम ने) अपना अंग, (धाम की) बुद्धि और आवेश (शक्ति) देकर मुझ (इन्द्रावती) से कहा- तू मुझे प्यारी है । तुझे हुकम करता हूं कि सब (ब्रह्मसृष्टियों) को (जागनी का) सुख दो ।1
परब्रह्म अक्षरातीत का आज्ञा से ही निज बुद्धि आती है । उसके बिना मोह नहीं छूट सकता । आत्मा तो अन्धकार (संसार) में है, तो निज बुद्धि के बिना यहां उसका बल नहीं चल सकता ।2
धाम की बुद्धि (निज बुद्धि) का ज्ञान पाने के बाद इस (जाग्रत बुद्धि) का मान बहुत बढ़ जाएगा । यह अखण्ड ज्ञान का उदय हुआ है, जिसे अक्षर ब्रह्म जरा भी नहीं छोड़ेंगे ।3
सारे संशय को मिटाकर असत्य (संसार) के अन्धकार (अज्ञान) को उड़ा दूंगी । (मेरे हृदय में) निज बुद्धि उठकर बैठ गई है, सो उल्टा फेर (माया का मार्ग) समाप्त हो गया ।4
(1) कलस हिन्दुस्तानी 9/30 (2) कलस हि. 1/36 (3) कलस हि. 18/35 (4) कलस हि. 21/10
