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जाग्रत बुद्धि या बड़ी बुद्धि

अक्षर ब्रह्म की बुद्धि को जाग्रत बुद्धि या बड़ी बुद्धि कहते हैं । जाग्रत बुद्धि को एक फरिश्ते के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसका नाम इसराफिल है ।

जाग्रत बुद्धि का अवतार

आज दिन तक बड़ी बुद्धि (अक्षर ब्रह्म की जाग्रत बुद्धि) का अवतार गोपनीय रहा । अब थोड़ा इसके विषय में कहती हूं । इस अवतार (की लीला) का बहुत विस्तार होगा ।1

कुछ समय में बड़ी बुद्धि ने सम्पूर्ण रास लीला को अपने ध्यान में ले लिया । अब यह मेरे (इन्द्रावती के) हृदय में आकर बस गई है और इसके ज्ञान में पल-पल वृद्धि हो रही है ।2

जब (जाग्रत बुद्धि ने) मेरे हृदय की संगति पाई, तो मैंने उसे तारतम (ज्ञान) का बल दिया । उस बल को लेकर वह विराट में पसर गई और ब्रह्माण्ड (समस्त जीवों) को निर्मल कर दिया ।3

जब (जाग्रत बुद्धि) दैत्य कलिंगा (कलियुग रूपी अज्ञान) को मारेगी, तब तत्काल सब कुछ सीधा हो जाएगा । वह हमारी (ब्रह्मसृष्टियों की) लीला का परिचय देकर संसार को यम के जाल से मुक्त करवा देगी ।4

देखो यह दैत्य (कलियुग) ऐसा शक्तिशाली है कि पूरे विराट (ब्रह्माण्ड) में व्यापक है । (उसके प्रभाव से) सब लोग काम, क्रोध और अहंकार लेकर उल्टी राह पर चल रहे हैं ।5

(जाग्रत बुद्धि) एक शब्द की मार से इसका संहार कर देगी । एक पल भी नहीं लगेगा । चौदह लोक में इस बुद्धि के शब्द (ज्ञान) की महिमा फैल जाएगी ।6

अनेक ग्रन्थों में इसकी भविष्यवाणी लिखी है, परन्तु यह ज्ञान अभी तक गोपनीय रहा । अब पूरे विराट (ब्रह्माण्ड) के सम्मुख अक्षर ब्रह्म की बुद्धि (जाग्रत बुद्धि) का ज्ञान होगा । तब सभी लोग एक चाल चलेंगे (एक परब्रह्म को मानेंगे) । किसी के मुख से दूसरा वाक्य भी नहीं निकलेगा । दूसरी बात तो तब करें जब कुछ (संशय) बाकी हो । (जाग्रत बुद्धि ने) सबके संशय को आक की रुई के समान उड़ा दिया ।7

अब यह वचन कितने कहूं ? (जाग्रत बुद्धि) इस दुनिया का उद्धार कर देगी (सबको मुक्ति दिलाएगी) । मेरे संग आकर इसने निराकार के पार की बड़ी निधि (धाम की लीला की जानकारी) प्राप्त की ।8

इस बुद्ध अवतार के बाद अब कोई दूसरा अवतार कैसे हो सकता है ? इस अवतार ने सम्पूर्ण विश्व के विकार (संशय) मिटा दिए और सभी कार्य कर दिए ।9

तुम इस प्रकार समझो कि अब कोई अन्य अवतार नहीं होगा । इन (श्री प्राणनाथ) से पहले किसी को पुरुष (अक्षरातीत परब्रह्म) नहीं कहा गया है । इन वचनों को विचार करके देखो ।10

सम्वत् 1735 (सन् 1678) में हरिद्वार के महाकुम्भ में सभी सम्प्रदाय के आचार्यों ने एकमत से श्री प्राणनाथ जी को विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक अवतार मानकर उनकी आरती उतारी और बुद्ध जी का शाका प्रारम्भ किया । धर्मग्रन्थों की भविष्यवाणी के अनुरूप उस वर्ष में ग्यारह मास थे और आकाश में धूम्रकेतु भी दिखा ।

बुद्ध का अर्थ है जाग्रत बुद्धि । कल्कि का अर्थ है अश्व । जाग्रत बुद्धि को ही अश्व की उपमा दी गई है, जिस पर अक्षरातीत श्री प्राणनाथ रूपी पुरुष सवार होकर आए । बुद्ध और कल्कि दो नहीं, अपितु एक ही अवतार हैं । वस्तुतः यही बुद्ध या कल्कि अवतार हैं ।



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