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विषय-सूची

दर्शन या साक्षात्कार

दर्शन का अर्थ होता है- किसी अलौकिक व्यक्तित्व से साक्षात्कार । भक्ति, ध्यान, सेवा, तप, मन्त्र-जाप, आदि के द्वारा देवी-देवताओं और अनेक महापुरुषों का दर्शन प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु परब्रह्म का दर्शन अति दुर्लभ है । इन्द्रावती जी को जिस प्रकार परब्रह्म का दर्शन हुआ, वह वर्णन पढ़ने योग्य है ।

परब्रह्म का दर्शन कैसे होता है ?

वह (सद्गुरु) अपने स्वरूप में परब्रह्म की पहचान कराएगा और (धर्मग्रन्थों से) साक्षी देकर इसकी पुष्टि भी करेगा । तब आत्मा को परात्म (धाम के स्वरूप) का साक्षात् दर्शन हो जाएगा ।1

अन्दर तो वह न्यारा (अलग) नहीं है, परन्तु (विरह में) जले बिना (उसका साक्षात्कार) नहीं मिलता ।2

परब्रह्म के दर्शन के बाद की स्थिति

उस दिन से उनकी दया (मेहेर) बढ़ती गई और पल-पल रंग (प्रेम) चढ़ता गया ।3

वे तो छिप कर रहने वाले प्रेमी हैं । उनके लिए सब कुछ तुच्छ हो गया है । वे प्रियतम (परब्रह्म) के प्रेम में खेलते (मग्न रहते) हैं और सब कुछ (सांसारिक बातें) भूल गए होते हैं ।4

उनकी सुरता (ध्यान) संसार में नहीं रहती, उसी तरफ (धाम में) लगी रहती है । वे प्रेम में मग्न रहते हैं और उनका सब कुछ (सांसारिक इच्छाएं) नाश हो चुका होता है ।5

प्रेमी तो निश्चित रूप से छिपे रहते हैं । उनके मुख से बोला भी नहीं जाता । यदि उनके मुख से कोई शब्द निकलता भी है, तो कोई ज्ञानी उसका अर्थ नहीं समझा सकता ।6



(1) कलस हिन्दुस्तानी 2/52 (2) कलस हि. 7/10 (3) कलस हि. 9/4 (4) कलस हि. 2/43 (5) कलस हि. 2/44 (6) कलस हि. 2/45