दज्जाल से लड़ाई
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११४
तीन मुस्लिम अधिकारी तो श्री जी के चरणों में नतमस्तक हो गए, परन्तु चौथे के दिल में दज्जाल की बैठक थी ।
पठान फतह मुहम्मद ने जब श्री जी के विषय में सुना, तो उसने जहान मुहम्मद से कहा- "उस वैरागी का परिचय दो ?"
फिर फतह मुहम्मद ने ४० हदीसें लिखकर दीं और कहा- "यदि वे इसका अर्थ कर दें, तो निश्चय ही वे इस जमाने के खाविंद (परब्रह्म) हैं ।"
जहान मुहम्मद हदीसें लेकर श्री जी साहिब जी के पास आया । तब श्री जी ने उससे कहा- "रूह अल्लाह (श्यामा जी) की किल्ली (तारतम ज्ञान) पाने के बाद, तू स्वयं इसके मायने (अर्थ) कर सकता है ।"
जब जहान मुहम्मद ने तारतम पाने की इच्छा व्यक्त की, तब श्री जी की कृपा से उसे पूर्ण पहचान हो गई । तब उसे हकीकत-मारफत के सब रहस्य खुल गए । उसकी आत्म-दृष्टि बका (परमधाम) तक पहुंच गई और उसे परवरदिगार (युगल स्वरूप श्री राज श्यामा जी) के दर्शन हो गए ।
जहान मुहम्मद ने फतह मुहम्मद के पास जाकर कहा- "मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं । अगर तुम इसका जवाब दे दो, तो तुम्हारा मुझ पर एहसान होगा । मेरी खातिर कुरान-हदीसों के अनुसार खुदा की सूरत के बारे में बता दो ? मेयराज में रसूल मुहम्मद की रूह को अल्लाह के दीदार की बात कही गई है या नहीं ?"
फतह मुहम्मद ने उत्तर दिया- "इसमें कुछ भी शक नहीं है, पर हम इसे जाहिर नहीं कर सकते क्योंकि हम शरीयत से बंधे हैं । अगर हमने यह बात कह दी, तो बादशाह हमें मार डालेगा ।"
जहान मुहम्मद ने पूछा- "तुम्हारी सारी हदीसों के मायने मैंने कर दिए । अब क्या कहना है ?"
फतह मुहम्मद ने कहा- "जब तक बादशाह इस दीन (निजानन्द) में नहीं आ जाता, तब तक हम पहल नहीं कर सकते ।"
जहान मुहम्मद ने कहा- "तुम्हारा ईमान तो सुल्तान पर है । हक की पहचान करने के बाद तुम ऐसा क्यों कह रहे हो ?"
इस विषय पर दोनों में खटपट हो गई और जहान मुहम्मद ने पठानों का साथ छोड़ दिया । फतह मुहम्मद के संकेत पर पठानों ने मिलकर जहान मुहम्मद को श्री जी के पास जाने से मना किया । उनमें झगड़ा हो गया ।
जब श्री जी ने यह बात सुनी, तो उन्होंने जहान मुहम्मद को समझाया- "तुम उनसे झगड़ा मत करो । यहां दज्जाल (शरीयत) का राज है और वे सब जाहिल (अनपढ़) हैं । इनका सामना जोर (शक्ति) से नहीं, नीति से करो ।"
जहान मुहम्मद ने कहा- "मुझे दज्जाल लोग यहां आने से रोकते हैं । मैं उनका कहा क्यों करूं ? मैंने तो अपनी आंखों से साहिब को जाहिर देखा है । आप यहां आने से मत रोकिए, नहीं तो मेरे ईमान पर दाग लग जाएगा ।"
पठानों ने आपस में मिलकर विचार किया- "हमें जहान मुहम्मद को मार डालना चाहिए । इसने हमारे दीन को छोड़ दिया है । पहले तो चलकर उस वैरागी से लड़ाई की जाए ।"
तब रात में दस-बारह लोग मिलकर आए । वहां श्री जी साहिब जी बैठे थे और उनके आगे तफ्सीर-ए-हुसैनी बांची जा रही थी । उनके सामने दोनों तरफ सुन्दरसाथ भरकर बैठे थे और उन सबके आगे रेहलों पर किताबें रखी थीं । दोनों तरफ पीतल के दीपक रखे थे, जिससे बहुत रोशनी हो रही थी । श्री जी और मोमिन आपस में चर्चा कर रहे थे ।
बैठक देखकर वे लोग शोर मचाने लगे- "भगत जी ! यह क्या है ? तुम टीका-माला पहनते हो, फिर कुरान क्यों पढ़ते हो ? तुम लोगों को कुरान सुनने या बोलने की इजाजत नहीं है ।"
श्री जी ने कहा- "हम लोग आपस में खुदा और रसूल से मुहब्बत (प्रेम) बांधते हैं । तुम इसे बन्द करना चाहते हो । ऐसा करने को तुम्हें किसने कहा है ?"
तब जहान मुहम्मद बोला- "यह तुम्हें किसने सिखाया ? मैं तुम्हारा उस्ताद (गुरु) हूं और तुम मुझसे ही तालीम (शिक्षा) लेते हो । अब बड़े अज़ीम बनकर बातें करने लगे हो ।"
इस तरह मिहीन खान, गाज़ी खान, अव्वल खान और जहान मुहम्मद पर जिब्रील का बल कार्य करने लगा और उनका जोश देखकर पठान डर गए ।
तब पठान बोले- "भगत जी ! हम जा रहे हैं, हमको माफ कर दीजिए, हमारे दिल साफ हो गए हैं ।"
ऐसा कहकर सभी पठान वहां से भाग गए और अपनी चौकी में जाकर शोर करने लगे- "यारों ! वह तो बड़ा जादूगर है । उसके आगे हमारा कुछ भी जोर नहीं चला ।"
एक दिन राजा भाव सिंह श्री जी से अखण्ड धाम का दर्शन कराने की मांग करने लगा । श्री जी के मना करने पर वह जिद करने लगा । तब श्री जी ने उसकी हठ को पूरा करने के लिए जोर लगाया । परमधाम का अंकुर न होने के कारण उसका जीव अखण्ड का तेज सहन नहीं कर सका और उसका निधन हो गया ।
तब दज्जाल ने बहुत शोर किया । अब फतह मुहम्मद ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि वैरागियों को ढूंढकर बंदी बना लो ।
फतह मुहम्मद की हवेली के पास एक मुल्ला के घर श्री जी ठहर गए और धन के बदले उससे कुरान का अनुवाद करवाने लगे । लालदास और चरणदास अनुवाद करवाने में लग गए । यह बात सबकी कल्पना से परे थी ।
तीन दिन तक श्री जी और सुन्दरसाथ औरंगाबाद में ही रहे । फतह मुहम्मद के सैनिक पूरे नगर में उन्हें ढूंढते रहे । भवानी भट्ट उनकी पकड़ में आ गए, तो उनसे श्री जी का पता जानने के लिए कठोर व्यवहार किया गया । वे भी किसी तरह कैद से छूटकर भाग निकले ।
जब सैनिक सुन्दरसाथ को ढूंढ रहे थे, तब भटकल दरवाजे के पास रहने वाले लोगों ने उन्हें कह दिया- "वैरागी तो यहां से जा चुके हैं ।"
एक दिन जहान मुहम्मद किसी कार्य से फतह मुहम्मद के घर आया । उसके घर के निकट एक सुन्दरसाथ को देखकर, उसने श्री जी के बारे में पूछा ।
जब सुन्दरसाथ ने पास की हवेली की तरफ संकेत किया, तब आश्चर्यचकित होकर जहान मुहम्मद बोला- "आप लोगों को डर नहीं लगता । यह तो फतह मुहम्मद का मोहल्ला है । उसके आदमी आपको सब जगह ढूंढ रहे हैं । आप लोग जल्दी यहां से निकलो ।"
जहान मुहम्मद श्री जी से मिलने आया और उनको सारी बात बताई । श्री जी और लालदास सूर्यास्त तक मुल्ला से अनुवाद करवाते रहे, फिर सारा अनुवाद चरण दास के हवाले छोड़कर नगर से बाहर ७ कोस दूर चले गए ।
मार्ग में श्री जी को भीमसेन मिला और वह उन्हें बुढ़ानपुर ले गया । भीमसेन ने बताया कि वह पहले श्री जी का दर्शन करने आया था और कुछ दिन उनकी सेवा में रह चुका है ।
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