सद्गुरु का सान्निध्य लाभ
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग २२
श्री देवचन्द्र जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया था कि उनके पश्चात् जागनी का कार्य श्री मेहेराज के तन से होगा और उन्हें धाम धनी द्वारा विशेष शोभा मिलेगी । अतः बहुत कम समय में श्री मेहेराज अपने सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्र जी के प्रिय बन गए ।
एक दिन एकान्त में सद्गुरु श्री देवचन्द्र जी ने मेहेराज से कहा- "धाम में सकुण्डल और सकुमार की परात्म हंस रही हैं । इसका अर्थ यह है कि उनकी आत्मा राज परिवारों में आई है । उनसे हमारा आत्मिक सम्बन्ध है, इसलिए उन्हें ढूंढकर जाग्रत करना बहुत आवश्यक है ।"
सद्गुरु द्वारा संकेत में कही गई बातों को श्री मेहेराज ने अपने चित्त में ग्रहण कर लिया ।
इसी प्रकार एक अन्य घटना घटी । श्री देवचन्द्र जी ने खोजी बाई नाम की मुस्लिम महिला को तारतम दिया और बताया कि उसके अन्दर धाम की रई बाई की वासना है ।
श्री मेहेराज ने उनसे पूछा- "क्या धाम की आत्माएं मुस्लिमों में भी हैं ?"
तब श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "इनमें किसी-किसी में धाम की वासना है । और इनके पवित्र ग्रन्थ कुरान में धाम, अक्षरातीत और ब्रह्मसृष्टियों की बातें लिखी हुई हैं । हमने तो कुरान पढ़ने का बहुत यत्न किया, परन्तु लौकिक दृष्टि वाले लोगों ने हमें पढ़ने नहीं दिया । तुम्हारे सामने यह सब बातें इसलिए बता रहा हूं कि जब तुम्हारे तन से लीला होगी तो तुम कुरान के गुह्य भेद खोलोगे ।"
सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्र जी के मुख से धाम की अनेक बातों को श्री मेहेराज ने उस समय बीज रूप में ग्रहण कर लिया ।
श्री मेहेराज सुन्दरसाथ के बीच में सिन्धी में एक भजन गाया करते थे, जिसका भाव है- "यदि मेरे करोड़ों धड़ हों, एक-एक धड़ में करोड़ों सिर हों, एक-एक सिर में करोड़ों मुख हों, और एक-एक मुख में करोड़ों जिभ्याएं हों । इतनी जिभ्याएं धाम धनी के गुणों को गिनना चाहें, तो वे सब मिलकर एक गुण को गिनने में भी समर्थ नहीं हैं ।"
अगला प्रसंग- कान्हजी भट्ट से शास्त्रार्थ
