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श्री मेहेराज को युगल स्वरूप का साक्षात्कार

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३३

वि.सं. १७१४ में कुतुबखान ने आक्रमण कर दिया, इसलिए जामनगर के वजीर को इस अभियान पर जाना पड़ा ।

अब श्री मेहेराज प्रबोधपुरी (हब्शा) में बैठकर विचार करने लगे- "मुझसे क्या गलती हो गई ? मैं तो पूरी तरह धर्म के मार्ग पर चल रहा था और धाम धनी की सेवा में लगा हुआ था, फिर मुझे ऐसा कठिन समय क्यों देखना पड़ा ? इसमें मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं था, अपितु मैं तो सुन्दरसाथ को इकट्ठा करके निजधाम की तरफ मोड़ना चाहता था, फिर ऐसा क्यों हुआ ?"

एकान्त में यह विचार करते-करते श्री मेहेराज विरह में डूब गए और उनको युगल स्वरूप श्री राज श्यामा जी का साक्षात्कार हुआ । श्री देवचन्द्र जी के दिल में जो सुन्दर स्वरूप विराजमान थे, उन्होंने श्री इन्द्रावती जी (श्री मेहेराज) के हृदय में बैठक बना ली । अब वे श्री मेहेराज नहीं रहे, अपितु परमधाम की दिव्य आत्माओं के स्वामी अक्षरातीत श्री प्राणनाथ हो गए ।

श्री प्राणनाथ के मुख से वाणी के रूप में अलौकिक ब्रह्मज्ञान का उच्चारण होने लगा । सबसे पहले रासलीला करने वाले स्वरूप श्री ठकुरानी जी, श्री राज जी और सुन्दरसाथ के श्रृंगार का वर्णन हुआ । तद्पश्चात् रास की रामतों का वर्णन करने वाली चौपाइयों का अवतरण हुआ ।

श्री मेहेराज लौकिक साधनों से सुन्दरसाथ की जाहिरी (भौतिक) सेवा करना चाहते थे, जबकि वाणी के अवतरण से सुन्दरसाथ को हमेशा अलौकिक सुख मिलता रहेगा । श्री राज जी ने अपार मेहेर (कृपा) करके उनको इस बातिनी (आत्मिक) सेवा की तरफ मोड़ दिया । यही परमधाम की ब्रह्मसृष्टि द्वारा की जाने वाली वास्तविक सेवा है ।

रास की आनन्दमयी रामतों का वर्णन होने से उनके हृदय का दुःख समाप्त हो गया और मन में आनन्द छा गया । जब श्री प्राणनाथ वाणी का उच्चारण कर रहे थे, तो जबराइल का जोश उनके मुख पर दिखाई देता था । यह सारा दृश्य देखकर श्यामल को कुछ ईमान आया । ज्यों-ज्यों चौपाइयों का अवतरण होता जा रहा था, उद्धव दीवार पर लिखते जा रहे थे, जिसे बाद में पुस्तक पर चढ़ा दिया गया ।

श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रबोधपुरी में पहले रास का अवतरण हुआ, जिसे ईसाई पन्थ में अंजील कहा जाता है । इसके बाद प्रकास गुजराती की चौपाइयां उतरी, जिसे जंबूर कहा जाता है । तद्पश्चात् खटरूती का अवतरण हुआ, जिसमें विरह और प्रेम का वर्णन है । कलस गुजराती की दो चौपाइयां उतरी ।

प्रबोधपुरी में कुछ किरंतन भी उतरे, जिनके नाम हैं- मीठडा मीठा रे, विनता विनवे रे, म्हारा वस कीधल वाला रे, आवोजी वाला म्हारे घेर ।

प्रबोधपुरी में १२ महीने तक श्री मेहेराज नजरबन्द रहे । इस प्रकार वि.सं. १७१५ का पूरा वर्ष वहीं पर बीता ।

अगला प्रसंग- बिहारी जी द्वारा वाणी पर प्रतिबन्ध