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जयराम भाई की जागनी

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३७

अहमदाबाद से छूटकर श्री जी सीधा दीव बंदर के लिए निकल पड़े । दीव बन्दर जाते समय नाव में बेहद वाणी (प्रकास गुजराती का प्रकरण) का अवतरण हुआ ।

दीव बंदर में श्री जी जयराम भाई के घर पहुंचे । श्री जी से मिलकर जयराम भाई ने आनन्द प्रकट किया ।

जयराम भाई ने श्री जी से पूछा- "हे मेहेराज ! आप कैसे हैं, कहां से आ रहे हैं, और यहां किस कार्य हेतु पधारे हैं ?"

तब श्री जी ने उत्तर दिया- "हम तुम्हारे कार्य के लिए आए हैं । हमें श्री राज जी ने हुक्म देकर भेजा है कि माया में भूले हुए सुन्दरसाथ को ढूंढकर जगाओ । इसलिए हे जयराम भाई ! आप निजधाम को याद करो और अध्यात्म के मार्ग पर चलो ।"

श्री देवचन्द्र जी के धामगमन के बाद का सारा वृत्तान्त सुनाते हुए श्री जी ने कहा- "आप इतने समय से दीव में रह रहे हैं, आपने कितने साथ को परमधाम की राह बताई ? श्री देवचन्द्र जी के सान्निध्य में रहने के बाद भी आपके हृदय में ज्ञान की ज्योति नहीं जली । श्री देवचन्द्र जी के अन्दर धाम धनी की पहचान करने के बाद भी आप माया के कार्यों में फंस गए, आपको ऐसा करते हुए जरा भी शर्म नहीं आई । न तो आपने कभी कोई पाती लिखी, न ही आप श्री देवचन्द्र जी के धामगमन पर आए । जब श्री बिहारी जी को गादी पर बिठाया गया, तब भी आप नहीं आए ।"

श्री जी बोले- "आप तो माया में इस प्रकार मिल गए हैं, जैसे कि आप अनादि काल से यहीं के रहने वाले हैं और कभी इसे छोड़कर परमधाम नहीं जाएंगे । आपको अपनी आत्मा के मूल स्वरूप और अपने प्रियतम की पहचान होनी चाहिए । हम परमधाम से माया का यह खेल सिर्फ देखने आए हैं । आपको इस प्रकार माया में भूलना नहीं चाहिए ।"

इस प्रकार श्री जी ने खण्डनी के वचन कहकर तथा अनेक दृष्टान्त देकर जयराम भाई को सावचेत किया ।

श्री जी ने आगे कहा- "हे जयराम भाई ! तुम कब तक हथौड़े से कांसे का बर्तन बनाते रहोगे ? अब तो परमधाम के ज्ञान का प्रकाश फैलने लगा है, तुम कब तक घर में बैठोगे ? यह चौदह लोक का संसार नश्वर है । तुम परमधाम की आत्मा कहलाते हुए भी माया के काम करते हो, क्या तुम्हें शर्म नहीं आती ? पता नहीं तुम्हारे नश्वर तन के कितने दिन बचे हैं, कुछ तो परमधाम की पहचान करो ।"

श्री जी बोले- "आज तक इस माया से किसी को तृप्ति नहीं हुई । जब कुत्ता सूखी हड्डी को चूसता है, तो स्वयं के मसूड़ों से निकलने वाले रक्त को पीकर वह समझता है कि हड्डी से रक्त प्राप्त हो रहा है । उसी प्रकार इस दुःखमयी और छलयुक्त माया में जीव समझता है कि वह सुख की प्राप्ति कर रहा है । धाम धनी के अखण्ड सुखों को छोड़कर तुम झूठे, नश्वर संसार के पीछे क्यों भाग रहे हो ?"

श्री जी ने आगे कहा- "संसार के जीव इन्द्रियों के स्वाद और मोह के बन्धन में फंसे रहेंगे, परन्तु तुम्हें तो उनसे अलग राह अपनानी चाहिए । तुम्हें श्री राज जी की चर्चा में डूबे रहना चाहिए । तुम्हारे अन्दर तो परमधाम की जरा भी सुगन्धि नहीं आई । न तो तुम चर्चा करते हो, न चितवन करते हो, न सुन्दरसाथ से मिलते हो ।"

श्री जी के ऐसे वचन सुनकर जयराम भाई रो पड़े और उन्होंने अपनी भूल स्वीकार कर ली । फिर वे स्वयं को धिक्कारने लगे ।

जयराम भाई ने कहा- "मैं तो माया में भूल गया था । न तो मैंने धाम धनी और परमधाम को याद किया, न ही प्रियतम से अपने सम्बन्ध को पहचाना । यह श्री राज की मेहेर है, जो उन्होंने तुम्हें मुझे जगाने के लिए भेज दिया ।"

श्री प्राणनाथ के मुख से अखण्ड परमधाम की ऐसी चर्चा सुनकर घर के सभी लोग उनके चरणों में आ गए । फिर उनको स्नान करवाकर प्रेमपूर्वक भोजन करवाया । उनका प्रसाद लेकर सबने उनसे आराम करने का आग्रह किया, परन्तु श्री जी ने कहा- "हम यहां पौढ़ने नहीं आए, अपितु तुम सब को माया की निद्रा से जगाने आए हैं । तुम इस नश्वर संसार से अपने मन को हटाओ और मूल स्वरूप को याद करो ।"

अब श्री जी पुनः चर्चा करने बैठ गए ।

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