दीव बंदर में उद्बोध
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३८
अपनी चर्चा में ब्रज लीला का वर्णन करते हुए श्री जी ने कहा- "याद करो कि ब्रज में श्री राज तुमसे कैसा प्रेम करते थे । गोपियों के रूप में तुम सभी आत्माएं अलग-अलग परिवार में रहकर सांसारिक कार्य करती थीं । श्री राज के बिना तुम्हारा चित्त उदास रहता था और तुम्हें उनके बिना कोई इच्छा नहीं रहती थी ।"
श्री प्राणनाथ जी बोले- "अपने घर में रहते हुए भी सभी सुन्दरसाथ का चित्त श्री राज के चरणों में रहता था । घर के कार्य करते हुए भी तुम पर माया का कोई असर नहीं होता था और तुम सब आठों प्रहर प्रेम में मग्न रहती थीं । अन्ततः संसार को गौपद वच्छ (बछड़े के खुर से बने गड्ढे में रखे जल) के समान छोटा समझकर सुगमता से पार करके रास मण्डल पहुंंच गए । परब्रह्म के प्रति अपने प्रेम के सामने तुमने संसार को तुच्छ समझकर त्याग दिया ।"
रास लीला का वर्णन करते हुए श्री जी ने कहा- "योगमाया के अखण्ड ब्रह्माण्ड में पहुंचकर तुम्हारी आत्मा ने नया तन और नया श्रृंगार धारण किया । याद करो कि कैसे श्री राज ने तुमसे उथले वचन कहे और फिर कैसे तुम सबको वृंदावन दिखाया । याद करो कि कैसे तुम सबने मिलकर श्री राज के साथ रास की रामतें खेलीं ।"
आगे श्री जी साहिब जी बोले- "याद करो कि कैसे रास की रामतें खेलते-खेलते तुम सब मग्न हो गए थे, तब प्रियतम ने अन्तर्धान होकर तुमको विरह की अग्नि में जलाया । पुनः श्री राज ने प्रकट होकर सबका शोक मिटाया और सब उनके साथ दोबारा हांस-विलास करने लगे । फिर कैसे यमुना तट पर झीलना और श्रृंगार किया । कैसे तुम्हारे उतारे हुए वस्त्रों को आसन बनाकर श्री राज उन पर बैठ गए । कैसे तुम सबने उन्हें भोजन कराया और विरह के विषय में प्रश्न किए । कैसे श्री राज ने सब प्रश्नों का उत्तर देकर तुम्हें तृप्त किया ।"
श्री जी ने चर्चा में आगे बताया- "याद करो कि रास के बाद कैसे तुम सब वापस परमधाम गए । खेल देखने का तुम्हारा मनोरथ पूर्ण न होने के कारण कैसे श्री राज ने इस तीसरे ब्रह्माण्ड की रचना की और तुम्हें पुनः इस संसार में भेजा । इसलिए यह तीसरा ब्रह्माण्ड और त्रिदेव तुम्हारे लिए बनाये गए हैं । अपने आप को पहचानो, तुम विशेष हो । इतनी चर्चा सुनाने के बाद भी तुम मोह और अज्ञानता के बन्धन में क्यों फंसे हुए हो ? तुम अपने प्रियतम अक्षरातीत और परमधाम को याद क्यों नहीं करते ?"
श्री प्राणनाथ की चर्चा के रस में दिन बीतते पता नहीं चला । सब सुन्दरसाथ चर्चा में मग्न हो गए और उनका हृदय ज्ञान के प्रकाश से भर गया । वे सुन्दरसाथ अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें साक्षात् श्री राज के मुखारविन्द से चर्चा सुनने का अवसर मिला । ऐसे सुन्दरसाथ की महिमा इस मुख से नहीं कही जा सकती ।
श्री जी वि.सं. १७२२ में दीव पधारे थे और दो वर्ष वहां रहकर सुन्दरसाथ के सब मनोरथ पूर्ण कर दिए । जयराम भाई को प्रबोधित करने हेतु श्री जी के मुख से माया के विषय में जो ज्ञान प्रकट हुआ, उन चौपाइयों को रास ग्रन्थ के प्रारम्भ के पांच प्रकरणों में संकलित किया गया है । कलस गुजराती के कुछ प्रकरण भी दीव में उतरे ।
इस प्रकार दीव बन्दर में प्रतिदिन श्री प्राणनाथ जी की चर्चा होती थी । पूरे शहर में यह बात फैल गई और बहुत लोग चर्चा सुनने आने लगे । जिसका जितना अंकुर होता था, वह उतना ही लाभ ले पाता था । चर्चा के प्रभाव से लगभग ५०-६० लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिनमें परमधाम का अंकुर था । इस लीला के आनन्द का वर्णन इस मुख से करना सम्भव नहीं है ।
सबसे पहले जीवा और जयराम सुन्दरसाथ में शामिल हुए । जयराम भाई की पत्नी रतनबाई घर में रहते हुए भी माया से निकल नहीं सकीं । अन्य जो सुन्दरसाथ श्री जी के चरणों पर समर्पित हुए, उनके नाम हैं- गणेश, गंगादास, नरसिंह दास, ग्वाल जी, गरीब दास, वीरबाई, तेजबाई, गेहेलबाई, चम्पा, सुहासन, बेलबाई, बालबाई, आदि । इन सुन्दरसाथ ने दज्जाल से डरकर धाम धनी का साथ नहीं छोड़ा और पूरी तरह ईमान पर डटे रहे ।
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