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दीव बन्दर में ब्रह्ममुनियों की रक्षा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३९

दीव बन्दर की बीतक का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है, जिसमें दज्जाल ने ब्रह्ममुनियों से लड़ाई की और श्री राज ने मेहेर करके उनकी रक्षा की ।

जब श्री प्राणनाथ की चर्चा होने लगी, तो अन्य स्थानों पर कथा सुनने के लिए जाने वाले श्रोतागण भी वहां आने लगे । श्रोतागण तारतम ज्ञान को सुनकर उन कथा वाचकों से प्रश्न करते, जिसका उत्तर देने में वे असमर्थ थे । इस कारण कथा वाचक श्री जी से वैर रखने लगे ।

अब कथा वाचकों ने निर्णय लिया कि किसी भी तरह से श्री जी को नगर से बाहर निकालना चाहिए, सब मिलकर उनसे झगड़ा करने जाएं या शासक से इनकी चुगली करी जाए ।

उन लोगों ने मिलकर एक चुगलखोर को फिरंगी (पुर्तगाली) शासक के पास चुगली करने भेजा कि श्री प्राणनाथ तुम्हारे देव की निंदा करते हैं, इसलिए उन्हें दीव बंदर से निकाल दिया जाए ।

कुछ दिन बाद वह चुगलखोर फिरंगी शासक के दरबार में गया । वहां उसे एक आदमी मिला । चुगलखोर ने उसे बताया- "नगर में कोई नया साधू आया है, जो सभी देवताओं की निंदा करता है । मैं उसकी शिकायत करने जा रहा हूं ।"

वह व्यक्ति बोला- "क्या तुमने अपने कानों से उसे निंदा करते हुए सुना है ? क्या तुम उसे जानते हो या अन्य लोगों के कहने पर ऐसा कर रहे हो ?"

चुगलखोर ने उत्तर दिया- "मैं उस साधू को नहीं पहचानता । मैंने अपने कानों से उसे निंदा करते हुए भी नहीं सुना । मैं तो अन्य लोगों से सुनकर ऐसा कह रहा हूं ।"

तब वह व्यक्ति बोला- "अपनी आंखों से देखे बिना तुम ऐसा काम क्यों करते हो ? यह फिरंगी राजा ऐसा जालिम है कि तुम्हारे मुख से शब्द सुनते ही तुरन्त उस साधू को सजा सुना देगा और उसे अनेक कष्ट देगा । क्या किसी साधू को दण्ड दिलवाकर तुम्हें दुःख नहीं होगा ?"

ऐसी बात कहकर वह व्यक्ति अलोप हो गया । उस व्यक्ति की बात चुगलखोर को अच्छी लगी और वह बिना चुगली किए वापस लौट गया । वस्तुतः श्री राज का जोश ही उस व्यक्ति के रूप में आया था, जिसके प्रेरणा से चुगलखोर वापस चला गया ।

उधर सुन्दरसाथ को जब पता चला कि फिरंगी राजा से शिकायत होने वाली है, तो सबमें खलबली मच गई । उस कठोर राजा के भय से सब लोग चारों तरफ भागने लगे । कुछ खाड़ी पार करके दूसरी तरफ चले गए, कुछ शहर में छिप गए, कुछ कहने लगे कि हम वहां चर्चा सुनने कभी नहीं गए ।

इस प्रकार दज्जाल ने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी कि कोई भी धनी की तरफ ईमान पर खड़ा नहीं रह सका । सिर्फ एक जयराम और उसका परिवार डटे रहे । इन्होंने स्वयं को पूरी तरह श्री प्राणनाथ पर समर्पित कर दिया था ।

यह तो दज्जाल (माया) की ताकत दिखाकर सबकी परीक्षा ली गई थी । उसके प्रभाव से सुन्दरसाथ का ईमान डगमगा गया और खलबली मच गई । वास्तव में यह सिर्फ ऊपर का शोर था और चुगली करने वालों का मुख काला हुआ ।

इसके बाद फिर से सुन्दरसाथ एक-दूसरे की देखा-देखी चर्चा में आने लगे । डरकर भाग जाने वाले सुन्दरसाथ की हांसी हुई । बाद में श्री जी के समक्ष उन सबने अपनी आपबीती सुनाई और अपनी भूल को स्वीकार किया ।

अब श्री प्राणनाथ जी ने विचार किया कि दीव में बहुत समय बीत चुका है । अलग-अलग स्थानों पर अनेक सुन्दरसाथ को जगाना है और उसके लिए यहां से किसी तरह निकलना होगा, परन्तु सुन्दरसाथ प्रेमवश उन्हें जाने नहीं दे रहे थे ।

अगला प्रसंग- श्री तेज कुंवरी का अपहरण