श्री तेज कुंवरी का अपहरण
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४०
श्री प्राणनाथ जी दीव से निकलकर अन्य स्थानों पर जागनी करने के लिए जाना चाहते थे । तभी ऐसी परिस्थिति बन गई कि सुन्दरसाथ उन्हें रोक नहीं सके ।
अरबी लुटेरों ने छापा मारकर दीव से अनेक लोगों का अपहरण कर लिया । उन लोगों के साथ श्री तेज कुंवरी भी बन्धन में फंस गयीं । तब श्री जी को उन्हें छुड़ाने के लिए वहां से निकलना पड़ा ।
जब यह समाचार अन्य सुन्दरसाथ को मिला, तो समाज में खलबली मच गई ।
श्री जी ने नवी, पोरबन्दर, पाटन, आदि अनेक स्थानों पर खोजा, परन्तु श्री तेज कुंवरी का कुछ पता नहीं चला । वहां से श्री जी कच्छ गए, जहां थावर भाई से भेंट हुई ।
उसके आगे श्री जी मंडई गए, जहां प्रागमल और कुंवरबाई सहित कुछ सुन्दरसाथ रहते थे । वे सब चर्चा को भूलकर माया में लीन हो गए थे । तब श्री जी ने खण्डनी के वचन सुनाकर उनकी आत्मा को जाग्रत किया ।
श्री प्राणनाथ ने उन सुन्दरसाथ से कहा- "हे साथ जी ! माया में रहते हुए तुम लोगों का कैसा हाल हो गया है ? अब जाग्रत हो जाइए, धाम चलने का दिन आ गया है । कब तक खेल देखने के लिए माया में रहोगे ? यह माया किसी की सगी नहीं है, इसे कोई भी प्रिय नहीं है । तुम इस माया में रहकर, दुःख देखकर, क्या करोगे ? तुम तो चतुर-प्रवीण हो और तुम्हारा मूल तन तो परमधाम में है । अपने मूल स्वरूप को भूलकर माया में गलत काम क्यों करते हो ? तुम्हें परमधाम और वहां की दिव्य लीला को भूलकर कोई अन्य कार्य नहीं करना चाहिए । तुम चितवन द्वारा अपने घर (परमधाम) को देखो ।"
एक दिन वहां रहकर श्री प्राणनाथ ने अपनी ज्ञान चर्चा से सबको झकझोर कर जाग्रत कर दिया ।
तब वहां से श्री जी कपाइये आए, जहां हरिवंश ठाकुर अपने परिवार के साथ रहते थे । उनसे अपना परमधाम का सम्बन्ध जानकर श्री जी उनके घर में ठहर गए और खण्डनी के वचनों से युक्त चर्चा सुनाकर उन सबको जाग्रत कर दिया । फिर श्री जी ने हरिवंश ठाकुर को बिहारी जी का दर्शन करने के लिए जामनगर भेजा ।
वहां से श्री जी भोजनगर में वृंदावन के घर पधारे । श्री जी से मिलाप करके वृंदावन को बहुत प्रसन्नता हुई । उन्होंने भली प्रकार से श्री जी का आदर किया और उन्हें भोजन कराया । फिर वे श्री जी से पूछने लगे कि किस उद्देश्य से पधारे हैं ?
श्री जी ने उन्हें पूरी बीतक सुनाई और तद्पश्चात् ज्ञान चर्चा करने लगे । श्री जी के मुख से खण्डनी के वचन सुनकर वृंदावन को सुख का अनुभव हुआ । श्री जी की चर्चा से मन के सारे संशय मिट जाते थे, मन की मलिनता दूर हो जाती थी, और सबकी कामनाएं भी पूर्ण हो जाती थीं । परमधाम का अलौकिक वर्णन सुनकर सबको बहुत आनन्द की अनुभूति हुई ।
एक-दो दिन वहां रहकर श्री जी नलिया होते हुए ठट्ठानगर पहुंचे और वहां नाथा जोशी के घर गये । श्री जी से मिलाप करके नाथा भाई को बहुत सुख उपजा और उनके मन के सारे ताप मिट गए । नाथा भाई ने श्री जी से जागनी का सारा घटनाक्रम जाना ।
अगला प्रसंग- ठट्ठानगर में जागनी हेतु नाव का वापस लौटना
