Kuljam.org

विषय-सूची

ठट्ठानगर में जागनी हेतु नाव का वापस लौटना

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४१

ठट्ठानगर में नाथा जोशी के घर दस-बारह दिन रहकर श्री जी लाठी बन्दर आये । वहां देवा भाई की दुकान में विश्वनाथ भट्ट मिले, जिन्होंने श्री जी का बहुत आदर किया ।

लाठी बन्दर से श्री जी अरब जाने के लिए नाव पर चढ़ गए । समुद्र में तूफान आने के कारण सत्रह दिन तक उनकी नाव फंसी रही, फिर वापस लाठी बन्दर आ गई । वस्तुतः मूल स्वरूप का यही हुक्म था । अभी ठट्ठानगर में अनेक सुन्दरसाथ की जागनी शेष थी, इसलिए मूल स्वरूप की प्रेरणा से नाव वापस आ गई । अब श्री जी लाठी बन्दर से वापस ठट्ठानगर आ गए ।

ठट्ठानगर में श्री जी की बन्धन भाई से भेंट हुई, जिन्होंने उन्हें अपने घर पर पधराया । उसके बाद जिन्दादास से श्री जी की भेंट हुई । जब उनकी पत्नी ठाकुरी बाई ने श्री जी की चर्चा सुनी, तो वह तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गई ।

यह वि.सं. १७२४ का समय था । अब श्री प्राणनाथ पूर्ण जोश में चर्चा करने लगे, जिससे सुन्दरसाथ को बहुत आनन्द प्राप्त हुआ । पूरे ठट्ठानगर में शोर मच गया कि नगर में एक विशिष्ट साधू आये हैं और बहुत लोग चर्चा सुनने के लिए आने लगे । जो व्यक्ति उनका दर्शन करता और उनकी चर्चा सुनता, वह परमात्मा को धन्यवाद देता कि उसे ऐसा ज्ञान सुनने का सौभाग्य मिला ।

जब ठट्ठानगर में श्री प्राणनाथ अपनी अलौकिक चर्चा द्वारा आत्माओं की जागनी कर रहे थे, तो यह बात उस नगर के कुछ लोगों को रास नहीं आई । वे लोग चर्चा का विरोध करने लगे । वस्तुतः यह कलियुग (माया) द्वारा जागनी लीला में बाधा डालने का एक साधन था ।

विरोधी लोगों ने श्री जी की बहुत निंदा की । वे सिर पटक कर रह गए, परन्तु उनका कुछ भी जोर नहीं चला क्योंकि स्वयं परब्रह्म अक्षरातीत सुन्दरसाथ की सहायता कर रहे थे ।

ठट्ठानगर में श्री जी की चर्चा सुनकर बहुत लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिनमें प्रमुख नाम हैं- मोहनदास दलाल, रामदास वैद्य, खटू मटू खत्री, चतुर, मंगल, श्यामल भगत, कुंवर जी, गोवर्धन, सुकदेव, जेठा भाई, द्वारका, रायचन्द्र, बुला, धीरा, थिरदास, किसन बाई, बसई बाई, सहज बाई, राम बाई, वल्लभी, चिन्तामणि और उनके साथी ।

इन सबमें परमधाम की आत्मा थी और श्री प्राणनाथ जी पर इनका दृढ़ ईमान था ।

श्री जी की चर्चा सुनने बहुत लोग आने लगे । यह देखकर वल्लभी मार्ग के लोग श्री जी से लड़ने के लिए तैयार हो गए । वस्तुतः यह कलियुग (माया) का डर था कि श्री प्राणनाथ जी द्वारा उसके प्रभाव को नष्ट किया जा रहा है और उनके आगे उसका कुछ भी जोर नहीं चल रहा है । अतः वे लोग श्री जी को अपना शत्रु मानने लगे ।

गुंसाई के बालक हमेशा श्री जी की निंदा करते थे । वे आध्यात्मिक ज्ञान की गूढ़ बातें तो समझ नहीं पाते थे, सिर्फ विरोध को ही अपना धर्म समझते थे ।

जब मटहरी के लोगों ने श्री जी से परमधाम की चर्चा सुनी, तो वे उनके चरणों में समर्पित हो गए और श्री राज ने उनका हाथ पकड़ा । मटहरी में सैंकड़ों लोग तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिनके नाम कहां तक लिखें ।

यह सुन्दरसाथ मटोद में भी थे, जहां श्री जी ने जोरदार चर्चा की । यह देखकर दज्जाल (माया) के प्रभाव से कुछ लोगों ने श्री जी का बहुत विरोध किया और सुन्दरसाथ को कष्ट भी पहुंचाया ।

अगला प्रसंग- चिन्तामणि बोध